सोमवार, 5 नवंबर 2012

अभी नहीं चुका हूँ मैं...


[मित्रों, आज प्रभु-कृपा से मैंने जीवन के साठ वर्ष पूरे किये हैं. सुबह सोकर उठा, तो प्रथमतः जो भाव उपजे, उन्हें कविता-तत्त्व का ख़याल किये बिना लिख डाला था. इन भावों को आपके सम्मुख रख रहा हूँ. --आ.]

मैं न रुका था कभी,
मैं न झुका था कभी,
जीवन की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते
साठ सीढ़ियाँ लाँघ चुका मैं
सोच रहा हूँ--
अभी और आगे चलना है,
निर्द्वंद्व चलूँगा,
नहीं रुकूँगा,
लूँगा अब संकल्प नए,
स्वर नए साधूंगा,
काल के कपाल पर
पाग नया बांधूंगा,
अवरोधों से जूझूंगा,
जीवन को और ज़रा बूझूँगा !

जब तक सीढ़ी ख़त्म न हो
चढ़ता जाउंगा,
बढ़ता जाउंगा;
चुकना होगा जब--
चुक जाऊँगा,
अभी नहीं चुका हूँ मैं...!

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

मेरी सीमाएं हैं....



प्रियवर, मेरी सीमाएं हैं
मैं परतें ज्यादा खोल नहीं सकता;
जिह्वा पर लगा हुआ पहरा,
इससे ज्यादा कुछ बोल नहीं सकता! प्रियवर...

बातें कड़वी लग सकती हैं
पर न्याय-तुला की और बात;
सच का पलड़ा ही झुकता है,
असत सत्य को तौल नहीं सकता! प्रियवर...

जो पंख लगाकर उड़ते हैं
अपने ही मन के आँगन में;
वे होंगे भू-लुंठित एक दिन,
यह परम सत्य, पर बोल नहीं सकता! प्रियवर...

कामनाएं रूप बदलती हैं
मन माया से संचालित है;
पर-दोष दिखाई देता जब,
कोई अंतर की गांठें खोल नहीं सकता! प्रियवर...

विश्वास छला जाता हो जब
भरोसा खंड-खंड हो बिखर रहा;
अवगुंठन से बाहर आकर--
कलुष ह्रदय सच बोल नहीं सकता! प्रियवर...

हर पीढ़ी की तरुणाई पर
धरती अंगड़ाई लेती है,
हिमशिला दाह से गलती, वरना
नदियों में नीर मृदुल भी डोल नहीं सकता! प्रियवर...

मन के सारे बंधन तोड़ो
काटो-काटो यह कुटिल जाल;
तुम बोल रहे तो हलचल है,
यह महामौन मुंह खोल नहीं सकता!
प्रियवर, मेरी सीमाएं हैं,
मैं परतें ज्यादा खोल नहीं सकता!!

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

गाँठें....

गाँठ पुरानी थी
सदियों से खुली न थी;
लेकिन चुभती तो थी !
वर्षों बाद
मेरी देहरी पर वह आया
मन की एक गाँठ खोल गया !

गाँठ  तो खुली,
उसके  बल-पेंच रह  गए !
विनम्रता से भरी
उसकी मीठी ज़बान में
जितना ज़हर  था,
हम  निःशब्द  पी  गए !

ज़हर पीकर  भी
हम  नीलकंठ तो न  हो सके ,
सारी अलामत सिर लेकर  भी
साधु न हो सके;
आदमी  ही रहे --
सामान्य आदमी !

विष  हलक के नीचे  उतरा
नस-नाड़ियों में  फैला
और नई गाँठें दे गया !!

बुधवार, 19 सितंबर 2012

अँधेरी कोठरी के अकेले रौशनदान थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण


[समापन किस्त]
पिछले २५-३० वर्षों में इतना कुछ बादल गया है कि इस परिवर्तन पर यकीन नहीं होता ! जयप्रकाशजी जिन मूल्यों-आदर्शों के पुनर्स्थापन के लिए जीवन भर जूझते रहे, आज उसकी कामना करनेवाला भी कोई नहीं दीखता. उन्होंने राजनीति में प्रजा-नीति, लोक-नीति, सर्व-उदय, लोक-कल्याण की उदात्त भावना को प्राणपण से प्रतिष्ठित करने की चेष्टा की थी; लेकिन अब तो राज-ही-राज रह गया है, नीति की जगह अनीति ने ले ली है. पिछले तीन दशकों में मूल्यों का ऐसा ह्रास हुआ है कि बदली सूरत को पहचानना भी मुश्किल है. आत्मानुशासन, संयम, शील, भद्रता, शालीनता, परोपकार, सदाचरण जैसे गुण दुर्लभ होते जा रहे हैं. उनकी जगह असंयम, अशालीनता, अभद्रता, दुराचरण और लोभ-लालसा ने ले ली है. जो राह जयप्रकाशजी ने दिखाई थी, जिस राह पर वह देश को ले चलना चाहते थे, उस राह पर आज कोई अग्रसर नहीं दीखता. पक्ष और प्रतिपक्ष तर्क-वितर्क और कुतर्क में लगे हैं, विधान सभाएं और संसद पहलवानों के अखाड़े बने हुए हैं. सबको अपनी-अपनी पड़ी है, देश की फिक्र किसी को नहीं है, हम न जाने किस राह पर देश को हांके लिए जा रहे हैं. ऐसे में जे.पी. बहुत-बहुत याद आते है....
मुझे  लगता है, भारत की राजनीति में जयप्रकाशजी त्याग-तपस्या के प्रतीक और सर्वस्व न्योछावर कर देनेवाले अप्रतिम योद्धा तथा जन-भावना को स्वर देनेवाले क्रांतदर्शी की तरह हमेशा याद किये जायेंगे. उन्हें किसी मोह ने नहीं बांधा, पद-लिप्सा उन्हें छू न सकी, कोई प्रलोभन उन्हें डिगा नहीं सका, वह तो 'सर्व-जन हिताय, सर्व-जन सुखाय' के एक सूत्र को थामे जीवन-भर चलते रहे, जलते रहे और अंततः उनके जीवन की निष्कंप दीप-शिखा बुझ गई. जीवन-दीप का बुझ जाना तो नियति थी, लेकिन बुझने के पहले जो चमक और रौशनी वह छोड़ गए हैं, उसके आलोक से आनेवाली पीढियां अनुप्राणित होती रहेंगी. मुझे विशवास है, देश की राजनीति में जयप्रकाशजी सर्वाधिक  स्वच्छ, पवित्र और जुझारू जन-नायक की भाँति अनंत काल तक स्मरण-नमन किये जायेंगे ! इसमें संदेह नहीं कि भारतीय राजनीति की थाली में वह तुलसी-दल की तरह सर्वाधिक पवित्र आत्मा थे !!
[समाप्त]

