गुरुवार, 30 जुलाई 2009

नवचेतना के छंद...


आज बूढा वृक्ष जर्जर
थककर सो गया है
भूमि-शय्या पर
अतल-तल तक धंसी
उसकी जड़ें
खींचती हैं --
जीवनी शक्ति,
शिथिल होती शिराएँ भी
स्पंदित हो रहीं अभी;
अधखुली आँखें
चेतना-उपचेतना
अर्ध-तंद्रा
अर्ध-जाग्रत की दशा में
देखती हैं स्वप्न !
और मानसलोक
अबतक बुन रहा
नवचेतना के छंद !!

13 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

इस ख़ूबसूरत और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

शोभना चौरे ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति |

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हर रचना कमाल! पंक्ति-पंक्ति बेमिसाल..

Arkjesh ने कहा…

सही कहा है |
वृक्ष कोमा में चला गया है |
ऊपरी लीपापोती से नवचेतना के छंद नहीं लिखे जा सकते |

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

बंधुवर (arkjeshji),
ठीक कहा आपने, किन्तु, बूढे वृक्ष को नवचेतना के छंद लिखने नहीं थे, वह तो उसकी शिथिल होती संरचना में भी उसका मानसलोक बुन रहा था; क्योंकि पत्तों में हरीतिमा, फूलों में लालिमा शेष थी, जीवन शेष था....

अर्कजेश *Arkjesh* ने कहा…

अग्रज आनंद वर्धन जी|
मै सन्दर्भ को समझ नहीं पाया था |
आपका आश्य मेरे लिए पूर्णतः स्पष्ट न होते हुए भी मैंने टिप्पणी की थी |
लेकिन अब शंका दूर हो गई है |
मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद |

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi gahari baat ko darshati ek rachana......badhaaee

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहत सुन्दर अभिव्यक्ति है।
बधाई स्वीकार करें।

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

आपका निम्न स्पष्टीकरण
"किन्तु, बूढे वृक्ष को नवचेतना के छंद लिखने नहीं थे, वह तो उसकी शिथिल होती संरचना में भी उसका मानसलोक बुन रहा था; क्योंकि पत्तों में हरीतिमा, फूलों में लालिमा शेष थी, जीवन शेष था...."
पूरे गीत के वास्तविक मंतव्य को स्पष्ट कर गया.
सुन्दर गहन भाव से ओतप्रोत गीत पर हार्दिक बधाई.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आप सबों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ ! सादर... आ.

Ram ने कहा…

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आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आप सबों का आभारी हूँ ! आ.

शोभना चौरे ने कहा…

vicharo ki anubhuti ak hi hai aur anubhuti jeevan ke anubhvo ki jhanki hai .
dhnywad