मंगलवार, 17 नवंबर 2009

साहित्याकाश के शब्द-शिल्पी : बेनीपुरी

[चौथी किस्त]

सन १९६६ तक श्रीकृष्ण नगर में हमारा रहना हुआ और बेनीपुरीजी के परिवार से मेरी निकटता बढती गई। भाभी बहुत स्नेही, मुखर और सुदर्शना थीं। घर-भर को साफ़-सुथरा और व्यवस्थित रखना पसंद था उन्हें; लेकिन पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं तो साहित्यकार के घर का भूषण होती हैं और जाने क्यों उन्हें अव्यवस्थित रहना ही प्रिय होता है; उनकी व्यवस्था में मेरी माता अपने घर में और भाभी बेनीपुरीजी के घर में परेशानहाल रहती थीं। दोनों घरों में कागज़-पत्तरों, पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के अंबार को लेकर महीने-दो महीने में एक बार तो अवश्य ही विवाद हो जाता था; जिसे देखकर उस कच्ची उम्र में मुझे न मालूम क्यों बड़ा मज़ा आता था। आए दिन दोनों घरों की दहलीज़ पर रद्दीवाला आ बैठता और उसकी तौल पर निगाह रखने के लिए मुझे नियुक्त किया जाता। एक बार तो रद्दी के साथ बेनीपुरीजी की किसी पाण्डुलिपि का थोड़ा-सा अंश भी कांटे पर चढ़ गया था, जिसकी मैंने रक्षा की थी। बेनीपुरीजी ने उस दिन मेरी प्रशंसा की थी और घरवालों को डांट पिलाई थी। उन्होंने कहा था--''आनंद लेखक का बेटा है, रद्दी और महत्त्व के लेखन का फर्क न जानेगा ? पता नहीं कैसे तुम्हीं लोग ये अन्तर नहीं समझ पाते... ।'' मैं गर्वोन्नत हुआ उनके पूरे घर में पदाघात करता रहा उस दिन देर तक...
दोनों घरों का एक-सा हाल था। साहित्यिकों-मुलाकातियों की आवभगत में चाय की केतली चूल्हे पर ही चढ़ी रहती थी। वह युग 'प्लास्टिक पैक तैयार नाश्ते' का युग नहीं था। विशिष्ट अतिथियों के जलपान के लिए घर में ही सारी तैयारी की जाती थी। बेनीपुरीजी के घर में मेरी कई ऐसी शामें भी गुजरीं, जब अतिथियों के लिए तैयार किया गया नाश्ता हम बच्चों को भी दिया गया। उनके घर के चूरा-मटर का स्वाद आज ४४-४५ वर्षों बाद भी मेरी जिह्वा भूल नहीं सकी है। मनन-रतन से मिलने मैं जब भी उनके घर जाता, बेनीपुरीजी ज्यादातर मुझे तीन मुद्राओं में ही दीखते--कुछ लिखते हुए, कुछ पढ़ते हुए और अधलेटे-सोये हुए।
एक शाम अजीब वाकया हुआ। हम उत्साही किशोरों की टोली बेनीपुरीजी के घर के सामनेवाले मैदान में क्रिकेट के लिए एकत्रित हुई। बल्ला-विकेट, गेंद-दस्ताना मनन-रतन के घर में था। उसे लाने के लिए मनन के साथ मैं भी उसके घर गया। सारा सामान तो बाहरवाले कमरे में ही मिल गया, लेकिन गेंद उस कमरे में थी जिसमे बेनीपुरीजी थे। मनन कमरे की चौखट पर पहुंचकर ठिठक गए, इशारे से मुझे पास बुलाया और बहुत धीमी आवाज़ में बोले--''सामनेवाली अलमारी में गेंद है। तुम उसे ले आओ। बाबा मुझे देख लेंगे तो कोई-न-कोई काम बता देंगे।'' मैंने दबे पाँव बेनीपुरीजी के कमरे में प्रवेश किया और बिना उनकी तरफ़ देखे आलमारी तक पहुँच गया। आलमारी बेनीपुरीजी के सिरहाने थी। गेंद उठाकर जब मैं लौटने को तत्पर हुआ, तो उनपर दृष्टि पड़ी। वह बाएं करवट ऊँची तकिया पर लेटे थे। कमरे की खिडकियों पर परदा पड़ा था, फिर भी कमरे में मद्धम प्रकाश था और उनके खर्राटों की धीमी आवाज़ गूँज रही थी। मैं दो कदम आगे बढ़ा ही था कि बेनीपुरीजी की ओर एक बार फिर दृष्टिपात करके आश्चर्य से अवाक् रह गया ! उनके दायें हाथ में कलम थी और बिस्तर पर पड़े पैड पर वह कुछ लिखते-से दिखे। मैं हतप्रभ था। गहरी नींद में खर्राटे भरता कोई व्यक्ति भला लिख कैसे सकता है ! यह तो असंभव है। मैंने अपनी पलकें झपका कर सुनिश्चित किया कि मैं जो देख रहा हूँ, वह स्वप्न नहीं, सत्य है। हाँ, वह मेरी आंखों का देखा अपूर्व सत्य था। मन में आया कि उनके समीप जाकर देखूं कि वह क्या लिख रहे हैं; लेकिन मेरा सहमा हुआ किशोर मन इतना सहस नहीं जुटा सका। मैं कमरे से बाहर निकल आया। मैंने मनन को यह बात बताई तो वह बोला--''अरे, बाबा तो दिन-रात लिखते ही रहते हैं... ।'' उसके लिए यह वाकया कुछ खास, कुछ नया नहीं था। लेकिन मेरे मन पर बेनीपुरीजी की निद्रानिमग्नावस्था में लेखन करती अद्भुत मुद्रा यथावत अंकित है। मैं भूल नहीं पाता उस असंभव का बेनीपुरीजी के हाथो सम्भव होना।
हिन्दी-साहित्य-मन्दिर का वह पुजारी जो जीवन-भर 'भारती' की पूजा-अर्चना में भासमान दीपक जलाता रहा, वह आज असहाय, लाचार, अशक्त, निरुपाय और हतचेत होकर भी इसी चेष्टा में निमग्न है। वह आज शय्याबद्ध होकर भी साहित्य-मन्दिर के द्वार पर पूजन के लिए उपस्थित है.... ।
[क्रमशः]

