मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

यादों के आईने में डॉ0 कुमार विमल...

[गतांक से आगे]
वाणिज्य के विद्यार्थी हिंदी की कक्षा को अथवा हिंदी विषय को कोई महत्व नहीं देते थे तथा कक्षा में शोर-गुल मचाते थे, लेकिन जब विमलजी हिंदी की कक्षा लेने आते, कक्षा अपेक्षया शांत हो जातीमैं तो तन्मय होकर उनका पूरा व्याख्यान सुनता और नोट्स लेताविमलजी को मैंने कभी क्रोधित होते या झुंझलाते नहीं देखाशांत-संयत उनका व्याख्यान होता और सौम्य-मधुर स्वर ! अत्यंत प्रांजल भाषा में वह विषय का प्रवर्तन करते और पाठ के साथ छात्रों को ले चलतेभाषा-शैली पर उनका असाधारण अधिकार थावक्तृता उनकी अनूठी थीमैं अपनी कक्षा में हिंदी के पत्र में सर्वाधिक अंक (डिसटिंगशन ) प्राप्त करता था, जिससे विमलजी बहुत प्रसन्न होतेएक ऐसे ही मौके पर उन्होंने मुझसे कहा था--"आपने वाणिज्य विषय क्यों लिया, आपको तो हिंदी का विद्यार्थी होना चाहिए था।"
सन ११९७४ में स्नातक वाणिज्य (सम्मान) की उपाधि प्राप्त कर मैं पिताजी के पास दिल्ली चला आया। फिर तो जैसे समय को पंख लग गए। मैंने नौकरियाँ कीं और शहर बदलता रहा। पटना (बिहार) से दूर मेरे दिन बीतते रहे। विमलजी से मिलना मुहाल हो गया... । पटना छोड़कर मैं एक बार जो प्रवासी बना, तो फिर ८ वर्षों तक प्रवासी ही बना रहा। सन १९८२ में जब पटना लौटा, तो यहाँ भी बहुत कुछ बादल चुका था। शहर की शक्ल बदली, यार- दोस्तों ने ठिकाना बदला, बूढ़े-बुजुर्गों ने जहां बदला... । फिर भी पटना की रवानी वैसी ही थी... जीवन अपनी गति से चल रहा था। ज्ञात हुआ, विमल जी विश्वविद्यालय से छूटकर राज्य सरकार के अनेक उच्च पदों पर आसीन हैं और कंकरबाग स्थित अपने निजी भवन में रहने लगे हैं ! यह संयोग ही था कि हम भी कंकरबाग वाले अपने मकान को किरायेदार से मुक्त करवाकर उसी में जा बसे थे। विमलजी के मकान से मेरे घर की दूरी अधिक न थी--दस मिनट की पद-यात्रा कर वहाँ पहुंचा जा सकता था, यह जानकार मुझे स्वभावतः प्रसन्नता हुई थी। मैं उत्सुकता और अधीरता में तत्काल उनके घर जा पहुंचा, लेकिन मिलना हो न सका। उनके घर का लौह-द्वार बंद था। घंटी बजाने पर सेवक ने द्वार की छोटी खिड़की खोली और बताया कि पूर्वानुमति के बिना मिलना हो न सकेगा ! मैं विस्मित हुआ और निराश लौट आया। यह सोचकर मैं हैरान था कि क्या विमलजी निकटस्थों के लिए भी अलभ्य हो गए हैं? कुछ ही दिनों में मैंने जान लिया कि उनकी कार्य-व्यस्तता इतनी बढ़ गई थी कि उनसे सहज ही मिल पाना असंभव हो गया था। फ़ोन पर पूर्वानुमति लेनी होगी। समस्या थी कि तब हमारे घर में दूरभाष कि सुविधा नहीं थी और तब तक सेल फ़ोन की ऐसी बाढ़ भी न आयी थी। जब कभी पिताजी को कुछ कहना-पूछना या आदेश देना होता, वह एक पत्र लिखकर मुझे देते और कहते--'विमलजी के घर इसे दे आओ।' मैं विमलजी के घर जाता और उनके द्वार पर पहुंचकर घंटी बजाता, जब उनका अनुचर बाहर आता, तो मैं उसे ही पत्र सौपकर लौट आता। सप्ताह-दस दिनों के बाद जब विमलजी का पत्र पिताजी के पास आता तो संभवतः उन्हें यथोचित उत्तर मिल जाता, उनकी जिज्ञासाएं शांत होतीं। प्रायः एक वर्ष तक यही सिलसिला चलता रहा और पटना पहुंचकर भी मैं विमलजी के दर्शनों से वंचित रहा। वैसे, सभा-समारोहों में उनका दूर-दर्शन तो हुआ, लेकिन आत्मीय सत्संग को मन व्याकुल बना रहा। सचमुच, उनसे मिलना असंभव की हद तक कठिन हो गया था। ....
[शेषांश अगली कड़ी में...]
[लीजिये साब, गायब आया ! कुछ विशाल ग्रंथों में उलझा थाकई सुलझे, कई सिर पर पड़े हैं अभी ! शोक का एक सन्देश क्या आया, मैं यहाँ चला आया ! पीड़ा ज्यादा तीव्रता से अभिव्यक्ति मांगती है शायद ! अपने गुरुदेव को श्रद्धांजलि देते हुए यह संस्मरण पोस्ट कर रहा हूँ, क्रमशः तीन-चार खण्डों में लिख सकूंगानिवेदन है, इसे सुविधापूर्वक पढ़ जाएँ !--आनंद 0 ओझा]
यादों के आईने में डॉ कुमार विमल