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

अँधेरी कोठरी के अकेले रौशनदान थे : जयप्रकाश नारायण

[पांचवीं किस्त]
एक दिन पिताजी के अनन्य मित्र स.ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय'जी ने उनके सम्मुख यह प्रस्ताव रखा कि मुंबई जाकर जयप्रकाशजी से मिल आना चाहिए. उन दिनों पिताजी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे थे. आपातकाल की घोषणा के साथ ही 'प्रजानीति' पत्र बंद हो चुका था. पिताजी अज्ञेयजी के साथ ही 'नया प्रतीक' के सम्पादन और अनुवाद के अन्य कामों में लगे हुए थे. उन्होंने अपनी असमर्थता अज्ञेयजी के सम्मुख रखी--"इच्छा तो मेरी भी होती है कि एक बार जयप्रकाशजी से मिल आऊं, जाने फिर यह अवसर भी हाथ लगे, न लगे; क्योंकि जैसी उनके शरीर की दशा है, उससे मन बहुत आश्वस्त नहीं है." अज्ञेयजी बोले--"इसीलिए तो आप से कह रहा हूँ. जानता हूँ, आप दोनों एक-दूसरे से मिलकर प्रसन्न होंगे. आप कुछ न सोचें, बस साथ चलें. आप साथ होंगे तो मेरी हिम्मत भी बनी रहेगी." पिताजी की आतंरिक इच्छा तो थी ही, उन्होंने स्वीकृति दे दी.
पिताजी की स्वीकृति के बाद अज्ञेयजी ने विलम्ब नहीं किया, तत्काल रेल का आरक्षण लेने के बाद पिताजी को यात्रा की तिथि वगैरह बता दी. दोनों मित्र नियत तिथि को मुंबई चले गए. जसलोक अस्पताल में दो दिनों में दो बार पिताजी और अज्ञेयजी जयप्रकाशजी से मिले. मुंबई से लौटकर पिताजी ने बताया था कि जयप्रकाशजी हुलसकर मिले थे और उन्होंने बहुत-सी बातें की थीं; जबकि उन्हें अधिक बोलने की मनाही थी और बोलना उनके लिए कष्टकर भी था. पिताजी और जयप्रकाशजी की वार्ता भोजपुरी में शुरू होती, फिर अज्ञेयजी का ख़याल कर जे.पी. हिंदी में बोलने लगते थे और बातें हिंदी में होने लगतीं: किन्तु थोड़ी ही देर बाद पिताजी की ओर मुखातिब होकर जब जे.पी. कुछ कहने लगते तो भाषा स्वतः भोजपुरी हो जाती. ऐसा जब दो-तीन बार हुआ तो जे.पी. ने अज्ञेयजी से कहा--"मुक्तजी से मेरी बातचीत की भाषा वर्षों से भोजपुरी रही है, इसलिए...! आप कुछ ख़याल न कीजिएगा." अज्ञेयजी ने प्रतुत्तर में बस इतना कहा था--"भोजपुरी मैं बोल नहीं पाता, लेकिन समझता तो अच्छी तरह हूँ."
पिताजी जयप्रकाशजी से मिलकर जब लौटे थे, क्षुब्ध और चिंतित थे. उन्होंने बताया था कि वह बहुत दुर्बल हो गए हैं और रोग भी ऐसा है जो लगातार उपचार की मांग करता है. पिताजी मुखर होते हुए भी धीर-गंभीर व्यक्ति थे. अपने मन पर उनका अद्भुत संयम था. किसी भी पीड़ा, अभाव, संकट की छाया अधिक समय तक उनकी मुखमुद्रा पर टिकी नहीं रह पाती थी, किन्तु जयप्रकाशजी की शारीरिक दशा से वह सचमुच लम्बे समय तक आक्रान्त दिखे थे और आगंतुकों से उनकी हालत की चर्चा करते हुए दुखी हो जाते थे.
कुछ समय बाद ही परिस्थितियों ने करवट बदली. जयप्रकाशजी मुम्बई से पटना लौट गए और वहीँ उनका उपचार होने लगा. सन १९७९ में मैं भी दिल्ली से स्थानांतरित होकर हरद्वार चला गया. कुछ समय बाद पिताजी भी दिल्ली त्याग कर मेरे पास हरद्वार आये. लेकिन विधि-संयोग कुछ ऐसा बना कि जिस रात पिताजी ने दिल्ली से ट्रेन से प्रस्थान किया, उसी रात जयप्रकाशजी के जीवन-मुक्त होने का दुह्संवाद आया. पिताजी सारी रात ट्रेन में सो न सके थे. मेरे पास पहुंचे तो दुखी और अवसन्न थे. उनका पचासों वर्ष पुराना सम्बन्ध विच्छिन्न हो गया था.
पिताजी ने अपनी पुस्तक 'पहचानी पगचाप' में जयप्रकाशजी पर लिखे दो संस्मरणों ('जब लोकनायक रो पड़े थे' तथा 'एक और दधीचि : लोकनायक जयप्रकाश नारायण') में अपने संबंधों की विस्तार से चर्चा की है, उन्हें स्मरण-नमन किया है.
कई-कई वर्षों बाद जब पटना के कदमकुआंवाले जयप्रकाशजी के आवास (आज जहां प्रभावतीजी द्वारा स्थापित 'महिला चरखा समिति' का दफ्तर है) पर जाने का संयोग बना, तो वहाँ का सूनापन देखकर मन में एक टीस उठी. कल तक जहां हाली-मुहाली लगी रहती थी, लोगों की भीड़ से परिसर गुंजायमान रहता था, जहां छुटभैये और दिग्गज राजनेताओं को मैंने कभी पंक्तिबद्ध देखा था, वहाँ मन को सालनेवाला एक अजीब सन्नाटा पसरा हुआ था. घर के विशाल आँगन में बड़ी-बड़ी घास उग आयी थी और वहाँ एक दरबान और कुछ कामकाजी महिलाएं ही थीं. वहीँ मैंने एक प्रखर जीवन का चरमोत्कर्ष देखा था और उसकी नियति देखकर यह जान सका था कि प्रचंड सूर्य के अस्तंगत हो जाने पर कैसा घना अन्धकार सर्वत्र व्याप्त हो जाता है. ...
[अगले अंक में समापन] अँधेरी कोठरी के अकेले रौशनदान थे : जयप्रकाश नारायण

रविवार, 16 सितंबर 2012

अँधेरी कोठरी के अकेले रौशनदान थे 'जयप्रकाश नारायण'

