गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

वधू-स्वागत की अनूठी शाम
[पांचवी किस्त]

राजकमल की सेवा के दौरान १९७८ में मेरा विवाह हुआ था। वधू-स्वागत के दिन शाम को मेरे मॉडल टाऊन स्थित आवास की छत पर कनात और शामियाना लगा था। वधू-स्वागत का वह समारोह इसलिए भी अनूठा था कि उसमे भारत-प्रसिद्ध साहित्यकार पधारे थे--सर्वश्री वियोगी हरि, जैनेन्द्र, त्रिलोचनं शास्त्री, शमशेर काहादुर सिंह, आनंद विद्यालंकार, अजित कुमार, शीला संधू, विष्णु प्रभाकर, मार्तंड उपाध्याय, गिरिजा कुमार माथुर और अज्ञेयजी। उस अवसर का अज्ञेयजी का चित्र मेरे संग्रह में आज भी सुरक्षित है। जब मैंने अपनी नवोढा पत्नी के साथ अज्ञेयजी के चरण छुए, उन्होंने धीरे-से कहा--"मैं कुछ निश्चित नहीं कर सका कि आपके लिए क्या ले आऊं। ठीक चलते वक्त यही आपके लिए उठा लाया हूँ।" यह कहकर एक पैकेट मेरी ओर बढ़ा दिया। समारोह के बाद मैंने उस पैकेट को खोलकर देखा, उसमे उनकी कविताओं का संग्रह था--'चुनी हुई कवितायें'।
वधू-स्वागत कि वह शाम बूंद-बूंदकर रात में ढलने लगी और मुझे ऐसा लगता रहा कि हिन्दी साहित्याकाश के उज्जवल सितारों के साथ मैं अपनी नई-नई जीवनसंगिनी के पार्श्व में खड़ा मुग्ध भाव से विचार रहा हूँ। सच कहूँ, वह शाम जीवन की अविस्मरणीय शाम थी--अविश्वसनीय शाम !
मेरी पत्नी बुंदेलखंड की हैं--झाँसी से १०० किलोमीटर की दूरी पर नौगाँव छावनी (म.प्र.) की। अपने माता-पिता के यहाँ जाने के लिए उन्हें हमेशा निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से सुबह ५.३० पर झाँसी के लिए ट्रेन लेनी पड़ती थी। मॉडल टाऊन से निजामुद्दीन की दूरी इतनी ज्यादा थी कि ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह ४ बजे ही घर से निकलना पड़ता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि अल्लसुबह कोई सवारी न मिलने के कारण निजामुद्दीन पहुँचने में विलंब हो गया और ट्रेन नहीं, हम छूट गए। एक बार इस असुविधा की चर्चा पिताजी ने अज्ञेयजी से कि उन्होंने पिताजी से आग्रहपूर्वक कहा था--"आप आनंदजी से कहें कि यात्रा की पूर्व-संध्या में वह मेरे घर आ जाएँ, यहाँ से निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तो पैदल का रास्ता है।" उनकी इस सलाह पर हम जो एक बार अज्ञेयजी के हौज़-ख़ास वाले निवास पर गए तो प्रायः डेढ़-दो वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। देर शाम तक अज्ञेयजी के घर पहुंचना, वहीँ रात्रि-विश्राम करके सुबह-सुबह झाँसी के लिए प्रस्थान करना। हर बार अज्ञेयजी हमें छोड़ने स्टेशन तक कार से चले आते, इलाजी भी साथ होतीं। सुरु-शुरू में एक-दो बार यह कहने पर कि 'आप कष्ट क्यों करते हैं, हम चले जायेंगे', वह सहजता से कहते--" चलिए, मैं भी चलता हूँ। मेरी सुबह की सैर हो जायेगी।" उनके इस उत्तर से हम निरुपाय हो जाते।
अज्ञेयजी जिनके लिए सहज थे, बहुत सहज थे। जिनके लिए दुरूह थे, बहुत दुरूह थे। जिनके लिए अज्ञेयजी सहज थे, उनका चयन वह बड़ी सावधानी से करते थे। ऐसे सहज संबंधों वाले लोगों की संख्या अज्ञेयजी के दीर्घ जीवन में कम ही थी। पिताजी उन बहुत थोड़े लोगों में एक थे, यह मैं अपने अनुभव से जानता हूँ। उनकी जो प्रीती और स्नेह मुझे प्राप्त था, वह तो पिताजी की अनन्य मित्रता का प्रतिफल था; लेकिन प्रायः ६-७ वर्षों तक उनके बहुत निकट रहते-रहते और मेरी परख करते-करते अज्ञेयजी ने मुझे भी पूरी हार्दिकता से स्वीकार कर लिया था; इतना कहने में मुझे संकोच नहीं है। उनकी सहज प्रीती भुलाये नहीं भूलती। ...
[क्रमशः]