२६-११-२०११ की शाम एक मित्र ने पटना से फ़ोन पर सूचना दी कि हिंदी के वरेण्य रचनाकार, छायावादी सौंदर्यशास्त्र के अन्वेषक, साहित्य-संस्कृति के उन्नायक तथा प्रख्यात शिक्षाविद डॉ० कुमार विमल का निधन हो गया। विमलजी के दिवंगत होने की सूचना ने मुझे मर्माहत किया। वह ८६ वर्ष की दहलीज़ पार कर गए थे शायद ! सन १९७१ से ७३ तक पटना महाविद्यालय (पटना वि० वि०) में वह मेरे हिंदी प्राध्यापक थे ! लेकिन उनसे मेरा परिचय पुराना था। जगत-सागर को अपनी प्रभा-मेधा से तरंगित-उद्वेलित कर वह भी उसे लांघ गए हैं। मित्र से मिली इस मर्मवेधी सूचना के बाद से लगातार उनका दीप्त मुख-मंडल मेरी स्मृति में उभरता है और मैं विचलित होता हूँ......
संभवतः सन १९६३-६४ में मेरी माता ने समारोहपूर्वक मेरा यज्ञोपवीत संस्कार किया था। तब मैं १२-१३ वर्ष का बालक था। संस्कार के बाद संध्याकाल में नाते-रिश्तेदार, हित-मित्र और शुभेच्छुओं का आगमन हुआ था; उन्हीं में डॉ० वचनदेव कुमार के साथ डॉ० कुमार विमल भी मेरे घर पधारे थे। नवीन वस्त्र धारण कर मुंडित मस्तक मैंने सबों के चरण छू कर आशीर्वाद लिया था। जब पूज्य पिताजी (पं० प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') ने मुझसे कहा --'ये कुमार विमल हैं, प्रणाम करो', तभी मैंने उनका प्रथम दर्शन किया था--मंझोला कद, सुपुष्ट काया, गौर वर्ण, खड़ी नासिका, जिस पर बैठा चश्मा और पावरवाले चश्मे के शीशों से झांकती तेजस्वी आँखें तथा दुग्ध-धवल परिधान--धोती-कुर्ता ! वे उनकी युवावस्था के दिन थे-- यौवन की चमक के साथ उनका आकर्षक व्यक्तित्व भीड़ से उन्हें अलग करता था। बहुत ही शालीन शब्दों और मीठी आवाज़ में उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया था, मुझसे बातें की थीं।
इसके बाद लंबा अरसा गुज़र गया। मैंने स्कूल की पढ़ाई पूरी की और पटना महाविद्यालय में पढ़ने गया, तो विमलजी से फिर मिलना हुआ। यह जानकार वह प्रसन्न हुए थे कि मैं अब उनका छात्र बन गाया हूँ। महाविद्यालय में जब कभी एकांत में वह मुझे मिल जाते, पिताजी का कुशल-क्षेम अवश्य पूछते। उनके मन में पिताजी के लिए बहुत आदर था. वह पिताजी को 'गुरुदेव' कहते, और अब मैं उन्हें 'गुरुदेव' कहने लगा था. वाणिज्य का विद्यार्थी होते हुए भी मेरी हिंदी में गहरी रुचि और गति थी। विमलजी के मार्गदर्शन में यह रुचि और परिष्कृत हुई। वह मुझे देशी और विदेशी साहित्य में भी क्या-कुछ लिखा जा रहा है तथा क्या पढने योग्य है, बतलाते। कभी-कभी अपनी लायब्रेरी से पुस्तकें भी लाकर पढने को देते, जिन्हें लौटाने मैं उनके सैदपुर वाले किराए के मकान पर भी जाता। मुझे ऐसे एक भी अवसर का स्मरण नहीं, जब उन्होंने मुझे चाय-नाश्ते के बिना घर से विदा किया हो। लेकिन उनकी बैठक का अजीब हाल हमेशा रहा। वहाँ आगंतुकों के बैठने के लिए स्थान का नितांत अभाव रहता था। बैठक के बड़े-से कक्ष में विराजमान रहती थीं--एकरंगे कपडे में लिपटी-बंधी पोटलियाँ, फाईलों के गट्ठर और पुस्तकों के बण्डल। किराए के मकान में वह ज़मीन पर ही आसन डालकर बैठते थे और लिखने के लिए डेस्क का इस्तेमाल करते थे। मुलाकाती संभ्रम में पडा रहता कि कहाँ बैठूं ? पटना के कंकड़बाग वाले निजी भवन में स्थापित होने के बाद भी विमलजी के ड्राइंगरूम का यही हाल रहा। फर्क सिर्फ इतना हुआ कि कक्ष के एक कोने में अपेक्षाकृत एक छोटी मेज़ और कुर्सी रख दी गई थी और एक मात्र कुर्सी किसी मुलाकाती के लिए; जिस पर वह किसी तरह बैठ तो जाता, लेकिन अधिक स्वतन्त्रता नहीं ले सकता था; क्योंकि उसे तीन तरफ से किताबें, फाइलें और पांडुलिपियों के गट्ठर घेरे रहते ।
विमलजी शालीन और विनम्र व्यक्ति थे और बातें पूरी गंभीरता से करते थे। वह अल्प-भाषी तो नहीं थे, लेकिन जितना वह स्वयं बोलते थे, उससे बहुत ज्यादा उनकी प्रभापूर्ण आँखें बोलती थीं... ।
[शेषांश अगले अंक में]

