शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

हिन्दी साहित्य सम्मलेन के मंच से...
[छठी किस्त]

अज्ञेयजी को मैंने 'अप्रतिम' कहा है, अकारण नहीं कहा। अज्ञेय निःसंदेह अप्रतिम थे। उनके जैसी मैंने दूसरी सख्सीयत नहीं देखी । मैंने कभी उन्हें क्रोध करते, झुंझलाते यां आवेश में नहीं देखा। अप्रिय प्रसंगों को भी वह अपनी चुप्पी, गंभीरता और अपनी अप्रतिम तेजस्विता से परे धकेल देते थे। उनका सामान्य संभाषण भी सधा हुआ और आरोह-अवरोह-विहीन, किंतु यथातथ्य होता था। इच्छा होती थी कि उनका बोलना और हमारा सुनना कभी ख़त्म न हो; लेकिन सच है, वह बहुत कम बोलते थे। अनावश्यक बोलना उन्हें प्रिय नहीं था। राजेंद्र प्रसाद व्याख्यानमाला के तीन सत्रों में मैंने उनका व्याख्यान सुना है--वह भाषण नहीं करते थे, सारगर्भित व्याख्यान देते थे; शिष्ट शब्दों में तथ्यों को ऐसा सजाकर श्रोताओं के सम्मुख रखते थे कि विषय का पुखानुपुंख ज्ञान हो जाता था।
एक बार वह अच्छे मूड में दिखे तो मैंने उनसे कहा--"आपकी अमुक-अमुक कवितायें मैंने पढ़ी हैं। वह इतनी अच्छी हैं कि मुझे लगता है कि मैं जीवन भर अपनी कलम घसीटता रहूँ तो वृद्धावस्था तक ऐसी एक कविता भी नहीं लिख सकूँगा।" वह दूसरों को बोलने का पूरा मौका देते (जिन्हें देना चाहते थे) थे; लेकिन जब उनके उत्तर की बारी आती थी तो एक वाक्य की अर्धाली भी मुश्किल से कहते थे। उन्होंने मेरी बात चुपचाप सुन ली, मीठा मुस्कुराए, फिर बोले--"ऐसा क्यों सोचते हैं आप...?" अब आगे कहने को क्या था ??
अज्ञेयजी निरभिमानी व्यक्ति थे, लेकिन स्वाभिमान उनमे प्रचुर मात्रा में था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन का एक वाक़या याद आता है। सम्मेलन के महामंत्री प्रख्यात साहित्यकार और पिताजी के मित्र थे। उन्होंने सम्मान-समारोह का आयोजन किया था। अन्य साहित्यकारों के साथ वह अज्ञेयजी को भी सम्मानित करना चाहते थे। उनके सम्मुख संकट यह था कि अज्ञेयजी की ऐसे आयोजनों में बिकुल रूचि नहीं थी। अज्ञेयजी हिन्दी के इन अखाडों से दूर ही रहते थे। उनकी मान्यता थी कि हिन्दी की दूकानें सजाने से हिन्दी का भला नहीं होनेवाला है; हिन्दी में इमानदारी से निष्ठापूर्वक काम करने कि ज़रूरत है। सबको मालूम था कि अज्ञेयजी न तो ऐसे समारोहों में शिरकत करते हैं और न ऐसे आयोजनों को तरजीह देते हैं। बहरहाल, महामंत्री महोदय पिताजी के पास आए। वह जानते थे कि पिताजी और अज्ञेयजी अत्यन्त घनिष्ठ मित्र हैं और अगर पिताजी जोर डालेंगे तो उनकी बात अज्ञेयजी उठा न सकेंगे। लम्बी भूमिका के साथ मंत्री महोदय की बात पिताजी ने सुनी, फिर कहा--"आपका निवेदन मैं अज्ञेयजी तक पहुँचा दूंगा। स्वीकृति-अस्वीकृति तो उन्ही पर निर्भर है। जैसा वह कहेंगे, फ़ोन पर आपको सूचित करूँगा।"
अज्ञेयजी से अगली मुलाक़ात में पिताजी ने सारी बात उनके सामने रखी। अज्ञेयजी मुस्कुराये, फिर गंभीर होकर बोले--"आपके द्बारा निमंत्रण भेजकर उन्होंने मेरी मुश्किल बढ़ा दी है। सम्मेलन वाले मेरा सम्मान करना चाहते हैं, उनकी मर्जी; लेकिन आप उनसे साफ-साफ़ कह दें कि मैं सम्मान के लिए नहीं, आपके दिए आमंत्रण की वज़ह से वहां जाऊँगा। अग्रिम पंक्ति में नहीं, जहाँ इच्छा होगी, बैठूँगा और मंच से तो हरगिज़ कुछ बोलूँगा नहीं। यदि उन्हें मेरी शर्त मंजूर हो तो कहें, मैं आपके साथ हाज़िर हो जाऊँगा।"
पिताजी ने मंत्री महोदय को फ़ोन पर अज्ञेयजी की शर्तें और सारी बातें विस्तार से बता दीं। उन्हें शर्तें मंज़ूर थीं। यथासमय वह समारोह हुआ। अज्ञेयजी पिताजी के साथ वहां पहुंचे और विशाल हॉल में पिछली पंक्ति में कहीं बैठ गए। वह एक बड़ा और भव्य आयोजन था, जिसमे हिन्दी के कई मनीषियों को सम्मानित किया जाना था। सबों का तो स्मरण नहीं रहा, लेकिन अज्ञेयजी के आलावा पंडित किशोरीदास वाजपेयीजी भी समारोह में सम्मानित होने के लिए उपस्थित थे। कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। हिन्दी-मनीषियों के सम्मान के बाद अचानक उद्घोषक ने मंच से अज्ञेयजी को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया। इस अप्रत्याशित पुकार से अज्ञेयजी अचकचाए और पिताजी की ओर वक्र दृष्टि डालते हुए और धीर-गंभीर पदाघात करते हुए मंच पर पहुंचे। माईक पर उन्होंने जो पहला वाक्य कहा, वहीँ से श्रोताओं के आनंद का ठिकाना न रहा। उनका पहला वाक्य था--"हिन्दी साहित्य सम्मेलन से मेरा उतना ही नाता है, जितना हिन्दी साहित्य सम्मेलन का हिन्दी से। ...." फिर तो अजेयजी ने ऐसी फुलझडियाँ छोडीं, ऐसे कटाक्ष किए और ऐसा तीखा व्यंग्य किया कि सम्पूर्ण दर्शक समूह ठहाके लगाता और तालियाँ पीटता रहा। आयोजकों का तो बुरा हाल था, उन्हें काटो तो खून नहीं।
पिताजी जब अज्ञेयजी के साथ कार से लौट रहे थे तो पिताजी ने कहा था--"मुझे मालूम नहीं था कि वह शर्तें मानकर भी ऐसा व्यवहार करेंगे।" अज्ञेयजी ने हमेशा की तरह संक्षिप्त उत्तर दिया--"लेकिन मुझे मालूम था !" पिताजी हंस पड़े और बोले--"लेकिन आपने भी आज उनकी खूब खबर ली।"
[क्रमशः]

