सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

एक अम्बेसेडर रुकी, उससे उतरे अज्ञेय
[सातवीं किस्त]

राजकमल से अज्ञेयजी के सम्बन्ध सुमधुर नहीं थे। उन्होंने अपनी पुस्तकें भी वहां से हटा ली थीं। उनका वहां आना-जाना भी बहुत दिनों . से नहीं हुआ था। राजकमल प्रकाशन का मुख्य द्वार शीशे का था और प्रबंध निदेशिका का कक्ष भी लकडी की सुंदर नक्काशीदार जाली का था, जिससे पूरा दफ्तर और दरियागंज की मुख्य सड़क दीखती थी। शीलाजी के कक्ष के ठीक बाहर एक बड़ी-सी मेज़ पर मैं काम करता था। दफ्तर के अधिकांश कर्मचारी इसी बड़े-से हॉल में बैठते थे। एक दिन मैं अपनी सीट पर बैठा किसी पाण्डुलिपि से आँखें फोड़ रहा था कि कानों में बहुत धीमी आवाज़ पड़ी--"अज्ञेयजी हैं शायद !" मैंने तत्काल सड़क कीओर देखा। मेरी दृष्टि .एक सफ़ेद अम्बेसेडर कार पर पड़ी, जो राजकमल के द्वार पर आ खड़ी हुई थी। में उधर से दृष्टि हटा पाटा, इससे पहले देखा--कार का पिछला दरवाज़ा खुला और उससे उतरे अज्ञेय ! वह संयत भाव से आगे बढे। उन्होंने शीशे का द्वार खोला और राजकमल में प्रविष्ट हुए। मैंने सोचा, वह शीलाजी से मिलने आए हैं; लेकिन मेरे सहकर्मियों के चहरे पर विस्मय के भाव थे। मैं कुछ समझ सकूँ या संभल पाऊं अथवा अपनी कुर्सी से उठकर अज्ञेयजी की अगवानी के लिए आगे बढ़ पाऊं, वह तो ठीक मेरी मेज़ के सामने आ खड़े हुए। मैं घबराकर कुर्सी से उठा और आगे बढ़कर उनके चरण छुए। वहीँ खड़े-खड़े उन्होंने मुझसे कहा--"मुझे आपका दो मिनट का वक्त चाहिए। क्या आप व्यस्त हैं ?" मेरे इनकार करने पर उन्होंने फिर पूछा-"आप मेरी कार तक साथ चल सकेंगे ?" मैंने हामी भरी और उनके साथ हो लिया। राजकमल में बड़े-से हॉल में मैंने कनखियों से देखा--पूरा दफ्तर स्तब्ध खड़ा था और आश्चर्य से अज्ञेयजी को और मुझे देख रहा था। में एक पुलकित भाव से उनके साथ राजकमल से बाहर निकला। कार के पास पहुंचकर अज्ञेयजी ने प्रूफ़ और रचनाओ का एक पुलिंदा निकाला और मेरी ओर बढाते हुए बोले--"इसे मुक्तजी को दे दीजियेगा। मैं इधर से गुजर रहा था, इसलिए सोचा आपको देता चलूँ; अन्यथा शाम को आपको बुलाना पड़ता और घर पहुँचने में आपको आज भी विलंब हो जाता।"
मुझे कागजों का पुलिंदा देकर अज्ञेयजी तो चले गए; लेकिन में उनकी सज्जनता,सद्भाव और महत्ता को नतग्रीव हो नमन करता रहा। ठीकरे को भी महत्व देना कोई अज्ञेयजी से सीखे। ...

१९८२ में मैंने नौकरी-जैसे प्रतिभानाशी व्यापार से सदा के लिए छुट्टी पाई और पटना चला आया पिताजी तो एक वर्ष पहले ही पटना आ गए थे। अब दूरियाँ बढ़ गई थीं और अज्ञेयजी से प्रायः प्रतिदिन का संपर्क छूट गया था; लेकिन बाद के वर्षों में भी वह जब कभी पटना आए, पिताजी से मिलने मेरे घर पधारे । 'वत्सल निधि' की ओर से आयोजित 'जानकी जीवन यात्रा ' के दौरान भी वह इलाजी के साथ पटना आए थे और दिन भर पिताजी के साथ रहे थे।

लेकिन पटना लौट आने के बाद की कथा शुरू करूँ , उसके पहले एक अवांतर कथा भी कह लूँ !...

l[क्रमशः]

4 टिप्‍पणियां:

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

आप भाग्यशाली हैं , आपको इतिहास के मोतियों से मिलने का मौका मिला...आपके माध्यम से हम भी उन क्षणों में गोता लगा पा रहे हैं...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अब अवान्तर का इन्तज़ार है. सातवीं किस्त के आने में विलम्ब हुआ है, और इस शृंखला के पाठक विलम्ब बर्दाश्त नहीं कर सकते.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

प्रखरजी, वंदना दुबेजी,
आभारी हूँ ! नेट साथ नहीं दे रहा, विवशता है, थोडा इंतज़ार तो करना पडेगा ! पटना-प्रवास और दौड़ भी तो है ही...
--आ.

गौतम राजरिशी ने कहा…

"नौकरी-जैसे प्रतिभानाशी व्यापार" इस अद्‍भुत विशेषण पर देर से मुस्कुराये जा रहा हूँ।

किस्त-दर-किस्त अप्रतिम अज्ञेय की अप्रतिम दास्तान पढ़ कर अज्ञेय से जुड़ी कई सारी भ्रांतियां दूर हुईं...