शनिवार, 19 मार्च 2011

होली की शुभकानाएं...

[राग-रंग सन्देश]

रंगों की ऐसी धार चले, मधुर-मधुर रस-धार चले !
प्रीत की पिचकार चले, स्नेह-सुधा का वार चले !!
मन की परती का कण-कण भीगे, ऐसी एक बयार चले !
अंतर में उपजे मधुर रागिनी, राग ताल मल्हार चले !!


होली की शुभकामनाएं !!
--आनंद वर्धन ओझा.

सोमवार, 7 मार्च 2011

मेरे खयालों के घोड़े....

[अपेक्षाकृत लम्बी कविता]

कई बार ऐसा भी हुआ है
बीता नहीं है लम्हा,
कतरा-कतरा धकेलना पडा है उसे,
कई बार समय इतनी तीव्रता से गुजरा है कि
लम्हों की कौन कहे,
दिन पर दिन कैसे बीते,
पता ही नहीं चला !

इन ठहरे हुए लम्हों
और तेज़ रफ़्तार से गुज़रते हुए
बदहवास दिनों के दीर्घ अंतराल में
मेरे तरकश में जितने तीर थे,
मैंने छोड़े !
मेरी यादों में हमेशा हिनहिनाते रहे
दरियाई और कई-कई नस्ल के घोड़े;
और वे रह-रह कर दौड़े !!

दुलकी घोड़े अलसाए-से
अपने चारो पांव पसारे
मेरे मन के अस्तबल में
रहे सकते धूप;
उन्होंने तब गर्दन उचकाई,
बड़ी आस से मुंह को खोला
लगी उन्हें जब भूख !
मैंने थोड़ी घास डाल उनको बहलाया... !

तेजस्वी घोड़ों ने भी
उछल मचाई, कूदे-फांदे
मीठे स्वर में रोते-गाते रहे रात-दिन;
मैंने उनको शब्द दे दिए--
वे रहे जुगाली करते...!

चेतक-जैसे अश्वों ने भी
क्षिप्र गति से
शिथिल पड़ी मेरी नस-नाडी में
जाने कैसी त्वरा भरी थी,
मैंने जब भी चाहा उनकी करूँ सवारी,
वे आँखों की ओट हो गए;
मैंने केहुनी मार
पटखनी खुद को दे दी
खोल लिए कुछ ग्रन्थ सामने
डूबा दिए लम्हे-दर-लम्हे
जीवन के क्षण सारे यूँ ही
तीव्र हवा और मंद वायु के
किये हवाले...!