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

वधू-स्वागत की अनूठी शाम
[पांचवी किस्त]

राजकमल की सेवा के दौरान १९७८ में मेरा विवाह हुआ था। वधू-स्वागत के दिन शाम को मेरे मॉडल टाऊन स्थित आवास की छत पर कनात और शामियाना लगा था। वधू-स्वागत का वह समारोह इसलिए भी अनूठा था कि उसमे भारत-प्रसिद्ध साहित्यकार पधारे थे--सर्वश्री वियोगी हरि, जैनेन्द्र, त्रिलोचनं शास्त्री, शमशेर काहादुर सिंह, आनंद विद्यालंकार, अजित कुमार, शीला संधू, विष्णु प्रभाकर, मार्तंड उपाध्याय, गिरिजा कुमार माथुर और अज्ञेयजी। उस अवसर का अज्ञेयजी का चित्र मेरे संग्रह में आज भी सुरक्षित है। जब मैंने अपनी नवोढा पत्नी के साथ अज्ञेयजी के चरण छुए, उन्होंने धीरे-से कहा--"मैं कुछ निश्चित नहीं कर सका कि आपके लिए क्या ले आऊं। ठीक चलते वक्त यही आपके लिए उठा लाया हूँ।" यह कहकर एक पैकेट मेरी ओर बढ़ा दिया। समारोह के बाद मैंने उस पैकेट को खोलकर देखा, उसमे उनकी कविताओं का संग्रह था--'चुनी हुई कवितायें'।
वधू-स्वागत कि वह शाम बूंद-बूंदकर रात में ढलने लगी और मुझे ऐसा लगता रहा कि हिन्दी साहित्याकाश के उज्जवल सितारों के साथ मैं अपनी नई-नई जीवनसंगिनी के पार्श्व में खड़ा मुग्ध भाव से विचार रहा हूँ। सच कहूँ, वह शाम जीवन की अविस्मरणीय शाम थी--अविश्वसनीय शाम !
मेरी पत्नी बुंदेलखंड की हैं--झाँसी से १०० किलोमीटर की दूरी पर नौगाँव छावनी (म.प्र.) की। अपने माता-पिता के यहाँ जाने के लिए उन्हें हमेशा निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से सुबह ५.३० पर झाँसी के लिए ट्रेन लेनी पड़ती थी। मॉडल टाऊन से निजामुद्दीन की दूरी इतनी ज्यादा थी कि ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह ४ बजे ही घर से निकलना पड़ता था। कई बार ऐसा भी हुआ कि अल्लसुबह कोई सवारी न मिलने के कारण निजामुद्दीन पहुँचने में विलंब हो गया और ट्रेन नहीं, हम छूट गए। एक बार इस असुविधा की चर्चा पिताजी ने अज्ञेयजी से कि उन्होंने पिताजी से आग्रहपूर्वक कहा था--"आप आनंदजी से कहें कि यात्रा की पूर्व-संध्या में वह मेरे घर आ जाएँ, यहाँ से निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तो पैदल का रास्ता है।" उनकी इस सलाह पर हम जो एक बार अज्ञेयजी के हौज़-ख़ास वाले निवास पर गए तो प्रायः डेढ़-दो वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। देर शाम तक अज्ञेयजी के घर पहुंचना, वहीँ रात्रि-विश्राम करके सुबह-सुबह झाँसी के लिए प्रस्थान करना। हर बार अज्ञेयजी हमें छोड़ने स्टेशन तक कार से चले आते, इलाजी भी साथ होतीं। सुरु-शुरू में एक-दो बार यह कहने पर कि 'आप कष्ट क्यों करते हैं, हम चले जायेंगे', वह सहजता से कहते--" चलिए, मैं भी चलता हूँ। मेरी सुबह की सैर हो जायेगी।" उनके इस उत्तर से हम निरुपाय हो जाते।
अज्ञेयजी जिनके लिए सहज थे, बहुत सहज थे। जिनके लिए दुरूह थे, बहुत दुरूह थे। जिनके लिए अज्ञेयजी सहज थे, उनका चयन वह बड़ी सावधानी से करते थे। ऐसे सहज संबंधों वाले लोगों की संख्या अज्ञेयजी के दीर्घ जीवन में कम ही थी। पिताजी उन बहुत थोड़े लोगों में एक थे, यह मैं अपने अनुभव से जानता हूँ। उनकी जो प्रीती और स्नेह मुझे प्राप्त था, वह तो पिताजी की अनन्य मित्रता का प्रतिफल था; लेकिन प्रायः ६-७ वर्षों तक उनके बहुत निकट रहते-रहते और मेरी परख करते-करते अज्ञेयजी ने मुझे भी पूरी हार्दिकता से स्वीकार कर लिया था; इतना कहने में मुझे संकोच नहीं है। उनकी सहज प्रीती भुलाये नहीं भूलती। ...
[क्रमशः]

