बुधवार, 23 सितंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (४)


पूज्य पिताजी ने अपने एक लेख 'मरणोत्तर जीवन' में लिखा है--"मनुष्य-शरीर में आत्मा की सत्ता सभी स्वीकार करते हैं। शरीर मरणशील है, आत्मा अमर। मृत्यु के बाद शरीर को नष्ट होता हुआ--जलाकर, गाड़कर या अपचय के द्वारा--सभी देखते हैं, लेकिन आत्मा का क्या होता है? वह कहाँ जाती है? क्या करती है? शरीर के नष्ट होने के बाद उसका अधिवास कहाँ होता है? क्या इस जगत से उसका सम्बन्ध बना रहता है? क्या वह व्यक्ति-विशेष का ही प्रतिनिधित्व करती है? ये और इससे सम्बद्ध अन्य अनेक प्रश्न स्वभावतः मानव-मन में उठते रहते हैं। लेकिन आज के युग में उसका सुनिश्चित, तर्क-संगत, वैज्ञानिक उत्तर नहीं मिल पाता। इसलिए मनुष्य का मन ऊहापोह में पड़ा रहता है। उसकी खोज, उसके चिंतन का क्रम चलता रहता है।
हमारे पुराणों में मरणोत्तर जीवन का बड़ा विशद और संशय-रहित विवरण मिलता है। लेकिन आज के आदमी के लिए उसकी विशदता और संशयहीनता ही अविश्वास का कारण बनती है। उसका कहना है कि स्वयं मरे बिना मरणोत्तर जीवन की बात कैसे जानी जा सकती है और मरने के बाद उसे लिपिबद्ध कैसे किया जा सकता है? इसलिए पुराणों का विवरण कोरी कल्पना मात्र है।"
आत्मा की सत्ता के विवाद में मैं नहीं पड़ना चाहूंगा। वैसे भी अनुभूत सत्य को प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती। मरणोत्तर जीवन को जानने की अभीप्सा निरंतर बनी रही और जीवन अपनी राह चलता रहा।
मैंने १९७४ में पटना विश्वविद्यालय से स्नातक, वाणिज्य की उपाधि प्राप्त की और पूज्य पिताजी के पास दिल्ली चला आया। सन १९७५ में मैंने अपनी पहली नौकरी के लिए दिल्ली से कानपुर के लिए प्रस्थान किया। उत्तर भारत की एक प्रतिनिधि टेक्सटाइल कंपनी (स्वदेशी कॉटन मिल्स) में मुझे नियुक्ति मिली थी, पद था--लेखा-सहायक का। पिताजी ने एक पत्र मुझे चलते वक़्त दिया था श्रीलेखा विद्यार्थी के नाम। वह हुतात्मा गणेशशंकर विद्यार्थी की पौत्री थीं। पत्र-लेखक स्व. मार्तण्ड उपाध्यायजी थे। मार्तण्ड बाबूजी पिताजी की युवावस्था के दिनों के मित्र तो थे ही, कालान्तर में वह पिताजी के समधी भी बने थे। मेरी बड़ी बहन का विवाह उन्हीं के कनिष्ठ पुत्र से हुआ था। पुराने दिनों में ('प्रताप' के ज़माने में) पिताजी का भी प्रगाढ़ सम्बन्ध और पत्राचार गणेशशंकरजी से रहा था, किन्तु उनके अवसान के बाद वह सम्बन्ध-संपर्क विच्छिन्न हो गया था। मार्तण्ड बाबूजी का उनके परिवार की नयी पीढ़ी से संपर्क बना रहा। वह बहुत स्नेही, प्यार बाँटने वाले उदारमना भद्रपुरुष थे। उन्होंने स्वयं प्रवृत्त होकर श्रीलेखाजी के नाम वह पत्र लिखा था, ताकि कानपुर में यदि मुझे कोई परेशानी हो, तो उससे मेरी रक्षा हो सके।
बहरहाल, कानपुर पहुँचकर मैंने पद-भार स्वीकार कर लिया। जूही (कानपुर) के मिल-ऑफिस में मुझे पदस्थापित किया गया था तथा मिल से सम्बद्ध एक अलग परिसर में बने स्वदेशी कॉलोनी के बैचलर्स क्वार्टर में एक कमरा मुझे दिया गया था। बैचलर्स क्वार्टर का एक मेस भी था, जिससे दो वक़्त का भोजन मुझे मिल जाता था। मैं प्रतिदिन दफ़्तर जाने लगा।
जिस दिन मैंने स्वदेशी मिल ज्वाइन किया, उसके ठीक दूसरे दिन एक अन्य युवक ने भी स्वदेशी मिल के लेखा विभाग में नौकरी पकड़ी--सुदर्शन, गौरांग, कसी हुई बलिष्ठ भुजाओंवाले और कंधे तक झूलते हिप्पी-जैसे केशोंवाले युवा! उनका नाम था--ध्रुवेन्द्रप्रताप शाही। उन्हें मेरे ही समतुल्य पद पर नियुक्त किया गया था तथा स्वदेशी कॉलोनी के बैचलर्स क्वार्टर में मेरा ही रूम-पार्टनर बनाया गया था। दफ़्तर तो वह आने लगे थे, लेकिन मेरा रूम-पार्टनर बनने में उन्होंने प्रायः डेढ़-दो महीने का वक़्त लगाया। दरअसल, उनके बड़े पिता का निवास कानपुर के आर्य नगर में था, वह वहीं से साइकिल चलाकर दफ़्तर आया करते थे। पहली ही मुलाक़ात में उनके व्यक्तित्व ने मुझे आकर्षित किया था, लेकिन वह मुझे कम मिलनसार व्यक्ति लगे थे, थोड़े चुप-से और थोड़े अकड़ू भी डेढ़-दो महीने बाद जब वह सचमुच मेरे रूम-पार्टनर बने और उनके निकट आने का मुझे पर्याप्त अवसर मिला, तो ज्ञात हुआ कि वह एक गम्भीर व्यक्ति अवश्य हैं, लेकिन नीरस नहीं। कालान्तर में उनसे मेरी मित्रता इतनी प्रगाढ़ हुई कि आज इतने वर्षो बाद भी वह ज्यों-की-त्यों बनी हुई है।
कानपुर पहुँचने के बाद जो पहला रविवार का अवकाश मुझे मिला, उसी दिन सुबह तैयार होकर मैं मार्तण्ड बाबूजी के पत्र के साथ श्रीलेखा विद्यार्थीजी से मिलने उनके तिलक नगर आवास पर पहुंचा। एक विशाल परिसर के बीच बना वह पुरानी हवेली-सा मकान था। उनके सम्मुख पहुंचते ही मैंने मार्तण्ड बाबूजी का पत्र उन्हें दिया। पत्र पढ़कर वह बहुत प्रसन्न हुईं। वह कानपुर न्यायालय की सरकारी वकील और समाज की सम्मानित महिला थीं--अविवाहिता। उस हवेलीनुमा मकान के अग्र भाग में उनका दफ्तर था और पीछे आवास। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी छोटी बहन को बुलाया, जिनका नाम मधुलेखा विद्यार्थी था। मधुलेखाजी कानपुर के एक महाविद्यालय में हिंदी की व्याख्याता थीं। वे दोनों बहनें बहुत आत्मीयता से मिलीं और मुझे देर तक अपने पास रोके रखा। दिन का खाना खिलाकर और प्रति-सप्ताह घर आने का वादा लेकर ही उन्होंने मुझे विदा किया। दोनों बहनों ने इतना स्नेह दिया कि मैं अभिभूत हो गया। उन दोनों ने मुझे अपना मुंहबोला भाई बना लिया और क्रमशः अपनत्व इतना प्रगाढ़ हुआ कि
(क्रमशः)
[चित्र : स्व. मार्तण्ड उपाध्यायजी एवं पिताजी (दाएं )]
मैं प्रति शनिवार उनके घर जाता और सोमवार की सुबह सीधे दफ्तर के लिए वहाँ से निकलता। जब तक मैं कानपुर में रहा, यह सिलसिला अनवरत चलता रहा।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (३)

