--मेरा अज्म--
एक पत्थर
तबीयत से उछाला था मैंने
सोचा था,
आस्मां में सुराख कर
जा ठहरेगा कमबख्त--
वह मुंह पर आ गिरा,
मेरा अज्म मुझे ही
बदशक्ल कर गया !
--ज़िन्दगी की मेज़ पर--
तुमसे कुछ कहना था,
शब्द नहीं मिले
तो हवा की जुगाली कर ली !
बहुत कुछ तुम्हें बाताना था
संयोग नहीं बना
तो मैंने अपनी कलम में
स्याही भर ली--
चलो, यूँ ही रँगता रहूंगा सफ़े
ज़िन्दगी की मेज़ पर !
मंगलवार, 1 मई 2012
बुधवार, 25 अप्रैल 2012
वह देखता है मुझको...
वह नामुराद
मेरी आँख का काँटा नहीं है,
बहुत निकट का,
बेहतर जाना हुआ भी,
वह नहीं है;
लेकिन वह रखता है
मुझ पर गहरी निगाह--
खूब पहचानता है मुझे !
मुझसे ज्यादा जानता है मुझे !!
उसकी निगाह से
बचने की मैं लगातार
करता हूँ कोशिशें,
दामन बचाता हूँ,
अपना सच उससे छिपाता हूँ;
लेकिन वह तो अगम ज्ञानी है,
मेरे पोर-पोर में बहते
ज्यादातर ख़याल से
उसे अजीब-सी परेशानी है !
वह रोकता है मुझे,
टोकता है मुझे,
वर्जना देता है,
डराता-धमकाता है
और कभी-कभी बुरी तरह नाराज भी होता है !
मैं उससे पीछा छुड़ाने की
मुमकिन कोशिशों में लगा रहता हूँ,
बनावटी एक आवरण में छिपा रहता हूँ !
और मनमानियाँ किये जाता हूँ,
सफ़ेद कागज़ पर स्याह लकीरें
खींचता जाता हूँ !
मैं उसकी एक नहीं सुनता,
मन में उसकी कोई बात नहीं गुनता,
अपनी ही राह चलता हूँ,
शायद मैं खुद को ही छलता हूँ !
मेरी अवहेलना का उस पर
कोई प्रभाव नहीं पड़ता;
वह हमेशा अपना दायित्व निभाता है,
हर मौके पर मुझे सजग-सावधान बनाता है;
लेकिन मैं उसे मुंह चिढ़ाता हूँ
और आगे बढ़ जाता हूँ !
वह अपनी टेक से बाज़ नहीं आता,
और मैं उसकी कोई बात मान नहीं पाता !
लेकिन हर सुबह
जब मैं आईने के सामने खडा होता हूँ--
आईने से वह देखता है मुझको...
मैं सोचता हूँ--
क्या यह वही है
जो मेरी अन्तश्चेतना में कहीं बसता है
और अवज्ञा की पीड़ा चुपचाप सहता है ?
मेरी आँख का काँटा नहीं है,
बहुत निकट का,
बेहतर जाना हुआ भी,
वह नहीं है;
लेकिन वह रखता है
मुझ पर गहरी निगाह--
खूब पहचानता है मुझे !
मुझसे ज्यादा जानता है मुझे !!
उसकी निगाह से
बचने की मैं लगातार
करता हूँ कोशिशें,
दामन बचाता हूँ,
अपना सच उससे छिपाता हूँ;
लेकिन वह तो अगम ज्ञानी है,
मेरे पोर-पोर में बहते
ज्यादातर ख़याल से
उसे अजीब-सी परेशानी है !
वह रोकता है मुझे,
टोकता है मुझे,
वर्जना देता है,
डराता-धमकाता है
और कभी-कभी बुरी तरह नाराज भी होता है !
मैं उससे पीछा छुड़ाने की
मुमकिन कोशिशों में लगा रहता हूँ,
बनावटी एक आवरण में छिपा रहता हूँ !
और मनमानियाँ किये जाता हूँ,
सफ़ेद कागज़ पर स्याह लकीरें
खींचता जाता हूँ !
मैं उसकी एक नहीं सुनता,
मन में उसकी कोई बात नहीं गुनता,
अपनी ही राह चलता हूँ,
शायद मैं खुद को ही छलता हूँ !
मेरी अवहेलना का उस पर
कोई प्रभाव नहीं पड़ता;
वह हमेशा अपना दायित्व निभाता है,
हर मौके पर मुझे सजग-सावधान बनाता है;
लेकिन मैं उसे मुंह चिढ़ाता हूँ
और आगे बढ़ जाता हूँ !
वह अपनी टेक से बाज़ नहीं आता,
और मैं उसकी कोई बात मान नहीं पाता !
लेकिन हर सुबह
जब मैं आईने के सामने खडा होता हूँ--
आईने से वह देखता है मुझको...
मैं सोचता हूँ--
क्या यह वही है
जो मेरी अन्तश्चेतना में कहीं बसता है
और अवज्ञा की पीड़ा चुपचाप सहता है ?
शनिवार, 17 मार्च 2012
साँस-साँस ठहरी-ठहरी ...
ये ज़िन्दगी ख़यालों में
बदहवास-सी गई,
झीनी-झीनी चादर भी
बदरंग-ही मिली !
सोचता हूँ तो नादानी के
बहुत सारे वाकये याद आते हैं
और पकी उम्र में
हम उन पर बेतरह पछताते हैं !
हमने घोसले तोड़े, अंडे फोड़े;
कच्चे-पक्के फल तोड़े
आधे खाए, आधे फेंके;
कागज़ की फिर नाव बनायी,
जल में छोड़ी !
हरी पत्तियाँ, टहनी तोड़ी,
तितली पकड़ी, मसली, छोड़ी;
उपवन दिया उजाड़
और गमलों में पौधे डाले !
छोटे पिल्ले, सुन्दर-सुन्दर तोते पाले,
एक दिन पिंजरा खुला रह गया,
उड़कर प्यारा तोता भागा !
छोटा पिल्ला बड़ा हुआ तो
गुर्राता वह घर से भागा !
वे दिन तो नादानी में ही बीत गए,
जो पढ़ने में पीछे थे,
मुझसे जीत गए !
जाने कब हम बड़े हो गए
अपने पैरों पर खड़े हो गए !
यौवन पानी की धार बना--
कनक कछारों को छूता,
जाने कब का चला गया !
सपनीली आँखों का सपना--
विधिवशात ही छला गया !
गुनाहगार बन गया सफ़र
अनजाने, अनचाहे ही,
रोटी-कपड़े पर उलझ गई
साँस-साँस ठहरी-ठहरी !
अब हाय, ज़रा की डायन तन के
दशद्वार पर देती है दस्तक,
अपने साहस की हठधर्मी
और चलेगी जाने कब तक ?
कभी मूर्च्छना का कोई क्षण
ऐसा भी तो आयेगा--
जो हमारी संरचना को
मिटटी का मोल बताएगा !!
बदहवास-सी गई,
झीनी-झीनी चादर भी
बदरंग-ही मिली !
सोचता हूँ तो नादानी के
बहुत सारे वाकये याद आते हैं
और पकी उम्र में
हम उन पर बेतरह पछताते हैं !
हमने घोसले तोड़े, अंडे फोड़े;
कच्चे-पक्के फल तोड़े
आधे खाए, आधे फेंके;
कागज़ की फिर नाव बनायी,
जल में छोड़ी !
हरी पत्तियाँ, टहनी तोड़ी,
तितली पकड़ी, मसली, छोड़ी;
उपवन दिया उजाड़
और गमलों में पौधे डाले !
छोटे पिल्ले, सुन्दर-सुन्दर तोते पाले,
एक दिन पिंजरा खुला रह गया,
उड़कर प्यारा तोता भागा !
छोटा पिल्ला बड़ा हुआ तो
गुर्राता वह घर से भागा !
वे दिन तो नादानी में ही बीत गए,
जो पढ़ने में पीछे थे,
मुझसे जीत गए !
जाने कब हम बड़े हो गए
अपने पैरों पर खड़े हो गए !
यौवन पानी की धार बना--
कनक कछारों को छूता,
जाने कब का चला गया !
सपनीली आँखों का सपना--
विधिवशात ही छला गया !
गुनाहगार बन गया सफ़र
अनजाने, अनचाहे ही,
रोटी-कपड़े पर उलझ गई
साँस-साँस ठहरी-ठहरी !
अब हाय, ज़रा की डायन तन के
दशद्वार पर देती है दस्तक,
अपने साहस की हठधर्मी
और चलेगी जाने कब तक ?
कभी मूर्च्छना का कोई क्षण
ऐसा भी तो आयेगा--
जो हमारी संरचना को
मिटटी का मोल बताएगा !!
गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012
रुआंसी तकलीफें...
कुछ तकलीफें
जी भरकर रो न सकीं
रुआंसी हो कर रह गईं
हमेशा के लिए...!
उस पौधे के कंटीले तन पर
एक गुलाब खिला--
मुस्कुराता हुआ !
मैंने पूछा--ये हंसी कैसी ?
वह बोला कुछ नहीं,
काँटों के सलीब पर
सर्द-सा मुस्कुराया;
मैंने समझा--
उसने अपनों से दर्द छुपाया !
जाने कब और कैसे
उसके नाखून खंजर हो गए
और मेरा मोम-सा दिल पत्थर हो गया !