अप्रतिम अज्ञेय

'कितनी नावों में कितनी बार' की वह दुर्लभ प्रति !
[चौथी किस्त]

कालांतर में अज्ञेयजी दैनिक 'नवभारत टाइम्स', नई दिल्ली के प्रधान संपादक बने और उन्हीं के आग्रह पर सप्ताह में दो काॅलम उस पत्र के लिए पिताजी लिखने लगे। लिहाजा, सप्ताह में दो दिन न. भा. टा. के दफ़्तर मेरा जाना तय हो गया था। पिताजी का आलेख पहुँचाने के अलावा 'नया प्रतीक' के काम से भी वहाँ जाना होता था। उन दिनों मैं राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली के संपादकीय विभाग से सम्बद्ध था। कभी-कभी अपने दफ़्तर से फ़ोन करके अज्ञेयजी मुझे राजकमल से बुला लेते और आवश्यक निर्देश देते हुए 'प्रतीक' की सामग्री, प्रूफ़ आदि का पैकेट पिताजी को देने के लिए दे देते।
अब सप्ताह में दे-तीन बार अज्ञेयजी से मेरा मिलना होने लगा। अज्ञेयजी स्वभावतः अल्पभाषी थे और मैं अतिभाषी। वह मेरे बहुत सारे प्रश्नों का अत्यन्त संक्षिप्त, किंतु सटीक उत्तर छोटे-छोटे वाक्यों में देते। जब भी मैं उनके दफ़्तर में प्रवेश करता और उनके चरणों के स्पर्श को आगे बढ़ता, वह सावधान और संकुचित हो उठते तथा 'बस-बस' कहते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े हो जाते थे। एक दिन जब मैं उनके पास पहुँचा, तो मैंने देखा कि वह बड़े मनोयोग से अपने चश्मे के शीशे के एक भाग को बहुत छोटी-सी रेती से घिस रहे हैं। मैंने पूछा--"आप यह क्या कर रहे हैं ?" उन्होंने कहा--"आज सुबह मुँह धोने के लिए बेसिन पर गया तो ध्यान ही न रहा कि चश्मा उतारा नहीं है। जल का छींटा मुँह पर मारा ही था कि चश्मा नीचे गिर पड़ा। गनीमत हुई वह बसिन में ही गिरा, नीचे नहीं; फिर भी इसके एक कोने में ख़राश पड़ गई है। उसे ही रेती से घिसकर ठीक करने की चेष्टा कर रहा हूँ।" अज्ञेयजी के पास छोटे-बड़े औजारों का अनूठा संग्रह था। वह कार, कलम, घड़ी, कैमरा, चश्मा आदि ज़रूरत की कई चीजें स्वयं सुधार लेते थे और न जाने किस कौशल से इसके लिए समय भी निकाल लेते थे।
अज्ञेयजी को उनकी कविता-पुस्तक 'कितनी नावों में कितनी बार' पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार की घोषणा के बाद जब मैं उनसे पहली बार मिला, मैंने पुस्तक की एक हस्ताक्षरित प्रति देने का अनुरोध किया। उन्होंने बताया कि पुस्तक बहुत दिनों से 'आउट ऑफ़ प्रिंट' है; फिर भी वह अपनी लाइब्रेरी में देखेंगे और यदि एक प्रति भी मिल गई, तो मुझे अवश्य देंगे। उसके बाद करीब १५-२० दिन गुज़र गए, इस अवधि में भी उनसे कई बार मिलना हुआ, लेकिन मैंने संकोचवश पुस्तक की कोई चर्चा नहीं की। मेरे मन में उथल-पुथल मची रही और मैं सोचता ही रहा कि देखूँ, अज्ञेयजी अपना वादा कब पूरा करते है ! लेकिन एक सप्ताह और गुज़र गया और उन्होंने पुस्तक का कोई ज़िक्र न किया। मुझे विश्वास होने लगा कि उन्हें मेरे आग्रह का पूरी तरह विस्मरण हो गया है। अगली मुलाक़ात में मैंने पूछा--"मेरी पुस्तक का क्या हुआ?" वह जैसे चौंक पड़े हों, बोले--"लीजिये, मैं तो बार-बार भूलता ही रहा और आपने भी याद नहीं दिलाई। पुस्तक की प्रति तो मैं दूसरे दिन ही ले आया था। आप आज भी स्मरण न दिलाते तो पुस्तक यहीं पड़ी रहती!" इतना कहकर उन्होंने दराज़ से 'कितनी नावों में कितनी बार' की एक पुरानी प्रति निकाली और मेरी ओर बढ़ा दी। मैंने उसे उलट-पुलटकर देखने के बाद कहा--"इस पर कुछ लिखकर हस्ताक्षर कर दीजिये।" उन्होंने पूछा--"क्या लिखूँ?" मैंने कहा--"आशीर्वाद!" पुस्तक की जिल्द के बादवाले पृष्ठ पर उन्होंने लिखा--"प्रिय आनंदवर्धन को--सप्रीत, अज्ञेय।" अपने हस्ताक्षर के नीचे तिथि लिखते ही वह ठहर गए और मुझसे पूछा--"आप कहें तो यहाँ वह तिथि डाल दूँ, जिस तिथि को पुरस्कार की घोषणा हुई थी।" मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया और उन्होंने तिथि में सुधार कर पुरस्कार की घोषणावाली तिथि लिख दी और प्रति मेरी ओर बढ़ा दी। अज्ञेयजी की वह अनमोल भेंट मेरे संग्रह की शोभा आज भी बढ़ा रही है।
बहरहाल, अज्ञेयजी के दफ़्तर मेरा आवागमन इतना बढ़ गया था कि उनके निजी सचिव से लेकर दफ़्तर का पूरा स्टाफ मुझे पहचानने लगा था। उनके चेम्बर के ठीक सामने एक विशाल हॉल में सारा दफ़्तर कुर्सी-टेबुलों पर विराजमान रहता था। अज्ञेयजी से मिलकर लौटते हुए हमेशा एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो जाती थी, जिससे मुझे बाहुत संकोच होता था। मैं जैसे ही उनके चरण छूता, वह उठकर खड़े हो जाते और मुझसे आगे बढ़कर अपने चेम्बर का द्वार खोल देते और मुझसे कहते--"चलें!" मेरे बार-बार कहने पर भी वह दफ़्तर के बीच से होते हुए नीचे ले जानेवाली सीढ़ियों तक मुझे छोड़ने चले आते; जैसे मैं कोई किशोर बालक हूँ और वह सीढ़ियों तक न आयेंगे तो मैं राह भटक जाऊँगा ! उनकी ऐसी प्रीती, ऐसा स्नेह और सौजन्य देख मैं मन-ही-मन पुलकित होता, लेकिन साथ ही संकुचित भी हो उठता; क्योंकि अज्ञेयजी को अपने चेम्बर से अचानक बाहर निकल आया देख पूरा दफ़्तर उठकर खड़ा हो जाता था। अज्ञेयजी निर्विकार भाव से मुझसे बातें करते सीढ़ियों तक चले आते। मैं वहीं उन्हें पुनः प्रणाम करता और सीढ़ियाँ उतर जाता; लेकिन होता हर बार यही था।
[क्रमशः]

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

वह निश्छल-उन्मुक्त हँसी...
[तीसरी किस्त]