[ओझागिरी मैं अवश्य करूंगा...]


जब मैंने किशोरावस्था की दहलीज़ लांघी और मूंछ की हलकी-सी रेख चहरे पर उभर आई, तो चाचाजी मेरे प्रश्नों के संक्षिप्त और संतुलित उत्तर देने लगे। उनके पास कथाओं का अंबार था--अनुभूत सत्य से भरी कथाएं--रोमांचक! फिर भी वह आत्माओं से संपर्क के अपने अनुभव बतलाते हुए अपनी वाणी को संयमित रखते। उतना ही बताते, जितना बतलाना उचित समझते। इस विद्या के उनकी गति बहुत थी। उनके निर्देश पर आमंत्रित आत्माएं स्वयं उत्तर दे जाती थीं, पेन्सिल स्वयं खड़ी होकर प्रश्नों के उत्तर कागज़ पर लिख जाती, कोकाकोला के टिन के ढक्कन समस्याओं के समाधान के लिए अक्षरों का स्पर्श करने स्वतः चल पड़ते।उनके पास यह जो गूढ़ विद्या थी, उन्हीं के साथ चली गई। उसे उन्होंने किसी के साथ बांटा नहीं, किसी को दिया नहीं। मैं जिज्ञासु बना उनके आगे-पीछे मंडराता भी रहा, लेकिन उस कच्ची उम्र में वह मुझे इस विद्या के लिए अयोग्य अथवा अपात्र ही मानते रहे। सत्य यह भी है कि मैं उनके संपर्क में कम ही रहा। मैं पटना में, तो वह किसी दूसरे शहर में। छुट्टियों में ही उनसे मिलना हो पाता। कालान्तर में उनका स्थानांतरण तुर्की, मुजफ्फरपुर से आरा के एक जनपद (बभनगावाँ) में हो गया। वहीं रहते हुए, मात्र ५१ वर्ष की आयु में, सन १९७० में उन्होंने परमगति पायी। सच है कि उन्होंने ही मेरे मन में पारलौकिक जीवन के रहस्यों को जानने की तीव्र उत्कंठा, प्रबल आकर्षण और गहरी पिपासा जगाई थी। इस रूप में वे ही मेरे प्रथम गुरु थे। आज यह दस्तावेज़ लिखते हुए मैं उन्हें स्मरण-नमन करता हूँ।
मैं थोड़ा और बड़ा हुआ तो खोज-ढूंढकर पराजीवन में हस्तक्षेप की अनेक पुस्तकें पढने लगा--'रवीन्द्रनाथ की परलोकचर्चा', 'The Life after death ' आदि। इसी अध्ययन-क्रम में एक पुस्तक मेरे हाथ लगी--'पीले गुलाब की आत्मा'। इस पुस्तक के लेखक थे--विश्वम्भर मानव। पुस्तक में चाचाजी का उल्लेख देखकर मुझे प्रसन्नता हुई थी। यह भी ज्ञात हुआ था कि इस विधा में उनकी क्षमता और पहुँच क्या थी। प्रौढ़ावस्था की पहली सीढ़ी पर पाँव रखते ही उन्होंने शरीर त्याग दिया था। पितामह की तरह अल्पायु हुए चाचाजी (दोनों की आयु ठीक ५१ वर्ष) को यदि अपेक्षाकृत दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता, तो मेरे वयस्क होने पर इस विद्या का कोई सूत्र वह मुझे ही देते, इसका मुझे पूरा विश्वास है। किन्तु जो हो न सका, उसका खेद भी क्या ? बाबा तुलसीदास कह भी तो गए हैं--'हानि-लाभ जीवन-मरण, जस-अपजस विधि हाथ।'
लेकिन एक माध्यम बनकर परा-जगत में हस्तक्षेप करने की अपनी प्रबल इच्छा मैंने लम्बे समय तक मन में ही दाबाये रखी और सोचता रहा कि जब कभी, कहीं योग्य गुरु मिलेंगे, तो थोड़ी ओझागिरी मैं अवश्य करूंगा।
(क्रमशः)