एक अदना-से ख़याल की
मासूम घोड़ी, जो हमेशा मेरे जेहन में रहती थी;
बहुत चंचल-चपल थी !
रह-रह कर वह उधम मचाती
और बिदक कर भागा करती--
मेरे मन के इस कमरे से उस कमरे में !
अपने मन के अवगुंठन में रहती थी वह--
उसे किसी की चाह नहीं थी;
डांट-डपट की उसको बिलकुल परवाह नहीं थी !
मेरी चेतना के कण-कण से
चुनती थी वह घास !
और हमेशा करती रहती
अनचाहा परिहास !!
जब वह थोड़ी बड़ी हो गई
मेरे बोध के पन्ने-चिट्ठे लगी फाड़ने !

मैंने अपनी रक्षा की खातिर
जब यह चाहा--
डालूँ एक लगाम
रोक-बाँध कर उसको रखूँ,
उसने नथुने खूब फुलाए,
रोती-हिनहिनाती रही सामने;
मैंने भी अनदेखी करके
अपनी सख्ती और बढ़ा दी--
किन्तु, एक दिन
मेरे सीने पर मार दुलत्ती
वह जो भागी, दिखी नहीं वह !
मैंने क्रोधित होकर सोचा--
चलो अब पीछा छूटा,
एक अनोखा बंधन जो था,
वह भी टूटा !

लेकिन यह तो गज़ब बात थी
जिन खयालों को खुरच कर
आप हटाना चाहें मन से--
वे लौट-लौट आते हैं,
मन में अशांति के गीत गाते है !

खयालों की वह छोटी घोड़ी
अब तो काफी बड़ी हो गई--
जाकर भी वह गई न मन से,
चुभती रही हमेशा, हरदम
भग्न काँच-सी,
पैनेपन से !

अपने इन्हीं खयालों से अब
ऊब गया मैं !
जितना चाहा, ऊपर उठ आऊं,
उतना गहरे डूब गया मैं !!

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

पुरानी चादर के धागे...

[विस्मृति के गह्वर से...]

शाम ढल रही थी,
मेरी बाहों में लिपटा था
संवेदनाओं का ज़हर
और पास की कब्र पर
जलते गुगुल-लोहबान की भीनी खुशबू
मेरे दिल-दिमाग पर छाई हुई थी !
सायं-सायं करती
गुज़र रही थीं मदहोश हवाएं...
बिखरे हुए वक़्त को
कांपती उँगलियों से
सहेजने की कोशिश में
कुछ लम्हों के लिए
ठहर जाती है उदास शाम !

देर रात रक्त-नालियों में
प्रवाह मंद होता देख
मैं फिर से जीने के लिए
बदलता हूँ करवटें...
और करवटें...
सासें चल रही हैं,
शरीर में स्पंदन भी है,
फूट पड़ने के लिए
हलक में फंसे हैं कुछ शब्द भी;
लेकिन लगता है,
ज़िन्दगी किसी और बिस्तर पर सोयी है !
ढूंढता-तलाशता हूँ उसे--
उसकी कोई सुन-गुन नहीं मिलती,
मैं हैरान होता हूँ...
अभी-अभी तो यहीं थी ज़िन्दगी,
छोड़ गया था उसे
अपने कलेजे से निकाल कर--
जाने कहाँ गई वह ?

मेरे प्रश्नों का उत्तर
मेरी आती-जाती साँसें देती हैं--
श्वांस का जो टुकडा
अभी-अभी बाहर निकल कर
हवा में घुल गया है,
क्या वही लौट कर हमें मिलता है ?
डाली से गिरा हुआ फूल
क्या वृंत्त पर फिर खिलता है ?

मेरी बिछड़ी हुई ज़िन्दगी भी
इसी तरह कहीं खो गई है,
पुरानी चादर के धागे-धागे में
जो गर्मी थी--
विस्मृति के गह्वर में सो गई है !!

बुधवार, 26 जनवरी 2011

दम तोड़ते हैं विचार...

[गणतंत्र दिवस पर विशेष]

बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में,
वातानुकूलित कमरों में
रेस्तरां और कॉफ़ी-शॉप में--
उपजते हैं बड़े-बड़े विचार और
सड़कों-फुटपाथों पर आकर
दम तोड़ देते है !

स्वतन्त्रता दिवस के जश्न पर
बिखरे बालोंवाली
उस मासूम लड़की की
भोली शक्ल
मेरे ख़यालों में
चींटियों-सी रेंगती है आज भी
और याद आती है मुझे--
उसकी जिद,
उसकी आतुरता, विकलता और व्यग्रता !
वह लगातार करती है मनुहार--
दो रूपए में
कागज़ का एक तिरंगा झंडा खरीदने की !!