सदा धीर-गंभीर और सजग रहनेवाले महाकवि अज्ञेय के सम्बन्ध में सामान्यतया यह धारणा बद्धमूल है कि वह अत्यधिक आत्मगोपन की प्रवृत्ति के कारण सहज नहीं थे। विशाल पर्वत की तरह अटल रहनेवाली उनकी गंभीरता किसी को भी निकट आने से रोकती थी। अज्ञेयजी के शिष्यों ने ही उन्हें, बाद के वर्षों में, 'कई तहों में लिपटा हुआ व्यक्तित्व' तक कह दिया था। लेकिन इस धारणा के विपरीत मैंने उन्हें बहुत सरल, सहज और उन्मुक्त हँसी हँसते हुए देखा है। अज्ञेयजी के सम्बन्ध में ऐसी धारणाओं को भ्रांत सिद्ध करने के लिए मेरे पास एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं। उनमे से एक का ज़िक्र मैं यहाँ करना चाहूँगा।
१९६८ में मेरी माता के निधन के बाद मेरी बड़ी बहन ने घर की रसोई संभाली थी। १९७३ में बड़ी बहन के विवाह के बाद यह दायित्व मेरे अनुज के कन्धों पर आ पड़ा। वर्षों तक रंधन-कर्म करते हुए वह सिद्ध पाक-शास्त्री बन गए थे। अज्ञेयजी के यहाँ भोजन करते हुए पिताजी अक्सर मुग्ध-भाव से मेरे अनुज की पाक-कला की प्रशंसा किया करते थे। एक दिन अज्ञेयजी ने पिताजी से कहा--"लगता है, किसी दिन आपके कनिष्ठ पुत्र के हाथ का बनाया भोजन करना ही पड़ेगा।" योजना बनाकर वह इलाजी के साथ हमारे घर पधारे। मेरे अनुज ने दिन के सामान्य भोजन की व्यवस्था की थी। लेकिन हुआ कुछ ऐसा कि जैसे ही अज्ञेयजी ने इलाजी के साथ मेरे घर में प्रवेश किया, मानसिक रूप से अविकसित मेरी छोटी बहन महिमा अचानक प्रकट हुई और अज्ञेयजी का हाथ पकड़कर 'बाबूजी-बाबूजी' कहती हुई उन्हें बलात अपने कक्ष में ले गई। उसने अज्ञेयजी से अपने अस्त-व्यस्त बिस्तर पर बैठने का आग्रह किया, जिस पर कंकड़-पत्थर और धूल पड़ी रहती थी। साफ़-सुथरी वेश-भूषावाले अज्ञेयजी ने एक क्षण का भी विलंब नहीं किया, तत्काल उस गंदले बिस्तर पर बैठ गए। मेरी उस छोटी बहन की मति-गति विचित्र थी। उसके पास शब्दों की पूँजी बहुत थोडी थी। वह घर-बाहर से नंगे पाँव दौड़ लगाती आती और अपने बिस्तर पर बैठ जाती। बाहर से चुनकर लाये कंकडों से खेलना उसे प्रिय था। जब अज्ञेयजी उसके बिस्तर पर बैठ गए, तो वह उन्हीं कंकडों से खेलने का उनसे आग्रह करने लगी। अज्ञेयजी की असुविधा का ख़याल करके मैंने हस्तक्षेप करने की चेष्टा की तो इशारे से उन्होंने मुझे रोक दिया और महिमा के साथ कंकडों का विचित्र खेल खेलने लगे। प्रसन्नता से भरकर मेरी बहन किलकारियां भरती और अज्ञेयजी उसके साथ बच्चों की तरह उन्मुक्त हँसी हँसते। विराट व्यक्तित्व के धनी अज्ञेयजी उस दिन सचमुच छोटे-से बालक बन गए थे। आज न अज्ञेयजी हैं और न मेरी छोटी बहन, लेकिन उन दोनों की वह उन्मुक्त हँसी, बाल-सुलभ चेष्टाएँ जब भी याद आती हैं, मन में एक टीस-सी उभरती है !
तब दिल्ली के उस किराए के घर में हमारे पास सीमित साधन थे। भोजन के लिए डायानिंग टेबल और कुर्सियां नहीं थीं। जामीन पर चटाई बिछाकर हम सबों ने अज्ञेयजी-इला जी के साथ भोजन किया। घर से विदा होते वक्त अज्ञेयजी ने पिताजी से कहा था--"बहुत दिनों के बाद वैष्णवी मुद्रा में बैठकर किया गया भोजन सचमुच बहुत तृप्तिदायक था। " पिताजी और हम सभी उनकी इस प्रतिक्रिया से अत्यन्त प्रसन्न थे। ...
[क्रमशः]

अप्रतिम अज्ञेय

एकल काव्य-पाठ की वह अद्भुत शाम


एक दिन अज्ञेयजी ने पिताजी को फोन पर सूचित किया कि वह लक्ष्मीमल्ल सिंघवीजी के घर पर एकल काव्य-पाठ करेंगे। उन्होंने पिताजी को काव्य-पाठ में आमंत्रित किया। पिताजी ने कहा--"मैं तो उपस्थित रहूँगा ही, लेकिन आपकी कवितायें सुनने की आतुरता और उनका आनंद उठाने की ललक आनंदवर्धन कोअधिक होगी। " पिताजी की बात सुनकर अज्ञेयजी ने मुझे भी साथ ले आने को कहा था।

