शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

आ पहुँची 'स्मृतिगंधा '...
[नौवीं किस्त]

दिल्ली की तेज़-रफ़्तार और तीखी धूप-भरी ज़िन्दगी से निकलकर हम सपरिवार पटना लौट आए थे। संभवतः १९८६ के अन्तिम दिनों की बात है। एक दिन पिताजी के नाम दिल्ली से एक रजिस्टर्ड पैकेट पटना आया। उसमें अज्ञेयजी की सद्यःप्रकाशित पुस्तक 'स्मृतिगंधा' की एक प्रति थी। पुस्तक के पहले सादे पृष्ठ पर अज्ञेयजी ने कलम से लिखा था--''त्वदीयं वस्तु गोविन्द--अज्ञेय।' और दूसरे पृष्ठ पर मुद्रित पंक्ति थी--''परम प्रिय मित्र पं० प्रफुल्ल चंद्र ओझा 'मुक्त' को, जो जब-तब मुझे भी मेरी याद दिलाते रहे हैं--अज्ञेय।'' अपने संस्मरणों का यह संग्रह अज्ञेयजी ने पिताजी को ही समर्पित किया था। अज्ञेयजी की हस्ताक्षरित प्रति होने के कारण वह मेरे लिए बड़े महत्व की थी और मैं उसे सहेजकर रखना चाहता था। लेकिन स्वयं पढने के लिए पिताजी ने उसे अपने पास रख लिया। प्रायः पन्द्रह दिनों के बाद पूछने पर पिताजी ने कहा था--''भई, रामायण के काम में लगा रहा, अभी पूरी पढ़ नहीं सका हूँ। ख़त्म कर लूँ, तो ले लेना।'' लेकिन कुछ ही दिनों बाद मेरे फिर पूछने और खोजने पर वह पुस्तक पिताजी के सिरहाने और पूरे घर में कहीं नहीं मिली। उसे कोई पुस्तकप्रेमी बिना बताये ही पिताजी के बिस्तर से उठा ले गए थे। मुझे बड़ा क्षोभ हुआ और मैं पिताजी पर दबाव डालने लगा कि वह अज्ञेयजी को लिखें कि वही पंक्ति फिर से लिखकर 'स्मृतिगंधा' की एक प्रति और भेज दें। मेरे हठ से विवश होकर पिताजी ने इसी आशय का एक पत्र अज्ञेयजी को लिख भेजा। कई दिन बीत गए, अज्ञेयजी का कोई उत्तर न आया, न प्रति आयी। तभी एक दिन ज्ञात हुआ कि पटना के अमुक प्रकाशक दिल्ली जानेवाले हैं। मैंने यह बात पिताजी को बतायी और बार-बार उनसे आग्रह करने लगा कि अज्ञेयजी को एक और पत्र लिख दें कि उन्हीं प्रकाशक महोदय के हाथो 'स्मृतिगंधा' कि एक प्रति उपर्युक्त वाक्य लिखकर भेज दें। पिताजी को एक और ख़त लिखना प्रीतिकर तो नहीं लग रहा था; लेकिन मेरी जिद के कारण इसी आशय का एक पत्र उन्होंने पुनः लिखा। सप्ताह भर बाद प्रकाशक महोदय पटना लौट आए, पुस्तक की प्रति नहीं आयी। मैं दुखी हुआ और सोचने लगा कि अब क्या करूँ !
कुछ ही दिन बीते होंगे कि अचानक डाक से स्मृतिगंधा' की प्रति आ पहुँची। साथ में अज्ञेयजी का पत्र भी था। उन्होंने नमस्कारोपरांत लिखा था--''आपका आदेश था कि (अमुक ) ...सज्जन के हाथो 'स्मृतिगंधा' की प्रति भिजवा दूँ। यह तो ऐसा ही हुआ, जैसे बाघ के हाथो किसी को मांस की थाली पहुंचाना चाहना हो। ठीक-ठीक स्मरण नहीं कि पिछली प्रति में क्या लिखा था, अब जो लिखा है, सम्भव है, वही लिखा हो।'' अज्ञेयजी ने ''त्वदीयं वस्तु गोविन्द...' वाली पूरी पंक्ति लिखकर हस्ताक्षर किया था। लंबे समय तक वह प्रति मेरे पास सुरक्षित रही; लेकिन १९९५ में पिताजी के निधन के बाद घर में जो उथल-पुथल हुई, उसमे वह प्रति भी किसी बाघ के हाथो लग ही गई। पुस्तकप्रेमियों की यह पीड़ा अज्ञेयजी खूब पहचानते थे। ...
[शेषांश अगली किस्त में]

3 टिप्‍पणियां:

Apoorv ने कहा…

ओझा जी आपकी इस संस्मरण-क्र्म मे इतनी कशिश थी कि हर पोस्ट को बार-बार पढ़ा मैने..घर से वापस लौट के भी सबसे पहले जिन ब्लॉग्स को देखा उनमे आपका ब्लॉग था..मगर कुछ टिप्पणी करने को ऐसे सूझता ही नही था..सो पहले कुछ और बार पढ़ कर अपनी बुद्धि को स्थिर करने का प्रयास करता था..तभी थोडा लेट भी रहा टिप्पणी करने मे..
अज्ञेय जी के कृतित्व से सबसे पहले (शेखर एक जीवनी से भी पहले) नैवेद्यदान (सलेबस मे) और एक छोटी सी कविता के द्वारा परिचित हुआ था..

झींगुरों की लोरियाँ
सुला गयीं थी गाँव को
झोपड़े हिंडोलों सी झुला रही थीं
धीमे-धीमे
उजली कपास धूम-डोरियाँ

और समझ सकते हैं आप कि क्या प्रभाव हुआ होगा..

हाँ एक डरते-डरते सुझाव रखूँगा कि इस पंक्ति मे
'त्वदीयं वास्तु गोविन्द--अज्ञेय।'
वास्तु की बजाय वस्तु हो सकता है...अगर इस श्लोक से ली गयी है
त्वदीयं वस्तु गोविंदं, तुभ्यमेव समर्पयेत्‌.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आपूर्वजी,
आपने मेरी पुकार सुन ली, आभारी हूँ !
स्पेस मारकर हिंदी लिखने का अभ्यास नहीं है; ज्यादातर काम वॉकमैन चाणक्य ९०२ में करता हूँ, उसी का अभ्यास है; इसी मुगालते में मेरी असावधानी से 'वस्तु' का 'वास्तु' हो गया था ! एक आवश्यक शुद्धिकरण की और मेरा ध्यान आकृष्ट कर उचित ही किया है; संकोच का कोई कारण नहीं है; जब-जहां ऐसी अशुद्धि मिले, रेखांकित करें-- मुझे प्रसन्नता ही होगी. बहुत-बहुत आभार सहित--आ.

गौतम राजरिशी ने कहा…

पिछले साल ही अज्ञेय के प्रति मेरी दीवानगी देख कर मेरी अर्धांगिनी ने "स्मृतिगंधा" की एक प्रति भेंट में दी थी...सोचा भी न था कभी कि ये पुस्तक जिस महानुभाव को समर्पित है, कभी उन्हीं के अनूठे संस्मरण में इस पुस्तक जिक्र पढूंगा!!!

उन दोनों प्रतियों के गुम हो जाने की त्रासदि का तो हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते...