बुधवार, 3 अगस्त 2016

'लोहासिंह' की अंतर्कथा : रामेश्वर सिंह काश्यप ... (१)

पटना का एक पुराना मुहल्ला है चिरैयाटाँड़। इसी मुहल्ले में वैद्यनाथ आयुर्वेद की फैक्ट्री और प्रमुख कार्यालय है। कार्यालय परिसर जहाँ ख़त्म होता है, उससे थोड़ा आगे बढ़ते ही पूर्व दिशा की ओर एक सड़क जाती है। इसी सड़क पर एक वकील साहब का दुमंज़िला भवन था। इसी भवन के निचले तल पर ५ नवम्बर १९५२ की सुबह मैंने अपनी आँखें खोली थीं और इस जगत में फैला प्रकाश पहली-पहली बार देखा था। इसी भवन के प्रथम तल पर सपरिवार रहते थे रामेश्वर सिंह काश्यप। रोहतास जिले के सेमरा गांव में जन्मे (16 अगस्त, 1927) काश्यपजी मेरे छोटे चाचा (भालचंद्र ओझा) के घनिष्ठ मित्र थे। एक ही भवन में रहते हुए दोनों का दिन-रात का साथ तो था ही, पारिवारिक निकटता भी थी।
जिस ज़माने की बात कह रहा हूँ, काश्यपजी ने पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और उसी के बी.एन. कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए थे। मेरे छोटे चाचा कहानी-लेखक के रूप में प्रसिद्धि पा रहे थे। दोनों की उम्र में ख़ासा अंतर तो था, लेकिन दोनों पिताजी से बहुत छोटे थे। दोनों धूमपान के व्यसनी थे और उन्हें पिताजी का इतना लिहाज़ था कि छोटे चाचा रह-रहकर ऊपरी मंज़िल पर काश्यप चाचा के पास जा बैठते थे अथवा चिरैयाटाँड़ के चौराहे तक टहलते चले जाते तथा चौराहे की खपरैलवाली एक चाय की दूकान में जा बैठते, चाय पीते और धूमपान कर लौट आते।