सिघवीजी के आवास पर आयोजित अज्ञेयजी के एकल काव्य-पाठ की वह शाम मेरे जीवन की अविस्मरणीय शाम थी। अज्ञेयजी की कवितायें सुनने को वहाँ हिन्दी के दिग्गज रचनालारों का जमावाडा था, जिसमे रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, शमशेरबहादुर सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, रामनाथ अवस्थी, भवानी प्रसाद मिश्र, नंदकिशोर नंदन सरीखे अनेक वरिष्ठ रचनाकार उपस्थित थे। लॉन में हलके नाश्ते और चाय-कॉफी का प्रबंध था। सबों ने शाम की चाय पी और फिर एक लंबे हॉल में जा बैठे। श्रोताओं के सम्मुख अज्ञेयजी एक आसन पर विराजमान हुए और उन्होंने कवितायें पढ़नी शुरू कीं। आरोह-अवरोह-विहीन स्वर में गंभीर अर्थवत्ता में लिपटे स्वच्छ-शिष्ट शब्दों के मोती अज्ञेयजी लुटाते रहे और सुधीजन नीरव शान्ति के साथ उनकी काव्य-सुधा का पान करते रहे। उनके काव्य-पाठ का संतुलित ढंग और उच्चारण की मानक शुद्धता पर श्रोताओं का मन रीझ-रीझ जाता था। विद्वद्जनो की उस सभा में मैं भी एक किनारे सकुचाया-सा बैठा था। छोटी-बड़ी कई कविताओं के पाठ के बाद अज्ञेयजी ने 'सागर-मुद्रा' सुनानी शुरू की। एक पंक्ति की पकड़ बनाने ने जितना वक्त लगता, उतने समय में कई पंक्तियाँ श्रवण-रंध्रों का स्पर्श करती निकल जातीं। दो घंटों तक अज्ञेयजी की अमृतमयी वाणी हवा की तरंगों पर थिरकती रही और सर्वत्र मौन छाया रहा। न 'आह' न 'वाह', नीरव शान्ति ! काव्य-पाठ की समाप्ति पर भी मौन ही प्रशंसा का साक्षी बना। धीरे-धीरे बातचीत के स्वर गूंजने लगे। पिताजी शमशेरजी और त्रिलोचनजी के साथ अज्ञेयजी के पास पहुंचे। उनके पीछे मैं भी था। पिताजी ने अज्ञेयजी को साधुवाद दिया--"आज बड़ा आनंद हुआ। आपके स्वर-सम्मोहन और काव्य-शक्ति में आबद्ध रहा मन और मस्तिष्क।" त्रिलोचनजी ने भी प्रशंसा के कुछ शब्द कहे और अज्ञेयजी को प्रणाम निवेदित किया। विनय की प्रतिमूर्ति शमशेरजी ने बहुत अधिक झुककर प्रणाम किया, बोले कुछ नहीं । फिर तो कवियों, साहित्यकारों ने अज्ञेयजी को घेर लिया और उन्हें साधुवाद देने लगे। धीरे-धीरे लोग टोलियों में बँट गए और बातचीत के शोर से पूरा हॉल गूंजने लगा।
सिघवीजी के घर से अतिथि विदा होने लगे थे। भीड़-भाड़कम हुई तो अज्ञेयजी ने पिताजी से कहा--"आप मेरे साथ घर चले चलिए, वहां से ड्राईवर आपको मॉडल टाऊन छोड़ आएगा।" पिताजी ने प्रतुत्तर में कहा--"शमशेर और त्रिलोचनजी भी तो मॉडल टाऊन ही जायेंगे, मैं उन्हीं के साथ चला जाऊँगा।" अज्ञेयजी बोले--"उन्हें भी अपने साथ ले लीजिये, कार में तो हम सभी आ जायेंगे।" तभी मैंने हस्तक्षेप किया--"आपने अपनी कविता-पुस्तकों का एक सेट, जो मेरे लिए निकाल रखा है, आज अगर वह भी मिल जाए तो चलना बहुत सार्थक होगा; क्योंकि उन्हें मुझे बस में ढोना नहीं पड़ेगा। पुस्तकें कार से ही घर तक पहुँच जायेंगी।" अज्ञेयजी मुस्कुराए और बोले--"हाँ, पुस्तकें तो निकाल ली हैं, बस उन्हें बंधना है; चलिए, आज वह काम भी हो जाए।" बहरहाल, अज्ञेयजी ड्राइविंग सीट पर और उनकी बगल में पिताजी बैठे, पिछली सीट पर शमशेरजी और त्रिलोचनजी के साथ मैं बैठ गया। गाड़ी सिंघवी जी के घर से बाहर निकली और हौज़-ख़ास की ओर चल पड़ी। बातचीत के बीच अज्ञेयजी गंभीरतापूर्वक बोले--"लगता है, 'सागर-मुद्रा' कई लोगों के ऊपर से निकल गई।" पिताजी हंस पड़े और बोले--"ऊपर से नहीं, सिरके ऊपर से।" पिताजी के कथन को शमशेरजी और त्रिलोचनजी का समर्थन मिला और कार में सबों की हँसी गूंजने लगी।
अज्ञेयजी ने घर पहुंचकर 'बावरा अहेरी' से 'अरे यायावर रहेगा याद' तक की अपनी समस्त पुस्तकों का एक सेट मेरे सामने रखा और उन्हें बांधने के लिए रस्सी की तलाश करने लगे। थोडी देर बाद वह मूंज की रस्सी लेकर आए और मेरे आग्रह करने पर भी स्वयं ही बड़े करीने से पुस्तक के आठों किनारों पर दफ्ती के छोटे-छोटे टुकड़े लगाकर उन्हें बंधा, फिर मेरे हवाले किया। मैंने श्रद्धापूर्वक पुस्तकों के बण्डल को सिर-माथे से लगाकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
एक बार मैंने अज्ञेयजी से पूछा था--"आप मुझे 'आप' क्यों कहते हैं ? मैं तो आपके लिए बच्चे-जैसा हूँ।" उन्होंने पूरी सहजता से कहा था--"सच तो यह है कि मैं सबों को 'आप' ही कहता हूँ। मेरे पिताजी ने हम सभी भाई-बहनों को ऐसी ही शिक्षा दी है। अब तो ऐसा अभ्यास हो गया है कि किसी के लिए भी 'तुम' संबोधन निकलता ही नहीं। आप इसे अन्यथा न लें।"
[क्रमशः]

