मंगलवार, 14 जुलाई 2009

'तुम जब मिले...'

तुम जब मिले मुझको, नई दीवार-से मिले ।
लौटती हर राह पर, बीमार-से मिले ॥

कैसी खलिश कैसी व्यथा, कैसा मौसम था वहां,
तुम नदी में दूर जाती, धार-से मिले ॥

थी बहुत बारिश, मगर एक नदी सूखी रही,
शीत-लहरी में भी तुम अंगार-से मिले ॥

हर कशिश मेरे मन के आँगन में ठिठक गई,
तुम उसी दहलीज़ पर बेजार-से मिले ॥

अपनी गली की रौशनी में रूह मेरी मिल गई,
तुम उजालों के शहर में अन्धकार-से मिले ॥

आज रावण की कथा में राम मिलते हैं कहाँ ?
तुम विभीषण की तरह ही प्यार-से मिले ॥

9 टिप्‍पणियां:

Nidhi ने कहा…

bhut hi sundar
aapki upmaye bhut hi achhi hai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

थी बहुत बारिश, मगर एक नदी सूखी रही,
शीत-लहरी में भी तुम अंगार-से मिले ॥

आनन्द वर्धन ओझा जी!
सजी, सँवरी गज़ल के लिए
बधाई स्वीकार करें।

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi sundar .

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

Nidhi ji,
'तुम जब मिले...' आपको अच्छी लगी, उपमाओं ने प्रभावित किया; आभारी हूँ.
आ.

शोभना चौरे ने कहा…

थी बहुत बारिश, मगर एक नदी सूखी रही,
शीत-लहरी में भी तुम अंगार-से मिले ॥

lajvab gajal.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

शास्त्री जी,
आपकी बधाई का शुक्रिया ! थोडी व्यस्तता में था, देर से पढ़ी आपकी प्रतिक्रिया. --आ.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

शोभना जी, ज्योतिजी,
हिंदी ग़ज़लों का जो मानक स्वरुप दुष्यंतजी रच गए हैं, उसी के हाशिये पर लिखने की कोशिश है; आपको अच्छी लगी-- अहोभाग्य ! आभारी हूँ ! आ.

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

shukra he aap mere blog par padhaare, anyatha me itane achhe blog se anbhigya rah jata, aapko padhha to bas padhhta hi rah gayaa..yakeen maaniye doob gayaa. 'kyo he?' se shuru kar jab 'tum jab mile..'par samapan hua tb dekha ki kaafi vaqt beet gayaa he, itana behatreen vaqt gujara...jesa me amooman chahta rahta hoo../
'yaatra-katha-kaavya' ke musaafir ka 'mukt panchhi' ki tarah shbdankan karna saahitya me 'vilakshan pratidaan' hi to karna hua.

Harsh ने कहा…

rachna achchi lagi........