रविवार, 20 सितंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (२)


[प्रथम स्पर्श]
मेरे रोने की आवाज़ जैसे ही वातावरण में गूंजी, चाचाजी और उस अज्ञात स्त्री की वार्ता अवरुद्ध हो गई। चाचाजी अपनी चौकी से उठकर मेरे पास आये और पूछने लगे--'क्या हुआ, रो क्यों रहे हो ?' मेरे मुंह से तो शब्द ही नहीं निकल रहे थे। बोलने की कोशिश की, तो हकलाकर रह गया। चाचाजी ने मेरी मशहरी उठाई और मेरे पास बैठ गए, मेरी पीठ सहलाते हुए बार-बार अपना वही प्रश्न दुहराते रहे। थोड़ी देर में मैं संयत हुआ और अंततः मेरे मुंह से बोल फूटे--'मुझे यहां डर लग रहा है।' उन्होंने मेरी बात सुनकर कहा--'ठीक है, डरो मत, आओ, तुम मेरे पास सो जाओ...।' लेकिन मुझे तो उनसे भी डर लगने लगा था। मेरे हठ पर चाचाजी मुझे घर के अंदर ले गए और चाचीजी के सुपुर्द कर आये। वह रात करवट बदलते, डरते और जागते-सोते बीत गई।
सुबह मैं देर से उठा और आँखें मींचते सीधे चाचाजी के पास जा पहुंचा। मैंने उनसे हठात प्रश्न किया--'चाचाजी, आप रात में किनसे बातें कर रहे थे? ' वह मुझसे अचानक ऐसे प्रश्न की उम्मीद शायद नहीं कर रहे थे। कुछ क्षण ठहरकर बोले--'तुम्हें भ्रम हो गया होगा।...ओह, तभी तुम रात में डर गए थे...!'
मैंने दृढ स्वर में प्रतिवाद किया--'नहीं, मैं तो आपकी बातचीत सुनकर ही जागा था और आपके पास किसी को न देखकर भयभीत हुआ था। डर के मारे ही मैं रोने भी लगा था। मुझे बताइये न, जब आपके पास कोई नहीं था, फिर आप बातें किनसे कर रहे थे?'
चाचाजी समझ गए कि मैं रात की कोई बात भूला नहीं हूँ। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा--'अच्छा, सब बताऊंगा, पहले दातून कर लो, फिर नाश्ता करके मेरे पास आना।' मुझे लौटना पड़ा। जल्दी-जल्दी मैंने नीम के दातून से दांत साफ़ किये, नाश्ता किया और तुरंत चाचाजी के कमरे में जा खड़ा हुआ। उन्होंने कॉलेज जाने की बात कहकर मुझे फिर टाल दिया। मुझे थोड़ी निराशा हुई, लेकिन मेरी जिज्ञासा चरम पर थी। मैंने अपने चचरे बड़े भाई (श्रीनवीनचन्द्र ओझा) को पकड़ा। पिछली रात की सारी बात बताकर मैंने उनसे पूछा--'भैया, आप मुझे बताइये, रात में चाचाजी किनसे बातें कर रहे थे?' उनके पास भी मेरे प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं था, बोले--'अरे, बाबूजी को कभी-कभी नींद में बोलने की आदत है। तुमने वही कुछ सुन लिया होगा और डर गए।' मैंने फिर पूछा--'लेकिन वह जो एक महिला की आवाज़ मैंने सुनी थी...?' भइया बोले--' डरे हुए बच्चे ऐसी कृत्रिम आवाज़ें सुन लेते हैं, वह तुम्हारा भ्रम है अथवा कल्पना।' भइया की बात सुनकर मैंने चुप्पी मार ली और चाचाजी के कॉलेज से लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।
दोपहर में देर से चाचाजी घर लौटे। मैं उत्सुकता से भरा शीघ्र उनके पास पहुंचा और मैंने अपना वही प्रश्न फिर दुहराया, लेकिन उस प्रवास में मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिलना था, सो नहीं मिला। ग्रीष्मावकाश अथवा दुर्गापूजा की छुट्टियों में बार-बार तुर्की जाने का अवसर मिलता, किन्तु मेरे मन में गूंजते प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते। अपनी इसी आतुर जिज्ञासा पर कई बार मुझे उनकी झिड़की भी सुननी पड़ी थी।