[चौथी किस्त]
फिर तो बिहार क्या, दिल्ली में भी तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था. दिनकरजी की प्रसिद्ध पंक्ति 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' और नागार्जुन जी की काव्य-पंक्ति 'इंदुजी-इंदुजी क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको ?' पूरे बिहार में गूंजने लगी थी. पटना के गाँधी मैदान के दक्षिणी गोलंबर पर (जहां आज जयप्रकाशजी की आदमकद मूर्ति स्थापित है) जब जयप्रकाशजी के सिर पर लाठी का प्रहार हुआ, तो पूरा देश खौल उठा था. तब नागार्जुंजी ने एक लम्बी कविता लिखी थी, जिसकी आरंभिक पंक्तियाँ देखते-देखते लोगों की ज़बान पर थीं--
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की,
जयप्रकाशजी पर पड़ी लाठियां लोकतंत्र की !
नागार्जुनजी की कई क्षणिकाएं भी आन्दोअलन की आग को हवा देने में सूत्र-वाक्य की तरह प्रयुक्त की जा रही थीं--
माई ! तुम तो काले धन की बैसाखी पर टिकी हुई हो !!
और--
गुर्राती बैठी है वह टीले पर बाघिन !
चबा चुकी है ताज़ा नर-शिशुओं को गिन-गिन,
गुर्राती बैठी है वह टीले पर बाघिन !
उस दौर में समाज के हर तबके के लोग अपनी-अपनी विद्या-बुद्धि, विवेक और सामर्थ्य के साथ आन्दोलन से आ जुड़े थे और उसे शक्ति प्रदान कर रहे थे. साहित्यकारों, कवियों-लेखकों का दल अपने लेखन और विचारों से उसे मजबूती प्रदान कर रहा था. धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध कविता 'मुनादी' उन्हीं दिनों बहुत लोकप्रिय हुई थी और दुष्यंत कुमार की हिंदी ग़ज़ल की पंक्तियाँ तो हर शख्स की ज़बान पर थीं--
एक बूढा आदमी है मुल्क में या यूँ कहो,
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है !
गांधीवादी युग के उत्तरकाल की अकेली और निष्कंप दीपशिखा थे--'जयप्रकाश नारायण' ! वह तिल-तिल कर जलते और रौशनी बाँटते रहे. दुष्यंत ने ठीक ही कहा था, अन्धकार से भरे उस युग में वह देश को रौशन करनेवाले अकेले रौशनदान की तरह थे.
हमारी टोली भी नागार्जुन और रेणुजी के साथ घूम-घूमकर अलख जागाती थी, जिसमे कभी कवि सत्यनारायण तो कभी गोपीवल्लभ सहाय और अन्य कई-कई लेखक-कवि अपनी रचनाओं के साथ आ जुड़ते थे. मेरी मुक्त छंद की एक कविता भी उन दिनों चर्चा में आयी थी और गोष्ठियों में श्रोता मुझसे वही कविता सुनाने की फ़रमाईश करते थे--
तल्खियों से भरा एक जुलूस
चल पडा है !
काले झंडे,
विरोध के कुछ साईनबोर्ड
नारेबाजी में झुलसता माहौल;
लेकिन एक और सच्चाई
यहाँ पर छूट रही है
हर आदमी के हाथ में
उसी का चेहरा
कोलतार भरे गुब्बारे-सा
फैलता जा रहा है,
यह एक और मृत्यु की शुरुआत है...