8 टिप्‍पणियां:

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

आदरणीय आनन्दवर्धन जी,

जिस तरह से आप एक एक परत खोल रहें हैं मुझे तो यह लगने लगा है कि यदि आपका ही सानिध्य मिल जाये तो यह मेरे लिये राम से बड़ा राम का नाम के अनुरूप चरितार्थ होगा।

जीवन में इतने सारे साहित्य मनीषियों का सानिध्य/सामीप्य दुर्लभ होता है मैं तो कह सकता हूँ रामकृपा कछु दुर्लभ नाहि।

मैं अपने दिल्ली प्रवास में कम-अज-कम एकबार तो आपसे मिलना ही चाहूंगा आगे फिर आपकी मर्जी पर रहेगा कि आप चाहेंगे कि नही, मैं अकिंचन तो जरूर चाहूंगा।

आपके संस्मरण वो बुझती हुई आशा की लौ को फिर जागृत कर देते हैं कि यह धरा अभी भी खाली नही हुई है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

यदि संभव हो तो अपना संपर्कसूत्र ई-मेल से दीजियेगा शायद एकबार बात करने से यह बैचेनी थोड़ी कम हो।

अर्कजेश ने कहा…

बढिया चल रही है यात्रा ! आनन्द आ रहा है ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

अज्ञेय जी के संस्मरणों की श्रृंखला
बहुत बढ़िया चल रही है।

अनिल कान्त : ने कहा…

परत दर परत जिस तरह से आपके शब्दों में अज्ञेय जी को जानने का मौका मिल रहे है, सच में वो बहुत सुखद है

अनिल कान्त : ने कहा…

कृपया रहे को रहा पढें

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

पढते-पढते रोमांच हो आता है. सिहरन सी होने लगती है.एक बार फिर सुझाव दूंगी, कि अपने इस अविस्मरणीय संस्मरणों में उस वक्त की तस्वीरों को ज़रूर शामिल करें. आपके पास तो अथाह भंडार है तस्वीरों का....एक भूल सुधार- आपकी शादी का वर्ष १९८७ नहीं १९७८ है..हा..हा..अंक इधर-उधर हो गये.

गौतम राजरिशी ने कहा…

इस शाम-विशेष को तो अविस्मरणीय- अविश्वसनीय होना ही था...हिंदी-साहित्य की इतनी सारी विभूतियां एक साथ उपस्थित हों तो क्यों नहीं!

शुक्रिया ओझाजी इस संस्मरण को हम तुच्छ जनों संग बाँटने के लिये!

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

राजरिशीजी,
'तुच्छ-जनों' में अपने को शुमार न कीजिये बन्धु ! परसों ही वंदना अवस्थी दुबेजी से पता चला है कि अaपने सीने पर गोली खाई है, देश कि रक्षा में सन्नद्ध ऐसे रण-बाँकुरे भला तुच्छ-जन कैसे हो सकते हैं ? वे तो परम आदरणीय और ऐसे लोग हैं, जिन पर समूचे देश को गर्व है !
नेह-नमन ! अप्रीत--आ.