अंततः एक दिन अचानक ही वह राज़ मुझ पर फाश हो गया। सुबह के समय कुछ लोग चाचाजी के पास आये थे और बंद कमरे में उनकी बातें हुई थीं। वहाँ बच्चों का प्रवेश बाधित था। आधे घंटे की बातचीत के बाद वे लोग चले गए। शाम के वक़्त वही लोग फिर आये। गोधूलि का समय था। धरा से प्रकाश तिरोहित हो रहा था। वे सब लोग, जिनकी संख्या तीन थी, चाचाजी के कमरे में बंद हो गए। कमरे में बल्ब भी नहीं जलाया गया था, लिहाज़ा, वहाँ बाहर से अधिक अन्धकार व्याप्त था। मेरी उत्कंठा मुझे उस छजली पर ले गई, जहां एक रौशनदान चाचाजी के कमरे में खुलता था। मैंने उसी रौशनदान से अंदर देखने की कोशिश की, वहाँ से बस आधा कमरा दीखता था। रौशनदान से गुगल-हुमाद-लोहबान और अगरबत्ती की खुशबू आ रही थी और धुँआ छनकर निकल रहा था। कक्ष में बस एक मोमबत्ती जल रही थी। मुझे लगा, कोई पूजन-विधान, कोई अनुष्ठान वहाँ हो रहा है। मैं वहीं छजली पर टिका रहा और अंदर की गतिविधियों पर दृष्टि गड़ाए रहा। थोड़ी देर में अस्पष्ट स्वर कानो में पड़े, वह चाचाजी की आवाज़ थी, लेकिन वह क्या बोल रहे हैं, यह समझना कठिन था। वहाँ घुटने के बल बैठे हुए मुझे मुश्किल से पंद्रह-बीस मिनट ही हुए थे कि जाने कैसे चाचाजी को आभास हो गया कि कोई अनुष्ठान में बाधक बन रहा है। उनका तीव्र रोष प्रकट हुआ--'कौन है वहाँ...?' मैं घबराकर रौशनदान से हट गया और वहीं थोड़ा हटकर दुबका रहा। लेकिन चार-पांच क्षणों के बाद ही घर के अन्य सदस्य बाहर निकल आये--सबसे आगे नवीन भैया थे, उनके पीछे गीता दीदी और चाचीजी। उन्होंने आवाज़ देकर मुझे नीचे उतर आने को कहा। मैं क्या करता, चुपचाप नीचे उतर आया--चोरी-जैसे अपराध-बोध के साथ। वह रात गुमसुम बीत गयी।
दूसरे दिन चाचाजी के सामने मेरी पेशी हुई। उन्होंने मेरे कान उमेठे और नाराज़गी के साथ हिदायत दी कि फिर ऐसा कभी न करूँ। मेरा बाल-मन इससे बहुत आहत हुआ; क्योंकि चाचाजी का स्नेहभाजन मैं उस दिन कोपभाजन बन गया था। मेरी सारी चंचलता काफूर हो गई और मैं शाम तक चुपचाप अपनी नाराज़गी का इज़हार करता हुआ मुंह फुलाये रहा। मेरी मनोदशा देखकर शाम के वक़्त बड़ी दीदी (गीता ओझा--अब गीता पाण्डेय) द्रवित हुईं और मुझे समझाने-बुझाने मेरे पास आयीं। उन्होंने बड़े स्नेह से मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा--'तुम्हें भी तो ऐसा नहीं करना चाहिए था।' मैंने तपाक से कहा--'मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि अंदर क्या हो रहा है... और क्या? मेरे पूछने पर चाचाजी तो मुझे कुछ बताते नहीं और अब तो वह मुझसे नाराज़ भी हो गए हैं। पिछली बार भी, जब रात में वह किसी से बातें कर रहे थे, मैंने कितनी बार उनसे पूछा था कि वह कौन थीं, उन्होंने बताया था क्या...?'
बड़ी दीदी मेरे प्रश्न-प्रतिप्रश्न सुनकर और मेरा भाव-विगलित होना देखकर अंततः बोल ही पड़ीं--'अरे, वह कुछ नहीं, बाबूजी बंद कमरे में आत्माओं का आह्वान कर रहे थे। उनके पास जो लोग आये थे, उनकी किसी समस्या को सुलझाने के लिए...! वहाँ बच्चे नहीं जाते...। तुम्हें भी छज्जे पर नहीं जाना चाहिए था।'
मैंने पूछा--'मरे हुए लोगों की आत्मा का आह्वान...?' बड़ी दीदी के हामी भरने पर मैं चकित रह गया था और मेरी आँखें फटी रह गई थीं। मैं अपने मस्तिष्क में पिछले प्रवास की उस घटना के तंतु जोड़ने-सुलझाने लगा था। तभी पहली-पहली बार मैंने जाना था कि मृतात्माओं को बुलाया जा सकता है और उनसे बातें भी की जा सकती हैं, जटिल जीवन के उलझे धागे सुलझाये जा सकते हैं...! सचमुच, मैं आश्चर्य से अवाक था।...
(क्रमशः)

शनिवार, 8 अगस्त 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (१)

[मित्रो, ये चर्चाएं कई किस्तों में पूरी होंगी और क्रमशः एक पुस्तक की शक्ल अख्तियार कर लेंगी शायद। आप इन्हें किस्तों में पढ़ते जाने का अवकाश निकालेंगे तो मुझे प्रसन्नता होगी। ये चर्चाएं एक ओर मैं लिखता जाऊँगा, दूसरी तरफ आपके सम्मुख रखता जाऊँगा, इसमें काल का अंतर अथवा विक्षेप भी हो सकता है, जितना अवकाश मिलेगा, उतना ही लेखन हो सकेगा...! आपकी संस्तुति और आपके मंतव्य ही तय करेंगे इस लेखन का भविष्य। बस, आप इसे पढ़ने का श्रम करें, मुझे प्रसन्नता होगी। इस लेखन से बंधु-बांधवों के दीर्घकालिक अनुरोध की पूर्ति भी कर रहा हूँ। --आनंद]

प्रथम हस्तक्षेप...

वे मेरे बचपन के दिन थे। गर्मी की छुट्टियों में हम भाई-बहन को चाचाजी (स्व. कृष्णचंद्र ओझा) के पास भेज दिया जाता था। बात उन दिनों की है, जब चाचाजी जनता कॉलेज, तुर्की, मुजफ्फरपुर में पदस्थापित थे। पटना-मुजफ्फरपुर के बीच मुख्य राजमार्ग पर ही यह कॉलेज स्थापित था, जो मुजफ्फरपुर से ८ किलोमीटर पहले पड़ता था। कॉलेज का प्रांगण विशालकाय था, जिसमें खपरैलवाले छोटे-बड़े कॉटेज थे, पतले-सँकरे रास्ते थे--ईंट की चिनाई किये हुए, फूल-पौधों से भरी क्यारियां थीं, तो विशाल और पुरातन वृक्ष भी थे। आम, अमरूद, लीची, केला, शरीफा और न जाने कितने-कितने फलों के पेड़! कॉलेज-प्रांगण की शोभा देखते ही बनती थी। वहाँ हमारे बड़े मज़े थे। तुर्की कॉलेज पहुंचते ही हम पूरे परिसर में फैल जाते, दौड़ लगाते, वृक्षों पर चढ़ते, तितलियाँ पकड़ते और बरगद के वृक्ष पर झूले लगाते, झूलते। ठीक-ठीक स्मरण तो नहीं, लेकिन तब मैं संभवतः छह-सात साल का बालक था--चंचल, शरारती और कुछ हद तक उद्दंड भी।
चाचाजी बड़े मनमौजी थे--आनंदी जीव! पूरा जीवन उन्होंने अपनी ही शर्तों पर जिया और सुख-दुःख भोगते रहे। आज उनका स्मरण करते हुए याद आता है कि उनके जीवन में दुःख और संघर्षों की बदली हमेशा छायी रही, लेकिन वह सूर्य की तेजस्विता के साथ चमकने की ज़िद पर अड़े रहे।
वह बहुत सुरीली बांसुरी बजाते थे और भोजपुरी में श्रेष्ठ गीत और कविताएँ लिखते थे। निःशुल्क होम्योपैथी चिकित्सा करना और उसकी मीठी गोलियों से लोगों का इलाज़ करना उन्हें अच्छा लगता था, जबकि इसके लिए उनके पास कोई आधिकारिक प्रमाण-पत्र नहीं था। तुर्की जनपद के गरीब लोग उनके पास सुबह-सुबह बड़ी संख्या में जुटते थे और सबों को उनकी दावाओं से लाभ होता था। उनका प्रिय पेय चाय थी और निरंतर बीड़ी पीना उनका व्यसन। अपने सारे गौर-वर्ण भाई-बहनो में एकमात्र वही श्यामवर्णी थे, संभवतः इसीलिए उनका नाम 'कृष्णचन्द्र' रखा गया था और पिताजी आजीवन उन्हें 'कृष्णा' कहकर पुकारते रहे। वह पिताजी से नौ साल छोटे थे--खड़ी नासिका, उन्नत ललाट, चौड़ी छाती, बलशाली भुजाएं। पिताजी से सुना है, अपनी युवावस्था में इलाहाबाद के अखाड़े में जोर-आज़माइश भी करते थे और रात्रि में श्मशान-साधना भी...! वह जहां रहे, पूरी शान से रहे। जनता कॉलेज में भी उन्हीं का वर्चस्व था, कालेज के प्राचार्य भी उनके निर्णय के विरुद्ध नहीं जाते थे, जबकि चाचाजी उनके अधीनस्थ व्याख्याता पद पर कार्यरत थे। वहीं प्रसिद्ध लोक-गीत गायक संतराज सिंह 'रागेश' को मैंने पहली बार चाचाजी के पास आते-जाते देखा था। वह उनसे भोजपुरी लोकगीतों के लिए आग्रह करने आते थे। मेरी उद्दंडता को सराहनेवाले और शरारतों को