8 टिप्‍पणियां:

अर्कजेश ने कहा…

हम कहानी सुनने वाले बच्‍चों की तरह मुँह बाये सुन रहे हैं , आप कहते रहिये ।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

आज मुझे भी कहना पड रहा है कि मैं भी अर्कजेश जी की तरह मुंह बाये कहानी सुन रही हूं, आप कहते रहिये....अर्कजेश की टिप्पणी कितनी सटीक है!!!

अजित वडनेरकर ने कहा…

बड़े लोगों की बातें भी निराली होती हैं। बढ़िया संस्मरण चल रहा है। अगली कड़ी का इंतजार है।

वन्दना ने कहा…

sach sabka ek sa hal hai.......kya vyaktitva hoga......aap aise hi likhte rahiye.

अनिल कान्त : ने कहा…

aapke dwara benipuri ji ke baare mein itna kuchh janne ka mauka mila
sach mein bahut achchha lag raha hai

गौतम राजरिशी ने कहा…

एक और दुर्लभ दिलचस्प टुकड़ा एक महान साहित्यकार की जिंदगी का..." निद्रानिमग्नावस्था में लेखन करती अद्भुत मुद्रा" बेनीपुरी जी की इस छवि से कब मिल पाते हम अदने।

शुक्रिया ओझाजी!

...और इन अद्‍भुत किस्सों के संग-संग हम कुछ शब्दों का नया कमाल भी देखते जा रहे हैं..."'प्लास्टिक पैक तैयार नाश्ते"...मजा आ गया गुरूवर!

Apoorv ने कहा…

-''आनंद लेखक का बेटा है, रद्दी और महत्त्व के लेखन का फर्क न जानेगा ? पता नहीं कैसे तुम्हीं लोग ये अन्तर नहीं समझ पाते... ।'' मैं गर्वोन्नत हुआ उनके पूरे घर में पदाघात करता रहा उस दिन देर तक...

अपनी अनायास विरासत पे निर्दोष बचपन को कितनी खुशी होती है..आपकी इस पंक्ति से झलकता है..
द विंची के बारे मे भी कभी पढ़ा था कहीं कि सोते-सोते ही लिखने का या और काम भी कर लेते थे..
..बड़े लोग, विचित्र आदतें.

ज्योति सिंह ने कहा…

arkjesh ji ki tippani kafi prabhavshali hai hum sab ki man ki baat unhone kah di ,aapko padhne ki utsukta barabar bani rahti hai .vyastta ke karan aa nahi paa rahi thi magar apne mitr se zikr brabar karti rahi dhyan me liye .