उन दिनों चिरैयाटाँड़ का पुल निर्माणाधीन था। चाय की दूकान का छप्पर अपेक्षया कुछ अधिक झुका हुआ था, जिसमें बैठकर चाय या सिगरेट पीते हुए पुल के निर्माण का अर्धांश ही देखा जा सकता था। मेरे छोटे चाचाजी ने वहीं देखा था उन मज़दूरों को सिर पर बोझ ढोते हुए, जो एक पतली पगडण्डी पर पंक्तिबद्ध चलते थे; लेकिन छप्पर की ढलान के कारण मज़दूरों के पाँव ही दिखते थे, सिर नहीं। ऐसा लगता था, सिर्फ पाँव चल रहे हैं--कतारबद्ध! चाचाजी को अपनी एक कहानी का प्लॉट यहीं, इन्हीं मुद्राओं को देखकर मिला था। उनकी उस प्रसिद्ध कहानी का शीर्षक था--'क़तार के पैर'। आकाशवाणी, पटना के 'पुस्तक-चर्चा' कार्यक्रम में चाचाजी की इस कहानी की भूरि-भूरि प्रशंसा आचार्य नलिनविलोचन शर्माजी ने की थी।
बहारहाल, जब मैं डेढ़-दो साल का बालक था, माँ-पिताजी से सुना है, थोड़ा श्यामवर्णी था--ईषत स्थूल, घुंघराले बालोंवाला चंचल बालक ! काश्यप चाचा जब महाविद्यालय से लौट आते, तो मुझे अपनी गोदी में उठा लेते, हवा में उछालते और भोजपुरी में कहते--"ई लइकवा तS लोहासिंह हS भाई!' 'का हो लोहा सिंह, कइसन मिजाज बा ?" वगैरह...! काश्यपजी के इस लाड़-दुलार का मुझे तो बिलकुल स्मरण नहीं, लेकिन पिताजी बताते थे कि रोज़-रोज़ की इस पुकार से ही उन्हें 'लोहासिंह' नामक हास्य-नाटक लिखने की प्रेरणा मिली थी और वह नाटक इतना मकबूल हुआ था कि वर्षों तक उसका प्रसारण आकाशवाणी, पटना से साप्ताहिक रूप से होता रहा। विशेष बात यह थी कि हास्य-नाटिका में प्रमुख पात्र 'लोहासिंह' की भूमिका स्वयं काश्यप चाचा निभाते थे। संवाद की आदायगी का उनका अंदाज़ निराला था। उनके बोले हुए हर वाक्य श्रोताओं को कुछ इस तरह गुदगुदाते कि वे ठठाकर हँस पड़ते थे।
जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ और सोचने-समझने की मेरी बुद्धि किंचित विकसित हुई, तब की ठीक-ठीक याद है मुझे, पूरे बिहार में, गाँव-देहात और जनपदों में लोग 'लोहासिंह' नाटक के प्रसारण के पहले ही अपने-अपने रेडियो-सेट ऑन करके एकत्रित हो जाते थे और पूरा नाटक सुनकर खूब आनंदित होते थे। वे अगले सप्ताह की आतुर प्रतीक्षा किया करते थे। टी.वी. सीरियल 'रामायण' और 'महाभारत' के लिए घर-मुहल्ले और जनपदों में तो लोग बाद में एकत्रित हुए थे, उसके बहुत पहले 'लोहासिंह' के लिए गाँव-गाँव के चौपालों में रेडियो-सेट के पास पूरे गाँव के पुरुष जमा होते थे और रेडियो-नाटक का श्रवण कर आनंद-विभोर हो जाते थे। इस नाटक में पात्रों की बहुलता नहीं थी, बहुत कम पात्रों के बीच कथा का ऐसा ताना-बाना बुना जाता था कि श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते थे। इस रेडियो-नाटक से काश्यपजी को यथेष्ट प्रसिद्धि मिली थी। कहने का तात्पर्य यह कि 'लोहासिंह' नाटक का प्रेरक-शिशु मैं ही था, यह मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ था।...
'लोहासिंह' ब्रिटिश काल की सेना के एक अवकाश-प्राप्त सैनिक थे। उनकी पत्नी थीं--खदेरन को मदर (खदेरन की माँ), खदेरन (बाबू लोहा सिंह के सुपुत्र), बुलाकी [बाबू लोहा सिंह के साले साहब जो कुछ-कुछ मन्दबुद्धि थे और जिनकी शक्ल का चौखटा महिलाओं की तरह साफ़-सुथरा ('मेहरारूवन जइसन सफाचट) था], भगजोगनी (खदेरन की माँ की सेविका, जो मालिक और मालकिन, दोनों की मुँहलगी थी), फाटक बाबा (बाबू लोहा सिंह के पुरोहित)। इन पात्रों के अलावा कई पात्र स्क्रिप्ट की माँग के अनुसार आते-जाते रहते थे, जैसे--खोभारी (पीकर 'धुत्त' रहनेवाला गाँव का एक व्यक्ति), बंगाली डॉक्टर (परिवार नियोजन विषय पर आधारित हास्य नाटिका का एक पात्र)।
लोहा सिंह के मुँह से जब 'काबुल का मोर्चा पर सार्जेण्ट का मेमिन' का ज़िक्र आता, तो लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते थे। पटना आकाशवाणी से जब 'लोहासिंह' नाटक का प्रसारण होता तो पूरा बिहार थथम जाता और दूसरे दिन से हफ्ता भर उसके संवादों की गूँज सर्वत्र होती रहती। 'लोहसिंह' हास्य-नाटक के संवाद की एक बानगी देखना आनंददायी होगा--
"लोहा सिंह--'फाटक बाबा ! काबुल का मोरचा पर हम एक से एक करनैल का मेम आउर एक से एक जरनैल का मेमिन देखा, बाकी खदेरन को मदर का डिजैन का एक्को नहीं था. बुझाता है, जे बिधाता इसको बनाके ऊ सँचवे तूर दिया, जे मे कि इसको डिजैन का दोसर जनाना पैदे जन होखे।'
खदेरन की माँ--'आ मार बढ़नी रे ! जब देख त काबुल के मोरचा, जब देख त मेम आ मेमिन ! ई 'मेम' आ 'मेमिन' का होला जी?'
लोहा सिंह (ठहाका लगाते हुए)--'तुम मेम आ मेमिन का फरक नहीं बूझा ? अरे, मेम आ मेमिन में ऊहे फरक होखता है, जे 'जनाना' आ 'जनानी' में होखता है. का कहते हैं फ़ाटक बाबा ?'
फाटक बाबा--'जजमान ! तूँ चल्हाँकी के चीलम, काबीलियत के कनस्तर, अकिल के अलमारी आ बुधी के बटलोही हवS. तहार बराबरी केहू कर सकेला का ?'
लोहा सिंह'-'चाबस ! चाबस !"
कालान्तर में 'लोहसिंह' नामक एक फिल्म भी बनी थी, जो बिहार के बाहर बहुत नहीं चल सकी।
(अगली पोस्ट में समापन)
[चित्र : खेद है, नेट पर बहुत खोजने पर भी प्रो. रामेश्वर सिंह काश्यपजी का कोई चित्र मुझे नहीं मिला। अंततः उनकी कार्य-स्थली बिहार नेशनल कॉलेज का एक चित्र रखकर आलेख की पहली कड़ी पोस्ट कर रहा हूँ।]

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-08-2016) को "हरियाली तीज की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2426) पर भी होगी।
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हरियाली तीज की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anil Goel ने कहा…

जहाँ तक मुझे याद आता है, विविधभारती पर भी यह कार्यक्रम आता था. मैं दिल्ली में रेडियो के किसी स्टेशन पर यह कार्यक्रम सुना करता था. मैं गलत भी हो सकता हूँ. एक कार्यक्रम में (शायद) लोहा सिंह अदालत में हत्या के मुक़दमे में झूठी गवाही देने जाते हैं. जिसकी मौत हुई, उसे उन्होंने कभी देखा नहीं था. मजिस्ट्रेट यह बात समझता था. उसने लोहासिंह से पूछा, कि जिसकी हत्या हुई, वह लम्बे थे या छोटे. लोहासिंह बोले, "लम्बों में बैठें तो छोटे लगते थे, छोटों में बैठें, तो लम्बे लगते थे". "उनकी मूछें थीं या नहीं?" "हुज़ूर, वे हर अमावस्या को मूछें रख लेते थे, और पूरनमाशी को मूछें मुंडवा लेते थे". ये संवाद किसी अन्य लेखक के नाटक के भी हो सकते हैं, मुझे अब पचास साल पुरानी बातें कहाँ याद रहेंगी...बहुत छोटा था मैं उस समय...






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