दुलरानेवाले एकमात्र चाचाजी ही थे। जाने क्यों, उनकी मुझ पर अगाध प्रीति थी, अपने बाल-बच्चों से भी अधिक! वह मुखर व्यक्ति थे, आत्मगोपन उनकी वृत्ति में नहीं था, किन्तु जिन बातों को वह बतलाना नहीं चाहते थे, उन्हें कोई उनसे कहलवा नहीं सकता था। मुझे स्मरण है, कई अवसरों पर मेरे किसी साहसिक कारनामे से प्रसन्न होकर वह मुझे कॉलेज से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर एक बागान में ले जाते थे, जहां नौटंकी कंपनी के नाटक होते थे, मेला लगता था। उन्हीं के सौजन्य से मैंने कंपनी की कई नाट्य-प्रस्तुतियाँ देखी थीं--नौलखा हार, रानी पुतलीबाई, सुल्ताना डाकू वगैरह। इन नौटंकियों से मैं इतना प्रभावित होता था कि स्वयं मुख्य पात्र बनकर दिन-भर उनके संवाद की नक़ल करता फिरता था। वे अजब बेफिक्री और आनंद के दिन थे।
लेकिन, फिक्र को तो एक दिन पीछे लगना ही था और आनंद को काफूर होना। गर्मी के दिन थे। चाचीजी को छोड़ घर के सारे सदस्य बाहर विस्तृत मैदान में सो रहे थे। सबकी अलग-अलग चौकियां लगी थीं और मच्छरों से रक्षा के लिए मशहरियां। मंझले चाचा के बिस्तर पर दिन में सफ़ेद चादर बिछती, लेकिन रात के वक़्त वह शरीर में गड़नेवाले एक मोटे-काले कम्बल पर सोते, उस पर कोई चादर न बिछाते। यह मुझे अजीब-सा लगता, लेकिन कोई उनसे इसरार भी न करता कि एक चादर बिछा लें, कम्बल गड़ेगा। उस रात भी उन्होंने रोज़ की तरह लेटते ही बाँसुरी बजानी शुरू की। बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनते-सुनते जाने कब मेरी आँख लग गई। निद्राभिभूत हुए कितना वक़्त गुज़रा था, यह तो पता नहीं, संभवतः आधी रात बीत चुकी होगी; अचानक बातें करने की कुछ अस्पष्ट ध्वनि सुनकर मेरी नींद खुली और थोड़ा भय भी हुआ। आज भी उस रात की याद करता हूँ तो सिहरन होती है। बहरहाल, बिछी हुई चादर के एक छोर को खींचकर मैंने अपना मुंह ढँक लिया और डर के मारे आँखें बंद कर लीं, लेकिन मेरे सजग कान आती हुई अस्पष्ट ध्वनियों पर केंद्रित रहे। चाचाजी की धीमी आवाज़ तो मैं पहचान रहा था, किन्तु एक महिला का बहुत मंद स्वर चाचीजी का तो हरगिज़ नहीं था। मैं डरते हुए सोच रहा था कि चाचाजी किनसे बातें कर रहे हैं? और बातें क्या हो रही हैं, यह तो बिलकुल स्पष्ट नहीं था। मेरी जिज्ञासा ने भय पर विजय प्राप्त की और मैंने हिम्मत जुटाकर चाचाजी की चौकी की ओर अपनी अधमुंदी आँखों से देखा--वह चित्त लेटे हुए थे, शरीर में कोई हरकत नहीं थी। उस अँधेरी रात में उनकी मुख-मुद्रा की धुंधली छाया-भर देखी जा सकती थी, अधरों की हरकत को देख पाना तो असंभव था। लेकिन बातचीत की आवाज़ निरंतर कानों में पड़ रही थी और मैं सिहर रहा था। मैंने अपनी पूरी चेष्टा से अपनी अवलोकन-शक्ति को केंद्रित किया और गौर से देखा--आँखें फाड़कर। चाचाजी अकेले ही थे, उनके आसपास कोई नहीं था--कोई छाया-साया भी नहीं; फिर भी बहुत मंद्र नारी-स्वर मेरे श्रवण-पटल पर आघात कर रहा था लगातार। चाचाजी के पास किसी को न देखकर ऐसा भय समाया कि शरीर में कम्पन होने लगा और थोड़ी ही देर में मेरा रुदन गूँज उठा। आखिर मैं छह-सात साल का बालक ही तो था! … 
(क्रमशः)
[चित्र : पूज्य पिता के निधन के बाद शोकमग्न बैठे स्व. कृष्णचन्द्र  ओझा, सन 1934 का मेरे पास उपलब्ध एकमात्र चित्र]

रविवार, 18 जनवरी 2015

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर महाकवि निराला की संभवतः अप्रकाशित कविता...