लिखने को कुछ तकलीफदेह इबारतें
वह लिख गया,
जिसे बार-बार पढ़ना
उसकी मजबूरी थी
और बेसब्र हो जाना उसकी इबादत !
न मजबूरी ख़त्म हुई,
न इबादत बोली;
जब कभी कराहकर मैंने
अपनी बंद मुट्ठी खोली--
वहाँ भी रेंगती दिखीं --
रुआंसी तकलीफें !
अपनी परछाइयों से भी
जिसे धकेल कर अलग करता हूँ,
वह खलिश मेरे साथ-साथ चलती है,
एक आग मेरे सीने में
दिन-रात जलती है !!
जी भरकर रो न सकीं
रुआंसी हो कर रह गईं
हमेशा के लिए...!
उस पौधे के कंटीले तन पर
एक गुलाब खिला--
मुस्कुराता हुआ !
मैंने पूछा--ये हंसी कैसी ?
वह बोला कुछ नहीं,
काँटों के सलीब पर
सर्द-सा मुस्कुराया;
मैंने समझा--
उसने अपनों से दर्द छुपाया !
जाने कब और कैसे
उसके नाखून खंजर हो गए
और मेरा मोम-सा दिल पत्थर हो गया !
लिखने को कुछ तकलीफदेह इबारतें
वह लिख गया,
जिसे बार-बार पढ़ना
उसकी मजबूरी थी
और बेसब्र हो जाना उसकी इबादत !
न मजबूरी ख़त्म हुई,
न इबादत बोली;
जब कभी कराहकर मैंने
अपनी बंद मुट्ठी खोली--
वहाँ भी रेंगती दिखीं --
रुआंसी तकलीफें !
अपनी परछाइयों से भी
जिसे धकेल कर अलग करता हूँ,
वह खलिश मेरे साथ-साथ चलती है,
एक आग मेरे सीने में
दिन-रात जलती है !!
गुरुवार, 5 जनवरी 2012
खरामा... खरामा...
धूप का एक टुकड़ा
मेरे आँगन में मुस्कुराया,
मैंने सजदे में सिर झुकाया और--
खुद को समझाया--
चलो, एक उजाला
मेरी गिरफ्त में है;
लेकिन शाम से पहले ही
धूप का वह टुकडा
आँगन से नदारद था !
मैं मायूस तो था,
फिर भी मुस्कुराया था--
धूप-छाँव की यह ज़िन्दगी
यूँ ही कटेगी--
खरामा... खरामा ..... !!
मेरे आँगन में मुस्कुराया,
मैंने सजदे में सिर झुकाया और--
खुद को समझाया--
चलो, एक उजाला
मेरी गिरफ्त में है;
लेकिन शाम से पहले ही
धूप का वह टुकडा
आँगन से नदारद था !
मैं मायूस तो था,
फिर भी मुस्कुराया था--
धूप-छाँव की यह ज़िन्दगी
यूँ ही कटेगी--
खरामा... खरामा ..... !!
शनिवार, 31 दिसंबर 2011
नए साल का स्वागत है...
वर्ष नया, उत्कर्ष नया, संकल्प नया लाया है,
मेरे मन के महावृक्ष में पत्र नया आया है ।
इस पल्लव पर लिखना है एक गीत नया जीवन का,
नए वर्ष में बरस पड़े सुख-मेघ समग्र मेरे मन का !
मेरे मन के महावृक्ष में पत्र नया आया है ।
इस पल्लव पर लिखना है एक गीत नया जीवन का,
नए वर्ष में बरस पड़े सुख-मेघ समग्र मेरे मन का !
[नव-वर्ष पर मेरी मंगल-कामनाएं स्वीकार करें !--आनंद व. ओझा.]
बुधवार, 28 दिसंबर 2011
स्वप्न में दिखेगा आदमी...
[वर्षांत पर]
आदमी बन के उपजा था--सामान्य आदमी !
ज़िन्दगी भर चाहा
आदमी ही बना रहूँ;
लेकिन ज़िन्दगी तो
आदमी बनने की कोशिश में ही गुज़र गई,
स्याह को सफ़ेद बनाने में
उम्र बीत गई !
अब सोचता हूँ,
क्या होगा ठीक-ठाक आदमी बनकर ?
छोड़ा हुआ रास्ता क्या फिर मिलेगा ?
और जो बची हुई डगर है--
वह इतनी कम है कि
उसे आदमी बनकर धांग दूँ
या जानवरों-सा छलाँगूं --
बीतेगा वह भी निरुद्देश्य...
कंधे पर लिए जग का जुआ ।
स्वप्न में ही दिखेगा आदमी,
सत्यतः जानवर-सा जीता हुआ !!
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