बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

एकल काव्य-पाठ की वह अद्भुत शाम


एक दिन अज्ञेयजी ने पिताजी को फोन पर सूचित किया कि वह लक्ष्मीमल्ल सिंघवीजी के घर पर एकल काव्य-पाठ करेंगे। उन्होंने पिताजी को काव्य-पाठ में आमंत्रित किया। पिताजी ने कहा--"मैं तो उपस्थित रहूँगा ही, लेकिन आपकी कवितायें सुनने की आतुरता और उनका आनंद उठाने की ललक आनंदवर्धन कोअधिक होगी। " पिताजी की बात सुनकर अज्ञेयजी ने मुझे भी साथ ले आने को कहा था।

सिघवीजी के आवास पर आयोजित अज्ञेयजी के एकल काव्य-पाठ की वह शाम मेरे जीवन की अविस्मरणीय शाम थी। अज्ञेयजी की कवितायें सुनने को वहाँ हिन्दी के दिग्गज रचनालारों का जमावाडा था, जिसमे रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, शमशेरबहादुर सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, रामनाथ अवस्थी, भवानी प्रसाद मिश्र, नंदकिशोर नंदन सरीखे अनेक वरिष्ठ रचनाकार उपस्थित थे। लॉन में हलके नाश्ते और चाय-कॉफी का प्रबंध था। सबों ने शाम की चाय पी और फिर एक लंबे हॉल में जा बैठे। श्रोताओं के सम्मुख अज्ञेयजी एक आसन पर विराजमान हुए और उन्होंने कवितायें पढ़नी शुरू कीं। आरोह-अवरोह-विहीन स्वर में गंभीर अर्थवत्ता में लिपटे स्वच्छ-शिष्ट शब्दों के मोती अज्ञेयजी लुटाते रहे और सुधीजन नीरव शान्ति के साथ उनकी काव्य-सुधा का पान करते रहे। उनके काव्य-पाठ का संतुलित ढंग और उच्चारण की मानक शुद्धता पर श्रोताओं का मन रीझ-रीझ जाता था। विद्वद्जनो की उस सभा में मैं भी एक किनारे सकुचाया-सा बैठा था। छोटी-बड़ी कई कविताओं के पाठ के बाद अज्ञेयजी ने 'सागर-मुद्रा' सुनानी शुरू की। एक पंक्ति की पकड़ बनाने ने जितना वक्त लगता, उतने समय में कई पंक्तियाँ श्रवण-रंध्रों का स्पर्श करती निकल जातीं। दो घंटों तक अज्ञेयजी की अमृतमयी वाणी हवा की तरंगों पर थिरकती रही और सर्वत्र मौन छाया रहा। न 'आह' न 'वाह', नीरव शान्ति ! काव्य-पाठ की समाप्ति पर भी मौन ही प्रशंसा का साक्षी बना। धीरे-धीरे बातचीत के स्वर गूंजने लगे। पिताजी शमशेरजी और त्रिलोचनजी के साथ अज्ञेयजी के पास पहुंचे। उनके पीछे मैं भी था। पिताजी ने अज्ञेयजी को साधुवाद दिया--"आज बड़ा आनंद हुआ। आपके स्वर-सम्मोहन और काव्य-शक्ति में आबद्ध रहा मन और मस्तिष्क।" त्रिलोचनजी ने भी प्रशंसा के कुछ शब्द कहे और अज्ञेयजी को प्रणाम निवेदित किया। विनय की प्रतिमूर्ति शमशेरजी ने बहुत अधिक झुककर प्रणाम किया, बोले कुछ नहीं । फिर तो कवियों, साहित्यकारों ने अज्ञेयजी को घेर लिया और उन्हें साधुवाद देने लगे। धीरे-धीरे लोग टोलियों में बँट गए और बातचीत के शोर से पूरा हॉल गूंजने लगा।
सिघवीजी के घर से अतिथि विदा होने लगे थे। भीड़-भाड़कम हुई तो अज्ञेयजी ने पिताजी से कहा--"आप मेरे साथ घर चले चलिए, वहां से ड्राईवर आपको मॉडल टाऊन छोड़ आएगा।" पिताजी ने प्रतुत्तर में कहा--"शमशेर और त्रिलोचनजी भी तो मॉडल टाऊन ही जायेंगे, मैं उन्हीं के साथ चला जाऊँगा।" अज्ञेयजी बोले--"उन्हें भी अपने साथ ले लीजिये, कार में तो हम सभी आ जायेंगे।" तभी मैंने हस्तक्षेप किया--"आपने अपनी कविता-पुस्तकों का एक सेट, जो मेरे लिए निकाल रखा है, आज अगर वह भी मिल जाए तो चलना बहुत सार्थक होगा; क्योंकि उन्हें मुझे बस में ढोना नहीं पड़ेगा। पुस्तकें कार से ही घर तक पहुँच जायेंगी।" अज्ञेयजी मुस्कुराए और बोले--"हाँ, पुस्तकें तो निकाल ली हैं, बस उन्हें बंधना है; चलिए, आज वह काम भी हो जाए।" बहरहाल, अज्ञेयजी ड्राइविंग सीट पर और उनकी बगल में पिताजी बैठे, पिछली सीट पर शमशेरजी और त्रिलोचनजी के साथ मैं बैठ गया। गाड़ी सिंघवी जी के घर से बाहर निकली और हौज़-ख़ास की ओर चल पड़ी। बातचीत के बीच अज्ञेयजी गंभीरतापूर्वक बोले--"लगता है, 'सागर-मुद्रा' कई लोगों के ऊपर से निकल गई।" पिताजी हंस पड़े और बोले--"ऊपर से नहीं, सिरके ऊपर से।" पिताजी के कथन को शमशेरजी और त्रिलोचनजी का समर्थन मिला और कार में सबों की हँसी गूंजने लगी।
अज्ञेयजी ने घर पहुंचकर 'बावरा अहेरी' से 'अरे यायावर रहेगा याद' तक की अपनी समस्त पुस्तकों का एक सेट मेरे सामने रखा और उन्हें बांधने के लिए रस्सी की तलाश करने लगे। थोडी देर बाद वह मूंज की रस्सी लेकर आए और मेरे आग्रह करने पर भी स्वयं ही बड़े करीने से पुस्तक के आठों किनारों पर दफ्ती के छोटे-छोटे टुकड़े लगाकर उन्हें बंधा, फिर मेरे हवाले किया। मैंने श्रद्धापूर्वक पुस्तकों के बण्डल को सिर-माथे से लगाकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
एक बार मैंने अज्ञेयजी से पूछा था--"आप मुझे 'आप' क्यों कहते हैं ? मैं तो आपके लिए बच्चे-जैसा हूँ।" उन्होंने पूरी सहजता से कहा था--"सच तो यह है कि मैं सबों को 'आप' ही कहता हूँ। मेरे पिताजी ने हम सभी भाई-बहनों को ऐसी ही शिक्षा दी है। अब तो ऐसा अभ्यास हो गया है कि किसी के लिए भी 'तुम' संबोधन निकलता ही नहीं। आप इसे अन्यथा न लें।"
[क्रमशः]