[बंधु ! इस बार पटना से जो गट्ठर मेरे साथ आया है, उसकी पोटली नंबर-2 में एक बहुमूल्य पत्र निरालाजी की कविता के साथ मुझे मिला है । पत्र पिताजी को संबोधित है, जून 1942 का है । उन दिनों पिताजी 'आरती' नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन अपने स्वत्वाधिकार के 'आरती मन्दिर प्रेस, पटना से कर रहे थे । यह महत्वपूर्ण रचना भी निरालाजी ने पिताजी के पास प्रकाशन के लिए भेजी थी, मुझे मालूम नहीं कि यह पत्रिका में छपी या नहीं, क्योंकि जैसा पिताजी से सुना था, सन ४२ के विश्व-युद्ध के दौरान ही 'आरती' का प्रकाशन अवरुद्ध हो गया था । मुझे यह भी नहीं मालूम कि देशरत्न पर लिखी उनकी यह कविता कहीं, किसी और ग्रन्थ में संकलित हुई या नहीं....! अगर नहीं हुई, तो निःसंदेह यह अत्यंत महत्त्व का दस्तावेज़ है ।
मुझे आश्चर्य इस बात का है कि पिताजी जैसे असंग्रही व्यक्ति के पुराने गट्ठर में और खानाबदोशी की हालत में निरंतर घिसटते हुए यह पत्र आज भी 73 वर्षों बाद बचा कैसे रह गया...? संभवतः, मेरे सौभाग्य से ! मूल और टंकित प्रति के साथ आज इसे लोकार्पित कर धन्य हो रहा हूँ । --आनन्दवर्धन ओझा]
C/o Pandit Ramlalji garg,
karwi, Banda (U.P.)
15.6.'42.
प्रिय मुक्तजी,
क्षमा करें । मैं यथासमय आपको कुछ भेज नहीं सका । यह रचना देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसादजी पर है । भेज रहा हूँ । स्वीकृति भेजें । आप अच्छी तरह होंगे । मेरी 'आरती' इस पते पर भेजें--
श्रीरामकृष्ण मिशन लाइब्रेरी,
गूंगे नव्वाब का बाग़,
अमीनाबाद, लखनऊ ।
उत्तर ऊपर के पते पर । नमस्कार ।
आपका--
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
[पत्र के पृष्ठ-भाग पर कविता]
देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के प्रति...
उगे प्रथम अनुपम जीवन के
सुमन-सदृश पल्लव-कृश जन के ।
गंध-भार वन-हार ह्रदय के,
सार सुकृत बिहार के नय के ।
भारत के चिरव्रत कर्मी हे !
जन-गण-तन-मन-धन-धर्मी हे !
सृति से संस्कृति के पावनतम,
तरी मुक्ति की तरी मनोरम ।
तरणि वन्य अरणि के, तरुण के
अरुण, दिव्य कल्पतरु वरुण के ।
सम्बल दुर्बल के, दल के बल,
नति की प्रतिमा के नयनोत्पल ।
मरण के चरण चारण ! अविरत
जीवन से, मन से मैं हूँ नत ।।
--'निराला'

शनिवार, 10 जनवरी 2015

'प्रेम' की दो अद्भुत व्याख्याएं...

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'प्रेम' की दो अद्भुत व्याख्याएं, दो विभूतियों (पहली निरालाजी, दूसरी सुमित्रानंदन पंतजी की) की कलम से, पूज्य पिताजी की बहुत पुरानी १९३३ की पॉकेट डायरी से, जो अब ताड़-पत्र-सी हो गई है, आप सबों के अवलोकन के लिए....--आनंद]

बुधवार, 7 जनवरी 2015

माँ : एक अनुस्मृति...


( माँ की पुण्य-तिथि (४ दिसंबर) पर लिखित...! इससे पहले कि वर्ष के अंतिम दिन के साथ दिसंबर भी व्यतीत हो जाए और कल का सूर्य नए वर्ष (२०१५) का स्वागत करने को आ जाए, आप सबों को नव-वर्ष का अभिनन्दन कहते हुए और यह स्वीकार करते हुए कि मुझसे 'माँ' पर कविता नहीं होती, यह अनुस्मृति आपके सम्मुख रख रहा हूँ--आनन्द)



अब बहुत याद नहीं आती उसकी--
वह, जो बहुत पहले
बीच राह में मुझे छोड़ गयी थी;
लेकिन मेरी स्मृतियों के
निर्मल कोश में
सदा-सदा के लिए अंकित है वह...!

अब बहुत याद नहीं आती उसकी,
किसी कार्य-प्रयोजन पर,
किसी अनुष्ठान-विशेष पर,
जैसे छोटे भाई का विवाह हो,
मेरी बिटिया की शादी हो
और देव-पितर के स्मरण के बाद
मातृका-पूजन करते हुए
उसके नाम का अन्न-ग्रास
निकाला गया हो और--
ज्येष्ठाधिकार के कारण
मुझे ही वह थाली उसे सौंपनी हो
तो बड़ी शिद्दत से याद आती है वह,
चुभती हुई यादें--
मर्म को बेधती हुई...!