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

अप्रतिम अज्ञेय

"यह दीप अकेला गर्व भरा है, प्रीति भरा मदमाता..."
अज्ञेय अप्रतिम थे, विराट थे, भव्य थे। अतीत में प्रयासपूर्वक देखने की चेष्टा करता हूँ तो उनकी दिव्य मूर्ति की क्षीण रेखा मन में उभरती है, जब वह पटना में मेरे घर पधारे थे और पूज्य पिताजी (स्व० पंडित प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त') से बातें कर रहे थे। मैं ५-६ वर्ष का अबोध बालक, पिताजी की किसी भी आज्ञा को तत्पर, वहीँ एक किनारे खड़ा था और उन गौरांग महाप्रभु को अपलक निहार रहा था।
ग्रीक मूर्तियों की भव्यता को चुनौती देनेवाले अज्ञेयजी की पिताजी से अन्तरंग और पुरानी मित्रता थी। १९४१-४२ में पिताजी ने अज्ञेयजी के साथ मिलकर पटना से मासिक 'आरती' का सम्पादन किया था, जिसे देशव्यापी ख्याति मिली थी और जिसका प्रकाशन सन ४२ के विश्वयुद्ध में अवरुद्ध हो गया था। पिताजी अज्ञेयजी से उम्र में दो वर्ष बड़े थे। वयोज्येष्ठ्ता का सम्मान अज्ञेयजी पिताजी को यावज्जीवन देते रहे--यह उनकी विद्वत्ता और विनयशीलता का ही परिचायक था।
अज्ञेय प्रखर प्रतिभा लेकर हिन्दी में आए थे। उन्होंने हिन्दी कविता को नवीन परिधान पहनाया, नई उंचाइयां दीं--प्रयोग और प्रतीक की नई अवधारणायें प्रस्तुत कीं। उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों की नई उर्वरा भूमि तैयार की और यथार्थ-बोध की गगनचुम्बी अट्टालिकाएं खड़ी कीं । उनकी किस्सागोई भी अनूठी थी।
कालांतर में अज्ञेयजी आकाशवाणी, दिल्ली और पिताजी आकाशवाणी, पटना के हिन्दी-सलाहाकार बने। आकाशवाणी-सेवा के दौरान भी दोनों मित्रों का संपर्क बना रहा और यदाकदा मिलना होता रहा; लेकिन यायावर कवि-कथाकार अज्ञेय को आकाशवाणी बहुत दिनों तक बांधे न रख सकी। वह सेवा-मुक्त होकर स्वतंत्र लेखन और देश-विदेश की यात्राएं करते रहे। अब दीर्घकालिक विराम के साथ अज्ञेयजी से पिताजी का संपर्क हो पता था; लेकिन सन १९७४ के 'बिहार आन्दोलन' को समर्थित साप्ताहिक पत्र 'प्रजानीति' का संपादन-भार जब पिताजी ने जयप्रकाशजी आदेश पर स्वीकार किया और दिल्ली जा बसे, तो अज्ञेयजी से पुनः मिलना होने लगा। इंडियन एक्सप्रेस के श्रीरामनाथ गोयनका के स्वत्वाधिकार में प्रकाशित होनेवाले पत्र 'प्रजानीति' ने उस दौर में पूरे देश में और खासकर बिहार में खलबली मचा दी थी। पाठक अधीरता से 'प्रजानीति' के अगले अंक की प्रतीक्षा किया करते थे। लेकिन पत्र अल्पजीवी सिद्ध हुआ और आपातकाल की घोषणा के साथ ही उसका प्रकाशन बंद हो गया। गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान , नई दिल्ली से रात २ बजे जब जयप्रकाशजी को हिरासत में लिया गया, उस कठिन क्षण में भी उन्होंने गोयनकाजी से कहा था--"मुक्त्जी का ख़याल रखियेगा !" गोयनकाजी ने पिताजी का पूरा ख़याल रखा। पत्र के बंद जाने के बाद भी इंडियन एक्सप्रेस से उन्हें तनख्वाह मिलती रही। लेकिन दो महीने बिना कोई काम किए वेतन लेने के बाद पिताजी को ऐसी आय से विराग होने लगा (आदर्शवादी युग के वह ऐसे ही विलक्षण व्यक्ति थे। आज तो इस सत्य पर विश्वास करना भी कठिन है !)