मंगलवार, 7 जुलाई 2009

'मैं मुक्त पंछी...' (अन्तिम किस्त)

(शेषांश)
बहरहाल, डायरी की पाण्डुलिपि तैयार कर और पत्र-मंजूषा को व्यवस्थित कर मैं बहुत संतुष्ट हुआ था। उसके बाद एक वर्ष बीत गया। दिनकरजी दिल्ली-पटना आते- जाते रहे। मैं अपनी पढ़ाई में मसरूफ रहा, लेकिन वह जब भी पटना आते मैं टेलीफोन पर उनसे बातें करता या जाकर मिल आता।
एक दिन दिल्ली से लिखा उनका पोस्टकार्ड पिताजी के नाम आया। उन्होंने लिखा था--''डायरी का प्रकाशन हो चुका है, इसकी जितनी प्रसन्नता मुझे है, उससे अधिक आनंदवर्धन को होगी। उनसे कहो कि घर जाकर केदार से एक प्रति ले लें। मैंने भूमिका में उन्हें आशीर्वाद दिया है।'' पत्र पढ़कर मैं रुक न सका, उसी दिन केदार भइया (दिनकरजी के कनिष्ठ पुत्र कविवर केदारनाथ सिंह) के पास जा पहुँचा और डायरी की एक प्रति ले आया। भूमिका के उस अंश को जब मैंने पढ़ा, जिसमें उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया था, तो मेरे पांव सचमुच ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे ।
साहित्यिक अभिरुचि के मेरे एक मित्र दिनकरजी के दर्शन के आकुल अभिलाषी थे। मित्र की जिद पर मैंने दिनकरजी को फोन किया। उस दिन बातचीत में दिनकरजी अवसन्न और खिन्न मन लगे, बोले--''तुम्हारे मित्र मिलना चाहते हैं, तो आज ही ले आओ। मुक्तजी से भी कहो कि मिलना हो तो आ जायें, कल मैं मुक्त पंछी बनकर उड़ जाऊँगा। दिल्ली जा रहा हूँ, वहां से दक्षिण की यात्रा पर निकलूंगा; फिर कब पटना लौटना होगा, कह नहीं सकता।''
कुछ ही दिनों बाद आकाशवाणी पर यह समाचार सुनकर मैं स्तब्ध रह गया कि हिन्दी साहित्य का सूर्य दक्षिण में अस्त हो गया है। उनका पार्थिव शरीर वायुयान से पटना लाया गया। पिताजी अपने परम मित्र को श्रधांजलि देने जाने लगे तो उन्होंने मुझसे पूछा--''तुम भी साथ चलते हो ?'' मैं उस पुरूष-सिंह को चिरनिद्रा में देखने का साहस नहीं जुटा सका। पिताजी अकेले ही गए। लौटे, तो उन्होंने कहा--''दिनकर के शव को देखकर लगता था, सो रहे हैं और अभी उठकर पूछ बैठेंगे--'कहो मित्र ! कैसे आना हुआ ?''
दिनकरजी चले गए। उनकी मधुर-मनोहर स्मृतियाँ मेरे मन-प्राण में बसी रह गईं । एक बार उन्होंने मेरी डायरी में दो पंक्तियाँ लिखी थीं--
'बड़ा वह आदमी जो जिंदगी भर काम करता है,
बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है॥'

सच है, दिनकरजी ने जीवन भर काम किया और अपनी कंचन काया की चादर को ज्यों का त्यों छोड़ गए। मेरे कानों में तो अब तक उनका वह वाक्य गूंजता रहता है--'मुक्त से कहो, मैं मुक्त पंछी बनकर उड़ जाऊँगा.... ।'
(समाप्त)
[इसके प्रारंभिक अंश मेरे ब्लॉग पर पढने की कृपा करें ]

6 टिप्‍पणियां:

Kishore Choudhary ने कहा…

अत्यधिक सुन्दर संस्मरण लिखा है आपने, युग पुरुषों के बारे में जानकारी मिली, एक फिराक साहब का शेर याद गया है आपके इस संस्मरण से " आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअसरों, जब उनको मालूम ये होगा तुमने फिराक को देखा है" मुझे आप से रश्क हुआ जाता है आपने दिनकर जी को देखा है और सिर्फ देखा ही नहीं ....

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

किशोरजी,
आपकी टिपण्णी का रंग ही कुछ और होता है. संस्मरण आपको अच्छा लगा, यह जानकार संतोष हुआ. धन्यवाद्. धन्यवाद् इसलिए कि आपने इसे पूरा पढने का श्रम किया है. फिराक का अशार बहुत पहले कभी पढ़ा था, आपने उसकी याद दिलाई, उसका शुक्रिया ! आप रश्क न करें; काल के अनंत प्रवाह में जो संयोग मिला, वह आपको नहीं और जो आपको मिलेगा, वह मुझे नहीं. यही सिलसिला रहेगा दुनियाए फानी में... सप्रीत...

Suman ने कहा…

nice

ज्योति सिंह ने कहा…

आनद जी ,नमस्कार
किशोर जी की तरह मेरे मन में भी ख्याल उठे थे ,मगर आपके जवाब में ये लाइन उभर आई ---जो मिल गया उसी को मुक़दर समझ लिया ,जो खो गया उसे भुलाता चला गया ,मुझे सस्मरण और जीवनी पढ़ना बेहद पसंद है .इसलिए इसे पढ़कर तो आँखे भर आई .जाने वाले अपनी यादो व बातों से मुक्त नहीं होने देते .अति उत्तम .

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

ज्योतिजी,
संस्मरण ने आपको अपने प्रभाव में लेकर करुणार्द्र कर दिया, तो लगता है मेरा लिखना सार्थक हुआ. धन्यवाद !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

क्या कहूं और क्या लिखूं!! इतनी सहज और सरल भाषा में आपने कितना कठिन काम किया है! पढते हुए लगता है, जैसे पूरी घटनायें खुद पाठक के साथ घट रही हैं. आपके पास तो युगपुरुषों के साथ बिताये एकाध दिन के नहीं, सालोंसाल के संस्मरण हैं. हम सब को भी लाभान्वित करते रहेंगे, ऐसी उम्मीद है.