गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

एक दीप प्रज्ज्वलित रखा है...


तुम उस डाली के फूल
जिसके नीचे बैठ कभी--
मैंने अपनी थकन मिटाई
और कभी छाती में अपनी
शुद्ध, सुगन्धित, हिम-शीतल-सी
वायु भरी थी,
जाने विधि की क्या इच्छा थी
औचक क्यों टूटी वह डाली,
अभी हरी थी !

आज इसी चिंतन-क्षण में--
मैं देख रहा हूँ
विगत और आगत पथ को
जो धूल उडाता चला जा रहा
काल-चक्र के उस रथ को !

जान रहा हूँ, शोक व्यर्थ है
फिर भी मन के सूने आँगन में,
छिपा मोह के महापाश को;
स्मृति-तर्पण-सा लगता मुझको--
द्वार तुम्हारे आकर फिर-से दस्तक देना,
जाने क्योंकर ठिठक रहे हैं
मेरे आकुल चरण चपल !
मन के झंझावातों से विह्वल,
क्या शेष रहेगा यह शतदल ?

जीवन की गति निर्झर-सी है,
जो बीत गई, वह विगत कथा थी,
और अभी आगत क्षण का
स्वागत हो, मंगल-गान, घोष हो--
ऐसी ही तो प्राचीन प्रथा थी !!

मन के जिस कोने में मैंने
एक दीप प्रज्ज्वलित रखा है
आलोक उसी से लेकर मैं तो
चलता हूँ जीवन-पथ पर;
उसके प्रकाश से जगमग है
सृष्टि समग्र, यह मेरा घर !!!

विज्ञ वही है,
जो विनाश के कठिन क्षणों में,
आधी अपनी सम्पदा बचा ले,
सब अनीति सहकर, अन्तर में--
आलोक भरा एक दीप जला ले !

ध्यान रहे,
उदात्तता और आदर्शों की
जो थाती हमको सहज मिली है,
उसका क्षरण न हो पाए ।
आधार और संस्कार को कभी
ठेस नहीं लगने पाये !!

13 टिप्‍पणियां:

Harkirat Haqeer ने कहा…

विज्ञ वही है,
जो विनाश के कठिन क्षणों में,
आधी अपनी सम्पदा बचा ले,
सब अनीति सहकर, अन्तर में--
आलोक भरा एक दीप जला ले !

बहुत सुंदर.....!!

ध्यान रहे,
उदात्तता और आदर्शों की
जो थाती हमको सहज मिली है,
उसका क्षरण न हो पाए ।
आधार और संस्कार को कभी
ठेस नहीं लगने पाये !!

आनंद जी वर्तमान हालातों में संस्कारों को बचाए रखना तो और भी जरुरी हो गया है .....!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मन के जिस कोने में मैंने
एक दीप प्रज्ज्वलित रखा है
आलोक उसी से लेकर मैं तो
चलता हूँ जीवन-पथ पर;
उसके प्रकाश से जगमग है
सृष्टि समग्र, यह मेरा घर !!!

ओझा जी!
चावल पुराना होकर ही सुगन्ध बिखेरता है।
बहुत सुन्दर!

ओम आर्य ने कहा…

ध्यान रहे,
उदात्तता और आदर्शों की
जो थाती हमको सहज मिली है,
उसका क्षरण न हो पाए ।
आधार और संस्कार को कभी
ठेस नहीं लगने पाये !!

हरकिरत जी के बातो से मै भी सहमत हूँ .....अगर कुछ बचना है तो अपनी संस्कृति और अपनी प्रकृति को बचाये .......बहुत ही सुन्दर भाव से भरी एक बेहतरीन रचना....सादर

ओम आर्य

वन्दना ने कहा…

ye deep aise hi prajwalit rahe aur margdarshan karta rahe.

अनिल कान्त : ने कहा…

एक बेहतरीन रचना पढने को मिली
बेहतरीन भावों से सजी हुई
पढ़कर मन प्रसन्न हो गया इतनी परिपक्व लेखन देखकर

ज्योति सिंह ने कहा…

विज्ञ वही है,
जो विनाश के कठिन क्षणों में,
आधी अपनी सम्पदा बचा ले,
सब अनीति सहकर, अन्तर में--
आलोक भरा एक दीप जला ले
bahut khoobsurat .

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

विज्ञ वही है,
जो विनाश के कठिन क्षणों में,
आधी अपनी सम्पदा बचा ले,
सब अनीति सहकर, अन्तर में--
आलोक भरा एक दीप जला ले !

गम्भीर चिन्तन और चेतनायुक्त कविता. बधाई.

Kishore Choudhary ने कहा…

जय हो !
कुछ कहने का सामर्थ्य नहीं है इस रचना पर. आनंद के अतिरेक में हूँ शब्दों के अपनेपन को महसूस कर रहा हूँ .

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

हकीरजी, ओम भाई, वंदनाजी, अनिलकान्तजी, ज्योतिजी,
आप सबों की टिपण्णी के लिए आभारी हूँ !
वंदना अवस्थी दुबेजी और किशोर जी,
ऋतज को आशीष देते हुए आपकी टिपण्णी पर मैंने एक प्रति-टिपण्णी लिखी है, कृपया उसे पढने का कष्ट करें और नहले पे दहला दें, तो जानूं !
सप्रीत--आ.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

हकीरजी, ओम भाई, वंदनाजी, अनिलकान्तजी, ज्योतिजी,
आप सबों की टिपण्णी के लिए आभारी हूँ !
वंदना अवस्थी दुबेजी और किशोर जी,
ऋतज को आशीष देते हुए आपकी टिपण्णी पर मैंने एक प्रति-टिपण्णी लिखी है, कृपया उसे पढने का कष्ट करें और नहले पे दहला दें, तो जानूं !
सप्रीत--आ.

Apoorv ने कहा…

कविता की शुरुआती पंक्तियां किसी आशंका सी भयभीत करती हैं..मगर कविता के वैचारिक प्रवाह मे आगे-आगे सोच को एक ठोस समझ और ज्ञान का आधार सा मिलता जाता है..बहुत सारे नीति और ज्ञान के अनमोल रत्न निकाल कर रख दिये आपने विचारों के इस समुद्र-मंथन मे..काफ़ी कुछ सीखने को मिलता रहता है..आपकी प्रतिभा और अनुभव से..
अंततः उस आशा-दीप की ज्योति को सलाम..उसके चिरंतनता की आशा के साथ..

मन के जिस कोने में मैंने
एक दीप प्रज्ज्वलित रखा है
आलोक उसी से लेकर मैं तो
चलता हूँ जीवन-पथ पर;

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

आदरणीय आनन्दवर्धन जी,

जान रहा हूँ, शोक व्यर्थ है
फिर भी मन के सूने आँगन में,
छिपा मोह के महापाश को;
स्मृति-तर्पण-सा लगता मुझको--
द्वार तुम्हारे आकर फिर-से दस्तक देना,
जाने क्योंकर ठिठक रहे हैं
मेरे आकुल चरण चपल !
मन के झंझावातों से विह्वल,
क्या शेष रहेगा यह शतदल ?

वाह! व्याकुल मनोदशा का कितना सटीक वर्णन जैसे शब्द उतरे आ रहे हों दिल में।

आपसे बतिया के मुझे जो अपार सुख मिला, वह किसी भी माध्यम से अभिव्यक्त नही किया जा सकता है।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

Apanatva ने कहा…

जो धूल उडाता चला जा रहा
काल-चक्र के उस रथ को !
ateet bhavishy douno ko sanjo le chalatee badee sunder rachana . bahut hee sunder rachana .