। उन्होंने अज्ञेयजी के सम्मुख अपनी पीड़ा व्यक्त की--"महीने के प्रारम्भ में इंडियन एक्सप्रेस के द्वार पर पहुंचना मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं भिक्षा की याचना लिए वहां जा पहुंचा हूँ। " अज्ञेयजी ने पिताजी की बात गंभीरतापूर्वक सुनी, फिर बोले--"गोयनका जी जैसे धनाधीश को आपकी तनख्वाह से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप इसे अस्वीकार कर देंगे तो आपको फर्क पडेगा... और परदेश में आप संकट में पड़ जायेंगे।" पिताजी ने अज्ञेयजी की बात मान ली; लेकिन पॉँच महीनो तक वेतन उठाने के बाद पिताजी की आत्मा ने विद्रोह कर दिया। वह रामनाथ गोयनकाजी के पास गए और उन्हें तथा एक्सप्रेस भवन को सदा के लिए नमस्कार कर आए।
अब दिल्ली दूभर होने लगी थी। पारिवारिक कारणों से ही (स्नातक की डिग्री पाते ही) मैंने एक निजी संस्थान में नौकरी शुरू की। लेकिन आय अत्यल्प थी, उससे कुछ होना-जाना नहीं था। अज्ञेयजी ने और इलाजी ने दिल्ली-प्रवास के उन कठिन दिनों में जिस तरह से हमारी सहायता की और सहयोग को तत्पर बने रहे, उसे भूल पाना असंभव है। इसी अवधि में अज्ञेयजी ने 'नया प्रतीक' का संपादन-भार पिताजी को सौंप दिया था। नेहरू शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली पुस्तक 'लेक्टेड वर्कस ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू' (नेहरू वांग्मय) के हिन्दी अनुवाद का काम पहले से ही पिताजी के पास था। पिताजी इन्ही कामों में दिन-रात लगे रहते, किंतु अज्ञेयजी के आवास पर सप्ताह में दो दिन मिल-बैठकर 'नया प्रतीक' के लिए सामग्री-चयन का काम करना सुनिश्चित था। सप्ताह की इन दो मुलाकातों में पिताजी का दिन का भोजन और शाम की चाय अज्ञेयजी के यहाँ होती। दोनों मित्र दिन भर काम करते, साहित्यिक चर्चाएँ होतीं और शाम की चाय पीकर पिताजी घर लौट आते। 'नया प्रतीक' के लिए गद्य रचनाओं का चयन पिताजी करते और अज्ञेयजी काव्य-रचनाएं स्वीकृत करते; क्योंकि पिताजी नाहक ही सही, लेकिन अक्सर कहा करते थे किआजकल कीनई कवितायें उनके पल्ले नहीं पड़तीं।
पिताजी को सूचित किए बिना मैंने अपनी एक कविता 'नया प्रतीक' में प्रकाशनार्थ डाक से भेजी थी। कई दिनों बाद, प्रतीक के अगले अंक की चयनित सामग्री लेकर जब पिताजी अज्ञेयजी के घर से लौटे, तो उन्होंने मुझे बताया था--"तुम्हारी एक कविता को अज्ञेयजी ने प्रकाशन के योग्य माना है।" यह सुनकर मुझे अतीव प्रसन्नता हुई थी। यथासमय वह कविता 'नया प्रतीक' में प्रकाशित हुई और प्रकाशन के करीब सवा महीने बाद एक सौ पचास रुपये का चेक डाक से मेरे नाम आया था। उस चेक पर अज्ञेयजी का हस्ताक्षर था। मेरे लिए उस धनादेश की कीमत डेढ़ सौ रुपयों बहुत अधिक थी। वह मेरे लिए धनादेश नहीं, प्रमाण-पत्र था। मैंने निश्चय किया था किइसे कभी भुनाऊंगा नहीं, सहेजकर अपने प्रमाण-पत्रों में सुरक्षित रखूँगा ; लेकिन दो महीनो के बाद ही धन कि अत्यन्त आवश्यकता में मुझे अपना वह भावुकतापूर्ण हाथ छोड़ना पडा था, जिसकी पीड़ा मुझे आज भी है।
[क्रमशः]

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

जाने कब आओगे तुम...?


कुछ आहटें
तकलीफों के
खुले दरवाज़े पर
देती हैं दस्तक,
बार-बार देखता हूँ उधर;
वहां कोई नहीं होता
तुम भी नहीं,
तुम्हारा वजूद भी नहीं...
होती है सिर्फ़
दरवाजों की भड़-भड़
शायद ये हवाएं
ले आयी हैं --
तुम्हारी यादें !

जाने कब बंद होंगे
तकलीफों के
ये खुले द्वार;
इन पर सांकल चढाने
जाने कब आओगे--
तुम !!