हर साल मेरे साथ
दिसंबर माह में ऐसा ही होता है,
यादों के आसमान में
पीछे, बहुत पीछे कहीं
उड़ता चला जाता हूँ
और उसकी पतली किनारीवाली
सफ़ेद साड़ी का आँचल थाम लेता हूँ,
पूछता हूँ उससे--
'तुम कैसी हो अम्मा?
बहुत दिनों से याद भी नहीं आयीं,
क्यूँ...?'
वह कुछ नहीं कहती,
रहती है मौन
और जैसी उसकी आदत थी,
धूप में स्याह पड़ जानेवाले
पावर के शीशे का अपना चश्मा
वह ऊपर उठाती है और
आँचल के एक छोर से
पोछती है अपनी गीली हो आई आँखें...
यह दृश्य देखते हुए
मेरी आँखें धुंधली पड़ जाती हैं
और ओझल होने लगती है
उसकी सम्मोहक छवि...!

मेरे जैसे दुष्ट, अशालीन और उद्दंड बालक को
सही राह पर लाने के लिए
उसने जाने कितनी पीड़ा सही-भोगी थी,
कष्ट उठाये थे...
मेरी बड़ी-बड़ी शैतानियों पर
कैसे वह वज्र कठोर हो जाती थी
और मुझे दण्डित कर
स्वयं पीड़ित होती थी...!
ब्राह्म मुहूर्त्त में हमें जगाने के लिए
वह जीवन-भर
सुबह चार बजे जाग जाती,
शरीर, मन और मस्तिष्क के सुपोषण के लिए
सौ-सौ जतन करती
पूजा-पाठ, कीर्तन करती,
दफ्तर जाती, घर के दायित्व निभाती
विद्यालय-निरीक्षण के लिए यात्राएं करती...
उसका तपःपूत कर्ममय जीवन
याद करता हूँ तो हैरत होती है
और अपनी नादानियों के लिए
आज होती है ढेर सारी कोफ़्त...!

उसका अंतिम दर्शन तो
सचमुच अलौकिक दर्शन था--
सुबह-सबेरे वह गई थी गंगा के घाट
मैं उसे पानी के जहाज तक
छोड़ने गया था--
जेटी से होते हुए मैं उसके साथ
जहाज के सबसे ऊपरी तल पर
प्रथम श्रेणी में जा पहुंचा...
मेघाच्छादित आकाश था
नीचे गंगा की कल-कल निर्मल धारा थी
और तेज शीतल-स्वच्छ हवा
निर्द्वन्द्व बह रही थी,
मैंने जहाज के अग्र भाग में
एक छोर पर पड़ी आराम कुर्सी के पास
रखा उसका सामान,
झुककर उसके चरण छुए
और फिर वापसी के लिए चल पड़ा--
मैं पांच कदम ही बढ़ा था
कि उसने पुकारा मुझे,
मैंने पलटकर उसकी तरफ देखा
और हतप्रभ रह गया...!

श्वेत साड़ी में,
तेज हवा में लहराता उसका आँचल
उड़ते, खुले, घने कुंतल केश--
वह कोई देवदूती-सी दिखी मुझे...
जैसे माता जाह्नवी स्वयं
आ खड़ी हुई हों सम्मुख,
मैं मंत्रमुग्ध-सा उसके पास पहुंचा,
उसने अपने दोनों हाथ
मेरे कन्धों पर रखे और--
थोड़े उलाहने, थोड़े उपदेश दिए,
समझाया मुझे...!
मैं हतवाक था, कुछ कह न सका,
बस, उस दिव्य मूर्ति को
अपलक देखता रहा...
और अचानक--
जहाज का भोंपू बज उठा;
पुनः प्रणाम कर लौटना पड़ा मुझे...!
फिर कभी उसे देखना,
बातें करना नसीब न हुआ;
लेकिन उसकी दिव्य मूर्ति,
वह भव्य-भास्वर स्वरूप आज भी
मन-प्राण पर यथावत अंकित है
और उसका वह स्वर गूंजता है कानों में...!
खूब जानता हूँ,
उन्हीं स्वरों ने, उसी पुकार ने
मुझे कमोबेश ठीक-ठाक
आदमी बनाया है...!

सोचता हूँ,
क्यों नहीं बहुत याद आती है वह...?
क्या आधी शती के दीर्घ-काल ने
उसकी स्मृतियों को
इतना धुंधला कर दिया है
कि मन अब उसकी ओर जाता ही नहीं...??

उसकी पुण्य-तिथि पर
आज जब कलम उठाई थी,
सोचा था, स्मृति-तर्पण करूंगा ,
नमन करूंगा उसे,
लिखूंगा मैं भी
अपनी माँ पर एक कविता...!
मानता हूँ, मुझसे माँ पर कविता नहीं होती...!!

'विदा-जगत' कहने के ठीक पहले
एकादशी की पूर्व-संध्या में
वह बाज़ार से ले आई थी
भजन-मग्न पवन-सुत का एक चित्र,
दूसरा राम-जानकी का...!
भजन की मुद्रा में
आज भी मग्न हैं महावीर
और मंद-मंद मुस्कुराते हैं प्रभु राम...
बस, माता जानकी खुली आँखों से निर्निमेष
देखा करती हैं जगत-प्रवाह--
जिसे पार कर गई है मेरी माँ...!!