बहरहाल, आन्दोलन का दायरा बढ़ता ही जा रहा था और जब जयप्रकाशजी ने 'दिल्ली चलो' का नारा दिया तथा दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल जनसभा की, उससे पहले ही मैं स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा देकर पिताजी के पास दिल्ली चला आया था. आन्दोलन से मेरा सीधा संपर्क छूट गया था, लेकिन पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों और मित्रों की चिट्ठियों से आन्दोलन की गतिविधियों के समाचार मिलते रहते थे. उसके बाद तो घटनाक्रम जिस तेजी से बदला और आपातकाल लागू हुआ, उससे सारा देश परिचित है. आपातकाल की सख्तियों को देखते हुए इस बात की पूरी संभावना थी कि पिताजी को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा, लेकिन उन्हें गिरफ्तारी की कोई फिक्र नहीं थी. वह महज़ इसलिए चिंतित थे कि उन्हें जेल में पान-तम्बाकू कैसे मिलेगा ! खैर, पिताजी की उज्वल साहित्यिक छवि के कारण और राजनीति से असम्बद्ध रहनेवाले व्यक्ति के रूप में चिन्हित कर उन्हें छोड़ दिया गया. जीवन में पहली और अंतिम बार वह जेल जाने से बच गए और ताम्बूल-सेवन पर कोई संकट न आया. लेकिन उल्लेखनीय यह है कि दिल्ली के गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान से रात दो बजे जब जयप्रकाशजी को हिरासत में लिया गया, उस कठिन और आपाधापी से भरे क्षण में भी जे.पी. को पिताजी का स्मरण रहा. उन्होंने श्रीरामनाथ गोयनका से कहा था--"मुक्तजी का ख़याल रखियेगा. वह परदेस में संकट में न पड़ जाएँ !" यह उनकी सदाशयता थी, उनका बड़प्पन था, उनका औदार्य था. वैसे पिताजी को कई महीने बाद निकट मित्र गंगाशरण सिंहजी से इस बात का पता चला था, जो जे.पी. की गिरफ्तारी के वक़्त उनके पास थे. जब पिताजी ने यह बात घर में बतायी थी, तो मैं आश्चर्य से अवाक रह गया था. जिस व्यक्ति पर इतने बड़े आन्दोलन का दायित्व था, जो सर्वशक्तिमान सत्ता को चुनौती दे रहा था, उसके हथकंडों से जूझ रहा था और जिस पर सारे देश की नज़र थी, वह अपने एक समर्पित सम्पादक के कुशल-क्षेम के लिए, ऐसे कठिन समय में भी, चिंता कैसे व्यक्त कर सकता था ! मैं आज भी यह सोचकर चकित-विस्मित होता हूँ. लेकिन सच है, उदात्त भावनाओं से भरे लोकनायक जयप्रकाशजी ऐसे ही महामानव थे.
फिर वक़्त बदला, आपातकाल का अंत हुआ, सत्ता बदली. अपनी रुग्णावस्था के कारण ही जयप्रकाशजी को जेल से मुक्त किया गया. बाहर आकर जो कुछ उन्हें देखना-सहना पड़ा, उससे वह क्षुब्ध ही हुए. उनका जरा-जर्जर शरीर आघात सहता-सहता क्लांत हो चुका था. अंततः उन्हें मुंबई के जसलोक अस्पताल में भर्ती किया गया, जहां वह डाईलिसिस की यंत्रणाएं झेलते-सहते रहे.
[क्रमशः] अँधेरी कोठारी के अकेले रौशनदान थे 'जयप्रकाश नारायण'

