रविवार, 16 फ़रवरी 2014

धूमकेतु-से चमके आचार्य नलिन...

[18 फरवरी को आचार्य नलिनविलोचन शर्माजी की जयंती है. वे हिंदी-काव्यालोचन और आलोचना-साहित्य के शिखर-पुरुष थे! जब मैं कुल 9 वर्ष का था, वे 1961 में संसार छोड़ गए थे...! अपने बाल्य-काल की कुछ खट्टी-मीठी यादों को मैंने 'धूमकेतु-से चमके आचार्य नलिन' नामक संस्मरण में सहेजा है.  उसी की पहली क़िस्त... आनंद]


मैं जानता हूँ और मानता भी हूँ कि आचार्य नलिनविलोचन शर्मा-जैसे विराट व्यक्तित्व पर कुछ लिखने की योग्यता-पात्रता मुझमें नहीं है, फिर भी मेरी स्मृतियों में उभरता है उनका दैदीप्यमान चेहरा.… बार-बार ! बहुत थोड़ी-सी बातें हैं मेरे पास, जिन्हें लिखकर मैं स्मृति-तर्पण करना चाहता हूँ।

अलौकिक प्रीति अर्जित करनेवाले आचार्य नलिन संस्कृत और दर्शन के प्रकांड विद्वान् पिता के यशस्वी सुपुत्र थे। उनके पिता महामहोपाध्याय पं रामावतार शर्मा मेरे पितामह (साहित्याचार्य पं चंद्रशेखर शास्त्री) के सहपाठी गुरुभाई थे। उन दोनों के बीच प्रगाढ़ मित्रता थी, जिसे दोनों ने आजीवन निभाया था। दोनों संस्कृत के उद्भट विद्वान् थे और वार्तालाप संस्कृत में करते थे तथा तत्कालीन अनेक साहित्यिक पुरस्कार-समितियों के परीक्षक-निर्णायक हुआ करते थे। यह दैव-विधान ही था कि दोनों अल्पजीवी हुए। मेरे पितामह ने ५१ वर्ष की आयु में और महामहोपाध्याय ने ५२ वर्ष की अल्पायु में शरीर-त्याग किया था, किन्तु दोनों ने अपने जीवन-काल में ही अपने-अपने पुत्रों को प्रीति की जिस डोर से बांध दिया था, वह डोर १९६१ में तब टूटी, जब ४५ वर्षों की छोटी-सी जीवन-यात्रा पूरी कर आचार्य नलिन संसार छोड़ गए।

बात पुरानी  है, सम्भवतः १९२२-२३ की। सूर्य का प्रकाश देखने के लिए तब तक मैं दुनिया में आया नहीं था। खड्गविलास प्रेस, पटना से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'शिक्षा' के सम्पादन का दायित्व जब मेरे पितामह उठा रहे थे और आचार्य नलिन के पिताश्री 'संस्कृत कोश' के प्रणयन में दत्तचित्त होकर लगे हुए थे, तब दोनों मित्र संयोग से पटना के एक ही भवन में आ जुटे थे। तब पिताजी की उम्र मात्र १२ वर्ष थी और नलिनजी ६ वर्ष के थे। इस तरह मेरे पिताश्री (पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') नलिनजी से उम्र में ६ वर्ष बड़े थे। वयोज्येष्ठता का यथेष्ट आदर और सम्मान नलिनजी पिताजी को बड़ी सावधानी से जीवन भर देते रहे और अपनी किशोरावस्था में बालक नलिन को पिताजी ने जो एक बार 'बबुआजी' कहा तो वे आजीवन उन्हें इसी सम्बोधन से पुकारते रहे...!

मैं सोचता हूँ और हैरान होता हूँ। हैरान होता हूँ कि जिन लोगों को प्रभु यशःकाय बनाते हैं, जिन्हें अलौकिक प्रीति अर्जित करने का अधिकारी बनाते हैं, विद्वत्ता के शीर्ष आसान पर बैठने के योग्य बनाते हैं, जिन्हें साहित्य और समाज को सवांरने का दायित्व सौंपते हैं, जिन्हें तपोनिष्ठ जीवन व्यतीत करने की योग्यता प्रदान कर एक विभूति बना देते हैं, उनका जीवन क्षीण क्यों कर देते हैं? यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है, लेकिन उसका कोई उत्तर मुझे नहीं मिलता, प्रश्न यथावत खड़ा रहता है। मेरे पितामह, महामहोपाध्याय और नलिनजी ने अल्पकालिक जीवनावधि में जो कुछ अर्जित किया, वह श्लाघनीय ही कहा जा सकता है।
[क्रमशः]

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-02-2014) को "पथिक गलत न था " (चर्चा मंच 1526) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'