4 टिप्‍पणियां:

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

-"आप मुझे 'आप' क्यों कहते हैं ? मैं तो आपके लिए बच्चे-जैसा हूँ।" उन्होंने पूरी सहजता से कहा था--"सच तो यह है कि मैं सबों को 'आप' ही कहता हूँ। मेरे पिताजी ने हम सभी भाई-बहनों को ऐसी ही शिक्षा दी है। अब तो ऐसा अभ्यास हो गया है कि किसी के लिए भी 'तुम' संबोधन निकलता ही नहीं। आप इसे अन्यथा न लें।"

कुल मिलकर बात सहजता की है, और आज के दौर में यही सहजता पता नहीं कहाँ गम होती जा रही है.

संस्मरण अच्छा रहा, काफी पसंद आया........... पर हाँ कुछ भी सर के ऊपर से नहीं निकला, सब कुछ समझ के दायरे में बड़ी सहजता से रहा.

हार्दिक आभार. अगली कड़ी का इंतजार......

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मन को बांधे रखता है संस्मरण.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

चन्द्रमोहन गुप्तजी,
वंदनाजी,
छेड़ा जिसे है बहुत डरते-डरते,
वो बढेगी कहानी जरा धीरे-धीरे !
आभारी हूँ !
--आ.

गौतम राजरिशी ने कहा…

आह !...वो अप्रतिम शाम और वो अप्रतिम कार-यात्रा आपकी! किसको रश्क न होगा आपकी खुशनसीबी पर...!