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

अँधेरी कोठारी के अकेले रौशनदान थे 'जयप्रकाश नारायण'

[तीसरी किस्त]
बातें हो चुकी थीं.जे.पी. ने फ़ोन उठाकर सच्चिदानंदजी को कुछ आवश्यक निर्देश दिए. एक सेवक चाय-बिस्कुट ले आया. हमने चाय पी ही थी कि सच्चिदानंदजी कई पुस्तकें और कुछ मुद्रित सामग्री लेकर कक्ष में प्रविष्ट हुए. उन्होंने कई टंकित पत्र भी जे.पी. के सामने रखे, जिन पर उन्होंने हस्ताक्षर किये. फिर स्वयं उठकर पुस्तकों की आलमारी तक गए, एक पुस्तक ले आये. उन्होंने उसपर कुछ लिखा और सब कुछ पिताजी के हाथों में सौंप दिया. सच्चिदानंदजी ने जे.पी. के हस्ताक्षरित कई पत्रों को लिफ़ाफ़े में डालकर पिताजी को दिया. मुद्रित सामग्री का पैकेट भी साथ था. ठीक-से मैं सुन नहीं सका, लेकिन सच्चिदानंदजी ने जे.पी. को कुछ ऐसा स्मरण दिलाया कि अमुक पत्र अभी तैयार नहीं है, एक दिन बाद वह मिल सकेगा. जे.पी. ने पिताजी से कहा--"आप तो दिल्ली जाने की तैयारियों में व्यस्त रहेंगे, परसों यदि आनंदजी को भेज दें तो अमुक सामग्री भी आपके पटना छोड़ने के पहले आपको मिल जायेगी." यही निश्चित हुआ. हमने उन्हें प्रणाम निवेदित किया और विदा हुए. भवन से बाहर आते ही मैंने पिताजी से मांगकर वह पुस्तक देखी. वह उन्हीं की पुस्तक थी--'मेरी विचार-यात्रा', जिसपर उन्होंने लिखा था--"मित्रवर मुक्तजी को--सपेम, जयप्रकाश." यह पुस्तक आज भी मेरे संग्रह में सुरक्षित है. जयप्रकाशजी के प्रथम दर्शन से ही मैं अभिभूत होकर लौटा.
शेष सामग्री लेने जब मैं दुबारा जयप्रकाशजी के निवास पर पहुंचा, तो वहाँ अत्यधिक भीड़ थी. वहीं मैंने पहली बार युवा तुर्क नेता चंद्रशेखरजी के दर्शन किये थे. वहाँ तो हलचल मची थी. अहाते में इतनी भीड़ थी कि मुश्किल से बीच की राह बनाता मैं किसी तरह सच्चिदानंदजी के पास पहुँच सका. पहली बार की तरह सच्चिदानंदजी मुझे जे.पी. के कक्ष तक ले गए. मैंने उनके चरणों का स्पर्श किया, बोले--"प्रसन्न रहिये." सच्चिदानंदजी ने दो पत्र और कागजों का एक पुलिंदा मुझे दिया. जयप्रकाशजी ने मुझसे कहा--"यह सब मुक्तजी को दे दीजिएगा, उन्हें मालूम है कि इनका क्या करना है." मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया. और किसी बात की गुंजाईश नहीं थी. वहाँ मिलनेवालों की कतार लगी थी और लोकनायक को क्षण-भर का अवकाश और विश्राम नहीं था, जबकि उनका शरीर थका हुआ और क्लांत लग रहा था. मैंने उन्हें पुनः प्रणाम किया और कक्ष से बाहर निकल आया.
दूसरे दिन पिताजी तो दिल्ली चले गए और बिहार में उथल-पुथल बढती गई. महीने-डेढ़ महीने बाद पिताजी द्वारा संपादित साप्ताहिक 'प्रजानीति' का प्रवेशांक पटना आया था. फिर तो यह क्रम ग्यारह महीने तक सप्ताह-दर-सप्ताह चलता रहा. पाठक अधीरता से 'प्रजानीति' की प्रतीक्षा करते थे. 'प्रजानीति' के अंक बुक-स्टाल पर आते और हाथों-हाथ बिक जाते. उस दौर में पत्र ने पूरे देश में और खासकर बिहार में खलबली मचा दी थी.

जयप्रकाशजी के दो बार दर्शन करके मैं ऐसा अभिभूत हुआ था कि आन्दोलन में और सक्रियता से जुड़ा. पटनासिटी में हम नवयुवकों की टोली नागार्जुनजी की अगुआई में नुक्कड़ कवि-गोष्ठियां करती, धरने देती, भूख हड़ताल पर बैठती और कर्फ्यू के आदेश की अवमानना करती.वे जोश-खरोश, उत्साह-उमंग और ऊर्जा से भरे दिन थे. आन्दोलन में सक्रियता से जुड़कर हमें ऐसा लगता था कि हम भी अपने देश के लिए कुछ अति महत्वपूर्ण कर रहे हैं, प्रदेश के नवनिर्माण में रेखांकित करने योग्य अपना-अपना योगदान दे रहे है. यह जज्बा, यह उमंग और उत्साह लोकनायक ने उन दिनों जन-जन में भर दिया था. यह जयप्रकाशजी का जादू था, यह उन्हीं के विराट व्यक्तित्व का कमाल था. कांग्रेस-जनों और सत्ता की चाटुकार टोली को छोड़कर ऐसा कौन था उस दौर में जो आन्दोलन की आग में कूद न पड़ा था !
पटना के गाँधी मैदान की उस जनसभा को मैं कभी भूल नहीं सकता, जिसमें जयप्रकाशजी ने बिहार की सोयी हुई जनता को जगाया था और सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया था.वह एक ऐतिहासिक विराट सभा थी. विशाल गाँधी मैदान तो खचाखच भरा ही था, मैदान के बाहर सड़कों पर, अगल-बगल के वृक्षों पर, भवनों पर लोग-ही-लोग दीखते थे. ऐसा जन-समुद्र मैंने पहले कभी नहीं देखा था. हाँ, पिछले वर्ष (२०११) श्रीअन्ना हजारे के जनलोकपाल के समर्थन में उमड़ी भीड़ उसी जन-पारावार का एक बड़ा अंश अवश्य थी, जिसे देखकर जयप्रकाशजी और उस दौर की मुझे बहुत-बहुत याद आयी थी....
[क्रमशः] अँधेरी कोठारी के अकेले रौशनदान थे 'जयप्रकाश नारायण'