तब भी विचारों का गणित
मस्तिष्क में चलता रहता है;
लेकिन वातानुकूलित कार की खिड़की का
बंद शीशा नहीं खुलता !
टैफिक सिग्नल की लाइट
जैसे ही हरी होती है--
कार दौड़ने लगती है--
विचारों को ढोते हुए...... !
विचार--जो सद्भाव के हैं,
समुन्नति के हैं,
पर-पीड़ा के हैं,
अभिवंचितों के उद्धार के हैं
और वर्ग-वैषम्य के निवारण के हैं !

भागती कार के बंद शीशे से
मैं पढता रह जाता हूँ--
उस भोली-भाली लड़की के
चहरे की मायूसी, हताशा, निराशा
और आँखों का सूनापन... !

ज़िन्दगी यूँ ही भागती रहती है
ज़िदगी से
और विचार यूँ ही उपजते
और दम तोड़ते रहते हैं--
सड़कों पर,
फुटपाथों पर
और शहर के
तमाम चौराहों पर !!

बुधवार, 19 जनवरी 2011

कैसे समझाऊं उसे...

[मित्रवर श्रीमुकेश कुमार तिवारी को सप्रीत...]
{कई महीने पहले मित्रवर श्री मुकेश कुमार तिवारी की एक कविता ब्लॉग पर पढ़ी थी--'वो करती है मुझसे शिकायत'। उसे पढकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ था--शानदार कविता थी वह । उसे पढ़ते हुए लगा था कि कवि मेरी बात कुछ अलग अंदाज़ में कैसे लिख रहा है ? फिर याद आया कि बहुत पहले बिलकुल इसी भाव-भूमि की एक कविता कभी मैंने भी अपनी छोटी बेटी के लिए लिखी थी। मुकेश जी की कविता पर टिपण्णी भेजते हुए मैंने उन्हें यह लिखा भी था। प्रत्युत्तर में उन्होंने मेरी कविता देखने की इच्छा प्रकट की थी, लेकिन कविता पटना में थी और मैं नॉएडा प्रवास में। कविता उन्हें मैं भेज न सका था। पिछले दिनों जब पटना गया, तो पुरानी डायरी से यह कविता ले आया हूँ। २५-५-१९९३ की यह कविता भाई तिवारी जी के और आप सबों के सम्मुख रख रहा हूँ । --anand }
एक शाम मेरे घर के
मुंडेरे पर उतर आयी है,
दूर धुंधली-सी
एक तस्वीर उभर आयी है,
जिसके हाथो में चाक़ू है;
वह काटेगी केक -- आज !
ज़िन्दगी की उमंग में
ग्यारह साल पहले लिखी
एक पुरानी कविता को
सजीव , सम्मुख देखता हूँ--
खूब पहचानता हूँ उसे,
जाने कितनी खंडित प्रतिमाओं से
जिसने आकार पाया है :
उस भोली-भाली लड़की के
मासूम चहरे पर
वही जानी-पहचानी मायूसी है
और वह करती है
मुझसे कई सवाल...
मांगती है मुझसे--
अपने हिस्से की कविता !
ग्यारह मोमबत्तियों की रौशनी में
देखता हूँ--
उसका उदास चेहरा,
जिसे उसने टेबल के सिरे पर
केहुनी टिका,
अपनी मुट्ठी पर
ठुड्डी रख
स्थिर कर लिया है--
उसकी उल्लासित आँखों में
आज भी जल रहे हैं सवाल,
थोड़ी मायूसी भी है उसके चहरे पर...
सोचना नहीं पड़ता मुझे
उसकी मायूसी का सबब !
जानता हूँ,
फ़रमाईशें पूरी नहीं हुई उसकी;
लेकिन वह मासूम
मेरी पसलियों के दर्द
और खाली जेब की
पीड़ा क्या जाने ?
अपनी आँखों में ही
उसके प्रश्नों का उत्तर
लिखना चाहता हूँ
और मेरी आखें
निष्प्रभ हुई जाती हैं !
उसके प्रश्न मेरी चेतना पर
छा गए हैं घने कुहरे की तरह
मैं उद्विग्न होता हूँ;
कैसे समझाऊं उसे--
कि तू ही तो मेरी सबसे मासूम
और दुलारी कविता है--
मेरी बेटी !
अपनी ही कविता पर
कविताई कैसे हो भला ?
कोई बतलाये मुझे--
कैसे समझाऊं उसे ??