गुरुवार, 18 अगस्त 2016

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का एक बहुत पुराना पत्र...

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पिताजी के नाम लिखा यह पत्र, आपके सामने रख रहा हूँ। पत्र जर्जर हो चुका है, लेकिन पिताजी के कागज़ों में पिछले ७५ वर्षों से बिना करवट लिए यह कैसे सानंद विश्राम कर रहा था, यही आश्चर्य का विषय है ! आज इसे जगत-सम्मुख रखकर मैं प्रसन्न हूँ। जय हिन्द!!
(--आनन्द.)


मूल प्रति का टंकित प्रारूप :
बजाजवाड़ी, वर्धा. ३०-१०-१९४१
प्रिय प्रफुल्लजी ,
आपके सब पत्र मिलते गए। पुस्तक का तीसरा फर्मा भी पहुँच गया। दो तो पहले ही पहुँच चुके थे। मेरे भाषण का वह अंश जो 'आरती' में उद्धृत होने जा रहा है, वह भी मिल गया। मुझसे जहाँ तक हो सकता है, मैं करने के लिए तैयार हूँ। इस पर भी अगर सफलता न मिले, तो हमारा दुर्भाग्य है। तौ भी, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। 'आरती' के विशेषांक के लिए मेरी इच्छा है कि मैं कुछ स्वतंत्र लिख भेजूँ। पुस्तक से उद्धरण विशेषांक के योग्य नहीं है। अभी समय है। मैं आशा करता हूँ कि कुछ लिख सकूँगा। अगर कोई चलता विषय जिस पर लिखने के लिए पढ़ने की ज़रूरत न हो, मिल जाता तो आसानी होती।
और सब आनंद है।
गान्धीजी ने नियम बना लिया है। वे पत्र-पत्रिकाओं के लिए न लेख लिखते हैं और न सन्देश भेजते हैं। इसलिए उनकी आशा तो छोड़ ही देनी चाहिए।
आपका--
ह०-- राजेन्द्र प्रसाद.
[पुनः : सन १९४०-४२ में पिताजी के सम्पादन में पटना से निकलनेवाली पत्रिका मासिक 'आरती' के सम्मान्य संरक्षक थे राजेन्द्र बाबू; उसी सन्दर्भ का है यह पत्र!]

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-08-2016) को "कबूतर-बिल्ली और कश्मीरी पंडित" (चर्चा अंक-2441) पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "सबसे तेज क्या? “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !