शनिवार, 10 जून 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' (3) पं. हंसकुमार तिवारी

सत्ताइस दिनों के उस गया-प्रवास में बस एक बार और हंसकुमारजी के घर जाने का मौका मिला। जब उनके दरवाजे पहुँचा तो देखा कि हंसकुमारजी अहाते में ही पुष्प-पौधों के बीच, एक सेंटर टेबल पर अपने कागजात फैलाये, कुर्सी पर बैठे हैं और कुछ लिख रहे हैं। लौहद्वार खुलने की आहट से उनका ध्यान भंग हुआ। मुझे देखते ही उन्होंने हाँक लगायी--'आओ-आओ, इधर आ जाओ।' चरण-स्पर्श कर मैं उनके पास जा बैठा और बातें होने लगीं। बीच में ऊँची आवाज लगाकर उन्होंने मेरे आगमन की इत्तला के साथ चाय भेजने की हिदायत दी। थोड़ी ही देर में चाय आ गयी, बिस्कुट-नमकीन के साथ। हमने बातें करते हुए चाय पी।

चाय अभी खत्म ही हुई थी कि मैंने उनके कागजों की ओर देखा--फुलस्केप पृष्ठों पर अनूदित सामग्री के अक्षर मोती के दानों-से चमक रहे थे। हंसकुमारजी शिरोरेखाविहीन, थोड़े तिरछे-तिरछे, सुडौल अक्षर लिखते थे--कहीं काट-छाँट नहीं, शब्द-परिवर्तन नहीं, सर्वत्र एक समान, सधा हुआ सुंदर लेखन! तैयार प्रेसकाॅपी! उनके लिखे को देखकर मुझे पिताजी के अक्षरों और उनका लेखन याद आया, अनवरत एकाग्र परिश्रम याद आया। मैंने कहा--'आपके अक्षर बाबूजी के अक्षरों से बहुत मिलते-जुलते हैं, वह भी शब्दों पर शिरोरेखा नहीं डालते और उनका लिखा हुआ भी बहुत साफ-सुथरा होता है। वह भी आपकी तरह ही अनुवाद-कार्य में व्यस्त रहते हैं। बस, बाबूजी के अक्षर सीधे होते हैं और आपके थोड़े तिरछे।'

मेरी बात सुनकर वह मुस्कुराये और बोले--'कलम जितना घिसेगी, अक्षर उतने ही पुष्ट-सुडौल होंगे। मुक्तजी और मैंने भी जीवन-भर कलम घिसने के सिवा और किया भी क्या है?'
फिर, मेरे मुँह से बस इतनी-सी बात निकल गयी--'लेकिन यह परिश्रम, यह अध्यवसाय और ऐसी संलग्नता तो बड़ी कठिन साधना है। यह कष्ट-साधन कैसे कर लेते हैं आपलोग?'
मेरी बात सुनकर वह दो क्षण मौन रहे, फिर गम्भीरता से बोले--'मैंने पीछे जो जमीन छोड़ी है, वह तपता हुआ रेगिस्तान था और उसे मैंने पाँवों से चलकर नहीं, छाती के बल रेंगकर पार किया है। हमें राजकृपा का सुवर्ण रथ कभी प्राप्त नहीं हुआ। भीषण और निरंतर श्रम ही हमारे भाग्य का सुख है...और उसे ही हम सुखपूर्वक भोगते हैं!'...

मैं उनकी बात सुनकर सन्न रह गया। खुले बगीचे की आबोहवा में भी गम्भीरता तैरने लगी... तभी चाचीजी ने आकर हस्तक्षेप किया, बोलीं--'खाना तैयार है। आपलोग अंदर आ जाइये।' मैंने घड़ी देखी, डेढ़ बज रहे थे। बातों-बातों में खासा वक्त बीत गया था। सेंटर टेबल पर रखी पुस्तकें और कागजों को समेटने में मैंने हंसकुमारजी की मदद की और हम घर में दाखिल हुए। भोजन सुस्वादु था। हमने भोजनोपरांत मिष्टान्न की प्यालियाँ उठायीं और ड्राइंग रूम में आ बैठे और सामान्य बातें होने लगीं। पिछली बातों का अवसाद तो धुलने लगा, लेकिन हंसकुमारजी का वह वाक्य मेरे अंतर्मन में कहीं गहरे अंकित हो गया था हमेशा के लिए--'मैंने पीछे जो जमीन छोड़ी है, वह तपता हुआ रेगिस्तान था...'

मेरे लौट चलने का वक्त हो रहा था, लेकिन उन दिनों एक फितूर मेरे सिर पर सवार था, मैं जिन बड़े साहित्यिकों से मिलता, उनसे अपनी पाॅकेट डायरी में 'ज़िदगी क्या है', इस विषय पर उनके विचार लिख देने का आग्रह करता। यही आग्रह मैंने हंसकुमारजी से भी किया और अपनी जेब से डायरी निकाली। मेरा निवेदन सुनते ही हंसकुमारजी उठ खड़े हुए और अलमारी से एक छोटी-सी डायरी निकाल लाये। उसे मुझे देते हुए बोले--'इसमें ज़िंदगी पर लिखी हुई मेरी शत-सूक्तियाँ हैं, देख लो। जो तुम्हें पसंद होगी, वही लिख दूँगा।'

उस डायरी की सूक्तियाँ देखकर मुझे हैरत हुई। उसमें सूक्तियाँ नहीं, एक-से-बढ़कर एक नगीने जड़े थे--ज़िंदगी विषयक। उसमें से किसी एक का चयन करना आसान तो हर्गिज नहीं था। इसमें वक्त लगा, लेकिन मैंने अंततः जिस सूक्ति का चयन किया, वह मेरी स्मृति में ही अंकित रह गया; वह बहुमूल्य डायरी तो कानपुर शहर में मेरी साइकिल के कैरियर से राह चलते कहीं टपक गयी, जिसका अफसोस मुझे लंबे समय तक रहा। बहरहाल, जिस सूक्ति को मैंने पसंद किया था, उसे हंसकुमारजी ने मेरी डायरी में लिखकर हस्ताक्षर किये, तिथि डाली। मैं उपकृत होकर उनके घर से लौटा। वह सूक्ति थी--

'जो हुआ, सो हुआ समझो,
सुख-दुःख सब दया-दुआ समझो,
दाँव हारा कि जीत ली बाजी,
ज़िंदगी? ऐ मियाँ! जुआ समझो!!'
(क्रमशः)

रविवार, 4 जून 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' (2) : पं. हंसकुमार तिवारी

यह सन् '74 की बात है, जब देशव्यापी रेल-हड़ताल हुई थी। मैंने सिविल डिफेंस सेवा का प्रमाण-पत्र अर्जित कर रखा था। उन दिनों सिविल डिफेंस के प्रमाण-पत्रधारी नवयुवकों को बलात् सेवा-दान के लिए भेजा जा रहा था। मुझे भी गया जंक्शन के टेलीफोन एक्सचेंज पर तैनात कर दिया गया। मैं यह सोचकर सोत्साह इसके लिए राजी हो गया था कि बहुत दिनों के बाद चाँद से मिलूँगा और हंसकुमारजी के पुनर्दशन कर कृतार्थ होऊँगा। गया मैं चला तो गया, लेकिन वहाँ ऐसी अव्यवस्था फैली हुई थी कि पाँच-छह दिनों तक बिलकुल फुर्सत नहीं मिली। मैं प्रशिक्षण और सेवा-दान में लगा रहा। सातवें दिन फुर्सत मिली। मैं भागकर हंसकुमारजी के घर पहुँचा। वह बंगला के किसी विशाल ग्रंथ के अनुवाद-कार्य में व्यस्त थे, लेकिन मुझे देखकर प्रसन्न हो उठे। 'बैठो-बैठो' कहते हुए सामने पड़े कागज-किताब और कोश समेट कर वह एक किनारे रखने लगे तो मैंने कहा--'आप तो व्यस्त हैं, अपना काम न रोकिये। मैं तब तक चाँद से मिल लेता हूँ, कहाँ है वह?'

लेकिन उन दिनों चाँद गया में नहीं थे, किसी काॅलेज के छात्रावास में थे शायद। उनसे न मिल पाने की मुझे निराशा हुई। हंसकुमारजी ने अनूदित पृष्ठों को सहेजते हुए कहा--'यह तो महासमुद्र है, मेरे आसपास तरंगित होता रहेगा। तुम तो मुक्तजी का कुशल-क्षेम सुनाओ। कैसे हैं वह।' मैंने विस्तार से उन्हें घर-परिवार की कुशलता के समाचार दिये और गया में अपनी उपस्थिति का कारण-प्रयोजन बताया। वह सुनकर प्रसन्न हुए, बोले--'फिर तो तुम यहीं आ जाओ, यहीं से ड्यूटी पर चले जाना। स्टेशन पर जाने कैसा खाना मिलता हो। यहाँ कम-से-कम घर का भोजन तो मिलेगा।'

हंसकुमारजी से हमारे पारिवारिक संबंध थे--अत्यंत निकट के, आत्मीय! मेरे प्रति उनकी ऐसी प्रीति सहज स्वाभाविक थी, लेकिन मैंने स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्हें बताया कि 'आकस्मिक सेवाओं के लिए स्टेशन पर ही बने रहने की अनिवार्यता है, अन्यथा मैं आपके पास ही आ जाता। हाँ, साप्ताहिक अवकाश पर अवश्य आ जाया करूँगा।'

फिर, बात को घुमाकर मैं उनकी कविता पर ले आया और उनकी उसी कविता की मैंने उन्हें याद दिलायी, जिसे मैंने उनके श्रीमुख से कवि-सम्मेलन में सुना था। मैं उस कविता की पंक्तियाँ उद्धृत करने लगा तो वह बड़े खुश हुए। कहने लगे--'अरे वाह! तुम्हें तो कई पंक्तियाँ याद हैं उस कविता की। तुममें आया यह परिवर्तन मुझे अच्छा लगा। आखिर जिस महावृक्ष की छाया में कई पीढ़ियों को साहित्यिक संस्कार मिले, उसी की छाया में पलते-बढ़ते उन्हीं के सुपुत्र को क्यों न मिलते?'...
उनकी इस बात से मैं प्रसन्न हुआ, यद्यपि उनका परोक्ष इशारा बचपन की मेरी दुष्टता-उद्दण्डता की ओर भी था। मैंने उनसे कविताएँ सुनाने का अनुरोध किया तो उन्होंने एक नहीं, कई कविताएँ सुनायीं। मैं मंत्रमुग्ध सुनता रहा।
वह गौर वर्ण के सुदर्शन व्यक्ति थे। उनकी खनकदार आवाज में एक प्रकार का भारीपन था, जो अलग प्रभाव छोड़ता था। कविता पूरी लयात्मकता के साथ प्रवाह में सुनाते थे--स्पष्ट शब्दोच्चारण के साथ। उनके काव्य-पाठ का श्रवण करते हुए श्रोता विभोर हो जाता था। उस दिन मेरी दशा भी कुछ ऐसी ही थी। उनकी कई कविताओं में एक कविता देश के विस्मृत बलिदानियों के प्रति थी--बहुत प्रेरक कविता; जिसकी आरंभिक तीन पंक्तियाँ मेरी स्मृति में स्थिर थीं, उसका एक और छंद मैं नेट से आपके लिए ढूँढ़ लाया हूँ--
'मिट्टी वतन की पूछती
वह कौन है, वह कौन है?
इतिहास जिस पर मौन है! वह कौन है?
जिसके लहू की बूँद का टीका हमारे भाल पर
जिसके लहू की लालिमा स्वातंत्र-शिशु के गाल पर
जो बुझ गया गिरकर गगन से, निमिष में तारा-सदृश
बच ओस जितना भी न पाया, अश्रु जिसका काल पर
जिसके लिए दो बूँद भी स्याही नहीं इतिहास को
वह कौन है?...'

सुबह के नौ-दस बजे मैं उनके आवास पर पहुँच गया था, लेकिन बातों-बातों में दिन के दो बज गये। भोजन का वक्त हो गया था। सुदर्शना और स्नेहमयी चाचीजी ने भोजन कराने के बाद ही मुझे लौटने की इजाजत दी और हंसकुमारजी बार-बार ताकीद करते रहे कि छुट्टी मिलते ही मैं उनके पास आ जाऊँ। उस पीढ़ी के लोगों के अंतर्मन में कितनी प्रीति, कितना स्नेह भरा पड़ा था, यह सोचकर मैं आज भी हैरान होता हूँ।...
(क्रमशः)


(चित्र : सन् 1968 में मेरी माता के निधन पर हंसकुमार तिवारीजी का शोक-संवेदना का पिताजी को संबोधित पत्र, दिनांक : 13-12-1968)

बुधवार, 31 मई 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' : पं. हंसकुमार तिवारी

जब बहुत छोटा और उद्दण्ड होने की हद तक चंचल बालक था, तब एक बार पिताजी सपरिवार गया गये थे और हंसकुमार तिवारीजी के यहाँ ठहरे थे। किस प्रयोजन से गये थे, यह तो याद नहीं, लेकिन स्मृति में स्पष्ट अंकित है कि हंसकुमारजी के घर में फल-फूलों के बहुत-से पेड़-पौधे थे, लताएँ थीं। उनके घर हमें बहुत सुस्वादु भोजन और मिष्टान्न मिला था और वहीं मुझे हमउम्र एक मित्र भी मिल गये थे--'चाँद', जो हंसकुमारजी के सुपुत्र थे--गोरे-सुंदर-से बालक। याद नहीं, फिर भी लगता है, वह एक-दो दिन का ही प्रवास था। मित्र रूप में मुझे चाँद मिले और मेरी बड़ी बहन को मिलीं 'ब्ल्यू' दी'। एक-दो दिनों में ही मैंने और चाँद ने मिलकर हंसकुमारजी के घर में हाहाकारी तूफान मचा दिया था। दरअसल, चाँद भी मेरे ही गुण-गोत्र के थे।

गया में पिताजी के दो मित्र थे--एक कनिष्ठ हंसकुमार तिवारीजी, दूसरे वरिष्ठ मोहनलाल महतो 'वियोगी'जी। हंसकुमारजी पिताजी से उम्र में आठ साल छोटे थे और पिताजी को 'गुरुजी'/'गुरुदेव' कहते थे। वियोगीजी पिताजी से आठ वर्ष बड़े थे, लेकिन मित्रता घनिष्ठतम थी। उसी प्रवास में पिताजी हमसबों के साथ वियोगीजी के हवेलीनुमा पैतृक घर भी गये थे उनसे मिलने।...

बहरहाल, मित्रवर चाँद ने भी उद्दण्डता की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की और पटना के उसी आवासीय विद्यालय में प्रवेश पाया, जिसमें मुझे घर-निकाला देकर दाखिल किया गया था--'पंचशील छात्रावासीय विद्यालय', कुम्हरार, पटना। उस विद्यालय में डेढ़-दो साल में ही मैंने और चाँद ने मिलकर ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये कि प्राचार्य महोदय को अभिभावकों से अंततः कहना ही पड़ा कि 'इस विद्यालय का कल्याण इसी में है कि आप अपने बच्चों को घर ले जायें।'... और हम दोनों ही छात्रावास रूपी उस बंदीगृह से मुक्त हो गये थे।

कुछ समय के बाद, उच्च शिक्षा के लिए हंसकुमारजी की ज्येष्ठ सुपुत्री ब्ल्यू दीदी पटना आयीं और कुछ महीने हमारे साथ ही रहीं। उनकी और मेरी बड़ी दीदी की खूब बनती थी। मेरी माँ भी ब्ल्यू दीदी से बहुत स्नेह करती थीं। घर में ब्ल्यू दीदी के आने से मुझे एक बड़ा लाभ यह हुआ था कि मुझे डाँट-फटकार कम मिलती थी और मुझे प्राप्त होनेवाले किसी भी दण्ड के बीच वह दीवार बनकर खड़ी हो जाती थीं। लेकिन लंबे वक्त तक यह सुख-लाभ भी मुझे मयस्सर न हुआ और ब्ल्यू दीदी को जैसे ही महाविद्यालय के छात्रावास में स्थान मिला, वह वहाँ चली गयीं। वक्त के इन छोट-छोटे टुकड़ों में साथ रहते-बिछड़ते हमारे बीच ऐसी घनिष्ठता हुई कि कभी यह खयाल ही न आया कि ब्ल्यू दीदी और चाँद का बाहर का नाम पूछकर जान लूँ; पुकार के इन्हीं नामों से वक्त का वह टुकड़ा व्यतीत हो गया और ऐसा व्यतीत हुआ कि फिर कभी जीवन में लौटकर नहीं आया।... बचपन के दिनों की तरह ही ब्ल्यू दीदी और चाँद भी अलभ्य हो गये।...

जब थोड़ा बड़ा हुआ, सुबुद्ध बना और अपने बुजुर्गों की महत्ता जानने-समझने लगा तथा अपने विद्यालय का कविता-पाठी छात्र बनकर प्रसिद्धि पाने लगा, तब की बात है--संभवतः 66-67 की। आकाशवाणी, पटना द्वारा आयोजित एक कवि-सम्मेलन में पिताजी की कृपा से मुझे अग्रिम पंक्ति में स्थान मिल गया था। सम्मेलन का संचालन पिताजी ने ही किया था। उन दिनों के कवि-सम्मेलनों की याद करता हूँ तो आज के ऐसे आयोजन फीके-से लगते हैं। इस कवि-सम्मेलन में नामी-गिरामी हस्तियाँ पधारी थीं, जिनमें हंसकुमार तिवारीजी भी थे। उन्होंने बड़ी प्रवाहपूर्ण कविता पढ़ी थी, जो मेरी स्मृति में अंकित होकर रह गयी :

'मीत !
आग के अक्षरों लिखा ये गीत
सुनो, चिनगी चाहे मत चुनो!'
कविता ने जैसे-जैसे विस्तार पाया, वैसे-वैसे वह अनूठी और अप्रतिम होती गयी। हाँ, सच है कि मैंने पूरे मनोयोग से वह कविता सुनी और उसकी चिनगी भी चुनी थी। उसी कविता का अगला टुकड़ा यह था :
'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था,
काँटों की टहनी पर ईसा-सा झूला था,
उस क्रूर पर वह सर्द-सा मुस्कुराया,
गूँगा दिल तड़पकर होंठों पर तिलमिलाया।'...
'सर्वसहा धरती का धीर आज डोला है,
तीर खाये कीर का ये पीर आज बोला है।'...
पूरी कविता एक मार्मिक बयान थी, जैसे कवि अपने ही मन की पीर शब्दों में बाँधकर बाँट रहा हो।
टुकड़ों में यह पूरी कविता प्रायः मुझे याद हो गयी थी, क्योंकि इसकी पंक्तियाँ मेरे अंतर्मन में गूँजती रहती थीं और मैं उनकी आवृत्ति करता रहता था। आज भी स्मरण से ही इन पंक्तियों को उद्धृत कर रहा हूँ। तब की स्मृतियाँ अधिक उज्ज्वल हैं। अब तो, अभी की बात, अभी भूल जाता हूँ।...
(क्रमशः)

(चित्र : मेरे पिताजी पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' और पं. हंसकुमार तिवारी की अत्यंत धुँधली-सी तस्वीर जो एक सम्मिलित चित्र से निकाली गयी है। आप स्वयं देख लें, हमारी आधुनिक दुनिया कितनी संवेदनशील है अपने देश के लेखकों-कवियों के प्रति! सारा नेट-तंत्र खँगाल डाला, कहीं हंसकुमारजी का एक चित्र भी नहीं, आवश्यक सूचनाएँ भी नहीं, पुण्य-तिथि तक का उल्लेख नहीं।... आश्चर्य होता है!)

रविवार, 30 अप्रैल 2017

वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन...(2)

उन दिनों मेरी श्रीमतीजी साथ नहीं थीं। उन्होंने मेरी प्रथम कन्या को जन्म दिया था और वह अपने मायके में थीं। मैंने तब तक आचार्यश्री को शीतल जल ही पिलाया था और बातें सुनने में मशगूल हो गया था। अचानक पिताजी को ख़याल आया तो उन्होंने आदेश दिया-- 'वाजपेयीजी के लिए चाय-पान की कुछ व्यवस्था तो करो।' आदेश की पालना के लिए मैं उठने ही वाला था कि छोटे भाई लौट आये। आचार्यश्री के चरण-स्पर्श से उन्होंने भी वही प्रसाद पाया, जो मुझे मिला था। उन्होंने ही आचार्यश्री के जलपान और चाय की व्यवस्था की। मैं, आचार्यश्री और पिताजी की वार्ता का मूक श्रोता बना, वहीं, उन्हीं के आसपास रहा। बातें अनेक विषय-बिंदुओं का स्पर्श करती हुई फिर जयप्रकाशजी पर आ गयीं। पिताजी वाजपेयीजी को विस्तार से बताने लगे कि जब जयप्रकाशजी जसलोक अस्पताल, मुंबई में थे, तब अज्ञेयजी के अनुरोध पर वह उनके साथ मुंबई गये थे और लोकनायक से मिले थे।
पिताजी और जयप्रकाशजी की वार्ता भोजपुरी में शुरू होती, फिर अज्ञेयजी का ख़याल कर जे.पी. हिंदी में बोलने लगते और बातें हिंदी में होने लगतीं; किन्तु थोड़ी ही देर बाद पिताजी की ओर मुखातिब होकर जब जे.पी. कुछ कहने लगते तो भाषा स्वतः भोजपुरी हो जाती। ऐसा जब दो-तीन बार हुआ तो जे.पी. ने अज्ञेयजी से कहा-- 'मुक्तजी से मेरी बातचीत की भाषा वर्षों से भोजपुरी रही है, इसलिए...! आप कुछ ख़याल न कीजिएगा।' अज्ञेयजी ने प्रत्युत्तर में बस इतना कहा था--'भोजपुरी मैं बोल नहीं पाता, लेकिन समझता तो अच्छी तरह हूँ।...'
जयप्रकाशजी बड़े कष्ट में थे, लेकिन पिताजी-अज्ञेयजी को देखकर खिल उठे थे। उन्होंने कहा था--'कल तो डायलिसिस पर रहूँगा। परसों मिलकर ही जाइयेगा। आपलोग आ जाते हैं तो अच्छा लगता है।'...
आचार्यश्री पिताजी की बातें ध्यान से सुन रहे थे। पिताजी की बात पूरी हुई तो उन्होंने कहा--'बिल्कुल सत्य लिखा है आपने। जयप्रकाशजी तो दधीचि ही थे। देश और जनसेवा में उन्होंने सर्वस्व निछावर कर दिया--और तो और, अब निज देह भी अर्पित कर दी।'...
दो घण्टों की निरंतर वार्ता के बाद आचार्यश्री विदा लेने के लिए उठ खड़े हुए। मैंने विनम्रता से कहा--'कंपनी की गाड़ी आपको कनखल तक छोड़ देगी। मैं ड्राइवर को बुलाता हूँ अभी।' उन्होंने कहा--'रहने दीजिए, इसकी आवश्यकता नहीं। मैं पैदल चलने का अभ्यासी हूँ। जैसे आया था, वैसे ही चला जाऊँगा।'...और वह चले गये।

आचार्यश्री तो चले गये और मैं सोचता ही रहा कि प्राचीनकाल में ऋषि-कुल के तपी-तपस्वी, साधक तथा परम गुणी-ज्ञानी महापुरुष ठीक ऐसे ही रहे होंगे--आडम्बरविहीन, एकनिष्ठ, सरल-सहज, उदात्त! उन्होंने अपनी साज-सज्जा, वेशभूषा और प्रदर्शन-प्रियता से नहीं, अपनी प्रखर तेजस्विता और अनूठी-अगाध विद्वता से आचार्य-पद पाया था। उनका बाहरी आवरण और रूप-सज्जा चाहे जैसी रही हो, वह चाहे दीन-हीन, दरिद्र ही क्यों न दिखते हों, दुनिया उनकी चरण-वंदना में नतशिर रही। उन्होंने एक आलेख से पिताजी का पता पाया था और उस आलेख से इतने प्रसन्न-प्रभावित हुए थे कि स्वयं चलकर हमारे द्वार पर आ गये थे तथा हमें दर्शन और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया था।...
आचार्यश्री हिन्दी को शब्दानुशासन देने वाले 'हिन्दी के पाणिनी' थे। यह उपधि उन्हें उनके जीवनकाल में ही मिल गयी थी, जो सर्वस्वीकृत थी। 'हिन्दी, संस्कृत की नहीं, किशोरीदास की बेटी है'--यह गर्वोक्ति नहीं, आधिकारिक उद्-घोषणा थी आचार्यश्री की। और, ऐसी बात कहने का साहस सिर्फ वही कर सकते थे।
कुछ समय बाद पिताजी कनखल जाकर आचार्यश्री से
मिल आये थे, मैं ही अपनी कार्यालयीय व्यस्तताओं में उलझा रहा और पुनः उनके दर्शन का अवकाश न निकाल सका। आचार्यश्री के पुनर्दशन से लौट आने के बाद पिताजी ने बताया था कि "वाजपेयीजी 'काव्यानुशासन' नामक एक वृहत् ग्रंथ के प्रणयन की कार्य-योजना पर काम कर रहे हैं और उनकी समस्त चिंता यही है कि अपने जीवन काल में यह काम वह पूरा कर सकें। गजब जीवट के महानुभाव हैं वाजपेयीजी भी! लेकिन, मुझे नहीं लगता कि उम्र की इस दहलीज पर, आँखों की इस दशा में और शरीर की सीमित हो रही शक्ति से वह यह काम पूरा कर सकेंगे।" और हुआ भी यही। आचार्यश्री हिन्दी को 'काव्यानुशासन' दे न सके।... लेकिन जितना कुछ वह हिन्दी, हिन्दी-व्याकरण और ब्रजभाषा को दे गये हैं, उतना तो बड़ी-बड़ी संस्थाएँ भी अपने दीर्घ कार्यकाल में नहीं दे पातीं।...

छह महीने बाद प्यारी-सी बेटी के साथ श्रीमतीजी मायके से लौट आयीं। ज्वालापुर की आबोहवा पिताजी को अनुकूल नहीं पड़ रही थी। सन् 80 के जाड़ों में वह पटना लौट गये। मैं दफ़्तर के कामों, घर-गृहस्थी की उलझनों और बिटिया के लाड़-प्यार से आबद्ध रहा और आचार्यश्री के एक और दर्शन-लाभ की बात बस सोचता ही रहा। बात आज-कल पर टलती रही।...
सन् 1981 में, जब मैं दिल्ली गया हुआ था, एक दिन अकस्मात् समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ कि आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का 83 वर्ष की आयु में निधन (12-8-1981) हो गया है और अमुक समय और स्थान पर उनकी अंत्येष्टि होगी। जब उनकी जरा-जर्जर काया की झुर्रियों और लकीरों को, रग-रेशों को अग्नि की लपलपाती जिह्वा मिटा रही थी, मैं अपने मालिकों के साथ मीटिंग में व्यस्त था। आचार्यश्री के पुनः दर्शन न कर पाने का क्षोभ मुझे सालता रहा। वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन ही अंतिम दर्शन सिद्ध हुआ।...
(समाप्त)
(चित्र : 1. प्रौढ़ावस्था के आचार्यश्री 2. मैं और मेरी ज्येष्ठ कन्या, उसी काल और परिसर की छवि, जहाँ आचार्यश्री पधारे थे।)

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन...

वह मेरी नयी नौकरी थी। वहाँ अकेले रहते हुए मुझे एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था। मरे पास ज्वालापुर (हरद्वार) आने के लिए जिस रात (8 अक्तूबर, 1979) पिताजी ने दिल्ली से ट्रेन पकड़ी, उसी रात लोकनायक जयप्रकाश नारायणजी के अवसान की मार्मिक सूचना उन्हें मिली थी। उनकी यात्रा की वह रात कष्टप्रद बीती। उनका मानसिक उद्वेलन चरम पर था। उस रात वह डोर टूटी थी, जिससे पिछली आधी शती से पिताजी जयप्रकाशजी से अविच्छन्न रूप से जुड़े-बँधे थे।...
हरद्वार स्टेशन पर मैं उपस्थित था, उन्हें घर ले आया। पिताजी क्लांत थे--शरीर से और मन से भी! जयप्रकाशजी का विछोह उनके लिए बड़ा आघात था। स्नान-ध्यान और भोजनोपरांत यथानियम वह दिवानिद्राभिभूत हुए। मैं अपने दफ़्तर चला आया, जो मेरे आवास से बस इतनी ही दूरी पर था कि दफ़्तर में बैठे-बैठे जब चाहूँ, तब घर का मुख्यद्वार देख लूँ। शाम पाँच बजे मैं घर आया तो मैंने देखा पिताजी कुछ लिख रहे हैं। मैंने पूछा--'चाय पी ली आपने?' उन्होंने कहा--'हाँ, शम्भु चाय पिला गये हैं। कह गये हैं कि अभी आता हूँ।' मैंने पुनः प्रश्न किया--'क्या लिख रहे हैं आप? आज तो आराम कर लेते!'
उन्होंने किंचित् क्षोभ के साथ कहा था--'जयप्रकाशजी की स्मृतियाँ विचलित कर रही हैं। उन्हीं के बारे में लिख रहा हूँ।' जब वह आलेख सम्पन्न हुआ, मैंने उसे पढ़ा। वह जयप्रकाशजी पर लिखा पिताजी का अत्यंत मार्मिक संस्मरण था--'एक और दधीचि : लोकनायक जयप्रकाश नारायण'। प्रायः एक महीने बाद वह संस्मरण 'कादम्बिनी' या 'नवनीत' में प्रकाशित हुआ था। संस्मरण के अंत में लेखक का तत्कालीन नया पता भी छपा था। रजिस्टर्ड डाक से हमें उसकी प्रति प्राप्त हुई थी। जयप्रकाशजी के अवसान की मर्मंतुद पीड़ा और अवसाद को पिताजी ने अपनी लेखनी-चंचु से मूर्त्त कर दिया था उस संस्मरण में।...
जहाँ तक याद है, उस आलेख के प्रकाशन के दस-पन्द्रह दिन बाद (नवम्बर 1979 के अंत में) की ही बात है। दिन के दस-ग्यारह बजे होंगे, मैं दफ़्तर की अपनी कुर्सी पर था और कंपनी की खता-बही के किसी नीरस अंकगणितीय दायित्व से निबट रहा था। अनुज यशोवर्धन बाजार चले गये थे और घर में सिर्फ पिताजी और छोटी बहन ही थीं। तभी ऑफिस ब्वाय ने मेरे कक्ष में प्रवेश किया और कहा--'साब! कोई बूढ़ा आदमी आपके घर की घण्टी बजा रहा है और कोई दरवज्जा खोल नहीं रहा। मैं देखूँ क्या साब?'
मैंने दफ़्तर के शीशों से घर की ओर देखा। एक वृद्ध सज्जन द्वार पर खड़े थे और काॅलबेल का स्विच दबा रहे थे। प्रथमद्रष्टया वह मुझे किसी याचक-से लगे। मैंने सेवक को कक्ष के द्वार पर रुकने का आदेश दिया और स्वयं घर की ओर क्षिप्रता से बढ़ा। जब आगंतुक के थोड़ा निकट जा पहुँचा तो मैंने गौर से देखा उन्हें। वयोवृद्ध सज्जन थे--आँखों पर कमानीदार चश्मा था, कोटर में धँसी किशमिशी हो गयीं आँखें थीं, बेतरतीब छोटे-घने केश थे, बड़ी-बड़ी मूँछें थीं, मटमैली धोती, आधी बाँहों की गाँधीगंजी और एक बंडी, जिसका एक भी बटन बंद नहीं था तथा एक हाथ में लट्ठ धारण किये हुए वे कोई प्राचीनकाल के अपरिचत वृद्ध पुरुष लग रहे थे।
ये तो अच्छा हुआ कि मैं जब उनके सन्निकट जा पहुँचा तो मैंने नम्रता से ही पूछा--'किनसे मिलना है आपको?' मेरे प्रश्न का उत्तर न देकर उन्होंने थोड़े रोषपूर्ण स्वर में कहा--'घर जब अंदर से बंद है तो कोई खोलता क्यों नहीं? मैं कब से घण्टी बजा रहा हूँ।'
मैंने पुनः पूछा--'आपको मिलना किनसे है?'
वृद्ध अपनी टेक छोड़ने को तैयार नहीं थे, तपाक से बोले--'भई, मुझे तो यही घर बताया था गेटमैन ने मैनेजर का। यही है न?'
मैं कुछ कहता, उसके पहले ही प्रभु की बड़ी कृपा हुई कि पिताजी ने द्वार खोल दिया। पिताजी को देखने से ही स्पष्ट था कि वह स्नानागार से बाहर आये थे, उनके केश भीगे और बिखरे हुए थे तथा एकमात्र गीला तौलिया उन्होंने कमर में लपेट रखा था। लेकिन जैसे ही पिताजी की दृष्टि आगंतुक वृद्ध सज्जन पर पड़ी, वह प्रायः चौंक पड़े। तेजी से आगे बढ़कर पिताजी उनके पाँव छूने को यह कहते हुए झुके--'अरे, आचार्यश्री आप? क्षमा करें, मैं स्नानगृह में था।...'
लेकिन आचार्यश्री ने पिताजी को अपने चरणों तक पहुँचने नहीं दिया। उन्होंने बीच में ही उनकी बाहें थाम लीं। पिताजी ने मुझसे कहा--'तुम देखते क्या हो? आचार्य किशोरीदास वाजपेयीजी हैं, चरण-स्पर्श करो।' आचार्यश्री के मुझे कभी दर्शन नहीं हुए थे, लेकिन उनके नाम-गौरव से मैं खूब परिचित था। श्रद्धापूर्वक मैंने उनके चरण छुए और अपनी पीठ पर एक धौल का औचक आशीष पाया। पिताजी ने कहा--'मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं आनन्दवर्धन!'
आदरपूर्वक हम उन्हें घर के अंदर ले चले। छोटा-सा आँगन पार करते हुए पिताजी ने आचार्यश्री से कहा--'आपने क्यों कष्ट किया? मैं जब दिल्ली से चला था, तभी मैंने योजना बना ली थी कि आपके दर्शन करूँगा। मैं तो स्वयं आता आपके पास।'
इतनी बात कहते-कहते पिताजी के साथ हम दोनों बारामदे में पहुँच गये थे। पिताजी की बात सुनते ही वाजपेयीजी वहीं ठिठक गये और बोले--'लेकिन, मेरी योजना तो आपके जयप्रकाशजी वाले संस्मरण ने ही बना दी, फिर मैं रुक न सका। आपका पता उसी में था। मैं अपनी योजना को पूरा करने आज ही चल पड़ा। अद्भुत लिखा है आपने। जयप्रकाशजी की स्मृतियों के साथ वह संपूर्ण कालखण्ड जीवित रहेगा इस संस्मरण में।' आचार्यश्री के श्रीमुख से अपने संस्मरण की प्रशंसा सुनकर पिताजी ने शिष्टतावश विनम्रता से कहा--'वाजपेयीजी, मैं अकिंचन सामान्य मसिजीवी...!'
पिताजी का वाक्य अभी पूरा भी न हुआ था कि आचार्यश्री के लट्ठ की एक भरपूर चोट भूमि पर हुई--'धम्म!' और, वह बोल पड़े--'जिस व्यक्ति का नाम मैं पिछले पचास वर्षों से जानता-पढ़ता रहा हूँ, वह भला अकिंचन, सामान्य मसिजीवी कैसे हो सकता है? आप ऐसा तो न कहिये...।'
आचार्यश्री की बात के बाद कोई कुछ कह भी क्या सकता था? वह पिताजी से बारह वर्ष बड़े थे, अधीतशास्त्र थे, विख्यात व्याकरणाचार्य थे और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा पूरी बीसवीं सदी की समस्त साहित्यिक गतिविधियों के साक्षी भी थे। परिणत वय में संयोगवश मुझे उनके दर्शन का एकमात्र सौभाग्य मिला था। जब पिताजी के कमरे में व्यवस्थित होकर वह बैठे गये और पिताजी से उनकी वार्ता मेरी पहुँच के बाहर के गंभीर विषयों का आस्वाद लेने लगी, तो मैं मौन साधकर ध्यान से आचार्यश्री की बातें सुनने और उनको देखने लगा। उनका चेहरा झुर्रियों और लकीरों का सघन वन था। दीर्घकाल के संघर्षमय जीवन और अनवरत साहित्य-साधना ने उनकी काया पर इतने निशान छोड़े थे कि कुछ न पूछिये, लेकिन विद्याविलासी आचार्यश्री की वाणी में 81 वर्ष की अवस्था में भी वही खनक थी, वैदुष्य की गहरी छाप थी, प्रखर वाग्मिता थी। अपनी स्थापनाओं के पक्ष में वह तब भी पूरी दृढ़ता से खड़े थे। अक्खड़ और ठेठ देशज व्यक्तित्व था उनका। पहली बार दूर से देखकर मैंने ही उन्हें एक याचक समझने की भूल की थी। सज्जनता-सरलता भी ऐसी कि उन्हें अपनी ही वेशभूषा और दीन दशा की सुधि नहीं थी। अचानक मेरी नज़र उनके पुराने चश्मे पर पड़ी। चश्मे की एक कमानी नदारद थी, जिसे उन्होंने एक डोरी से कान पर बाँध रखा था।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'दिनमान' का आवरण-चित्र : आचार्य किशोरीदास वापेयी.)

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

वो शोला था, जल बुझा...'(2)

(वो गुज़रा हुआ ज़माना...)

याद आता है कि पाँच-छह वर्ष बाद पिताजी, अज्ञेयजी के साथ मिलकर, जब पटना से मासिक 'आरती' का संपादन-प्रकाशन कर रहे थे, तब भी किसी अन्य देश से भेजा हुआ सत्यनारायणजी का एक लेख 'आरती' में छपा था, जिस पर अज्ञेयजी और पिताजी की अलग-अलग कोष्ठकों में टिप्पणियाँ थीं। वह द्वितीय विश्वयुद्ध का काल था। विश्व-परिदृश्य पर अज्ञेयजी की टिप्पणी थी और लेखक के व्यक्तित्व-कृतित्व पर पिताजी की। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका जब चरम पर पहुँची तो सत्यनारायणजी स्वदेश लौट आये थे और एक दिन आरती-कार्यालय (पटनासिटी) में पहुँचकर उन्होंने पिताजी को चकित कर दिया था। युद्ध की आग जब शांत हुई तो वह पुनः प्रवासी हुए।...
18 अगस्त 1945 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस जब हवाई जहाज के साथ विलुप्त हो गये और ऐसी अपुष्ट खबरें रेडियो-अखबारों में आने लगीं तो सत्यनारायणजी बहुत मर्माहत हुए। उनके लिए इन समाचारों पर विश्वास करना कठिन था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ऐसे रहस्यमय ढंग से गुम हो जाने से देश ही नहीं, पूरे विश्व में खलबली मची हुई थी। लेकिन सत्यनारायणजी के लिए मूक दर्शक बने रहना संभव नहीं था। वह उठ खड़े हुए इस संकल्प के साथ कि नेताजी के सत्य-सूत्र को खोजकर ही स्थिर होंगे। इस संकल्प-पूर्ति में उन्होंने अपने आपको झोंक दिया था। एक आग उनके अन्दर जल उठी थी। जाने किन प्रयत्नों से उन्होंने कई-कई देशों की यात्राएँ कीं, जंगलों-पहाड़ों की खाक छानी, जेल में डाले गये, यातनाएँ सहीं और अंततः फ्रांस पहुँचकर उन्होंने एक पुस्तक लिखी--'नेताजी इज़ वेरी मच एलाइव'।
पिताजी ने मुझे बताया था कि उन दिनों यह पुस्तक बहुत चर्चा में रही थी और हाथों-हाथ उसकी प्रतियाँ बिक गयी थीं। बाद में उसका अनुवाद फ्रेंच भाषा में भी हुआ था। जहाँ तक स्मरण है, पिताजी ने ही मुझसे कहा था कि एक बार किसी देश से पलायन के लिए वह एक को-पायलट को भ्रम में डालकर स्वयं उसके साथ हवाई जहाज ले उड़े थे। यह उनके पराक्रम की पराकाष्ठा थी।


सत्यनारायणजी जिन देशों में गये, वहाँ की भाषा जाने किस मनोयोग से उन्होंने सीख लीं। वह बहुभाषाविद् थे। अंगरेजी-हिन्दी तो पहले से ही उनकी आयत्त भाषाएँ थीं, विदेशों के प्रवास में उन्होंने जर्मन, फ्रेंच, रशियन भाषाएँ सीखीं और उन पर अधिकार प्राप्त किया।
जब देश स्वतंत्र हुआ तो सत्यनारायणजी स्वदेश लौटे। नेहरूजी ने उन्हें संसद में स्थान दिया। बहुत बाद में पटना के मारवाड़ी आवास गृह के स्वत्वाधिकारी श्रीविनोदकृष्ण कानोडियाजी ने मुझे बताया था कि जब ख्रुश्चोव-पुश्किन अपने शिष्टमण्डल के साथ भारत आये थे, तब नेहरूजी से उनकी वार्ता के बीच मध्यस्थता और दुभाषिये का दायित्व सत्यनारायणजी ने ही निभाया था।
1990-92 में सत्यनारायणजी पाँच-छह महीनों में दो-तीन बार पटना आये थे। वह जब भी आये, फ्रेजर रोड पर अवस्थित मारवाड़ी आवास गृह में ठहरे और उनकी दिन-भर की बैठक मेरे घर में पिताजी के पास लगती रही। एक दिन पिताजी ने मुझे उनके पास भेजा, कुछ आवश्यक प्रपत्र उन्हें सौंपने थे। मैं जब उनके कमरे में पहुँचा तो वह एक पुस्तक पढ़ने में तल्लीन थे। मुझे देखकर प्रसन्न हुए, बोले--'बैठो, तुम्हें एक महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाता हूँ।' और बिना किसी भूमिका के उन्होंने उसी पुस्तक से पाठ शुरू कर दिया। मेरी ओर देखे बिना वह धाराप्रवाह जो कुछ पढ़ते जा रहे थे, उसका एक अक्षर भी मेरी समझ से परे था। एक पृष्ठ के पाठ तक मैंने धैर्य बनाये रखा, अंततः मुझे बोलना पड़ा--'आप जो पढ़ रहे हैं, उसे मैं बिलकुल समझ नहीं पा रहा हूँ।'
मेरे हस्तक्षेप से उनका ध्यान भंग हुआ। चौंककर बोले--'ओह, तऽ काँहें ना कहलऽ जी? साँचे तऽ, ई कितबिया तऽ फ्रेंच में बा, तोहरा समझ में आइत कइसे?' (ओह, तो कहा क्यों नहीं जी? सच में, पुस्तक तो फ्रेंच में है, तुम्हें समझ में आती कैसे?)
उसके बाद उन्होंने वह पुस्तक मुझे दिखायी। वह फ्रेंच भाषा की पुस्तक थी, जिसमें किसी का उनपर लिखा एक लंबा आलेख उनके चित्र के साथ छपा था। उस पुस्तक को उलट-पलटकर मैंने देखा। उनके चित्र को पहचान लेने के अलावा और मेरी समझ में क्या आने वाला था? उन्हें पुस्तक लौटाते हुए मैंने कहा--'आपने इतनी सारी भाषाएँ कैसे सीख लीं?'
वह मुस्कुराये और बोले--'परिश्रम, मनोयोग और लगन से। कुछ भी सीखने की पक्की लगन होनी चाहिए।' इतना कहकर वह गंभीर हो गए और मेरे पितामह का स्मरण करते हुए बोले--'लेकिन तुम्हारे बाबा ने मुझसे ठीक ही कहा था। यह सच है, मैंने कई भाषाएँ सीखीं, लेकिन संस्कृत से दूरी बनी ही रह गयी, उसपर मैं अधिकार नहीं पा सका। शास्त्रीजी देव-तुल्य व्यक्ति थे। उन्होंने बहुत पहले ही मुझे आगाह किया था कि संस्कृत मेरे अधीन नहीं होगी। बाद में विदेशों में भ्रमण करते हुए मुझे इसका अवसर भी नहीं मिला। संस्कृत मेरे लिए दुःसाध्य और दुरूह ही बनी रह गयी।'
सत्यनारायणजी का मुझे वही अंतिम दर्शन मिला था। उसके एक-दो वर्ष बाद ही वह संसार के लिए दुर्लभ-दर्शन हो गये थे। उनका तेजस्वी जीवन पराक्रमपूर्ण था। वह शोलों की तरह जले, धधके, चमके और अपनी प्रभा बिखेरकर अंततः अस्तंगत हो गये। उनके निधन का समाचार भी सुर्खियाँ नहीं बना। संभवतः उन्हीं के एक-दो वर्ष बाद पिताजी भी लोकांतरित हुए थे।...
सत्यनारायणजी पर कुछ लिखने की उत्कंठा-लालसा बहुत थी, लेकिन तथ्यों का नितांत अभाव था। उनके चौथेपन में मिले तीन-चार दर्शनों और थोड़ी-सी बातचीत की पूँजी ही तो थी मेरे पास। शेष सब पिताजी से जानी-सुनी बातें थीं, यत्किंचित् पढ़े हुए तथ्य भी थे! इसी पर आधारित है यह संस्मरण, जिसमें काल-क्रम और तथ्यों के उलटफेर से मैं इनकार नहीं कर सकता। सोचता हूँ, उन्हें निकट से जाननेवाले कोई महानुभाव उनका जीवन-चरित लिखते तो आनेवाली पीढ़ियाँ उसे पढ़तीं और अनुप्राणित होतीं।...
अब तो नेताजी की गुमशुदगी पर इतना कुछ लिखा और कहा गया है तथा नेट पर इतनी अधिक सामग्री उपलब्ध है कि उसकी भीड़ में सत्यनारायणजी के लेख और उनकी पुस्तक को ढूंढ निकालना असंभव हो गया है। सत्यनारायणजी, जो नेताजी समकालीन तो थे ही, उसी काल में विदेशों में भ्रमणशील भी थे। उन्होंने नेताजी की तलाश में लंबी दौड़ भी लगायी थी। उनका आलेख अथवा उनकी पुस्तक अधिक प्रामाणिक सिद्ध होती। सच है, कँगूरे दीखते है, नींव की ईंटें नहीं दीखतीं। इतना ही कह सकता हूँ कि वह धुन का धनी एक दहकता हुआ शोला था, जो जल बुझा।...
(समाप्त)

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

'वो शोला था, जल बुझा...'

(वो गुज़रा हुआ ज़माना...)
[कभी-कभी बड़ा अजीब होता है न! बीस-पचीस वर्षों का वक्त गुजरता है और स्मृतियाँ इतनी धुँधली हो जाती हैं कि किसी की शक्ल याद आती है, बातें याद आती हैं, किसी अलबम के पन्नों-सी पलटती सम्मुख आती जाती हैं उसकी अनेक मुद्राएँ और चलचित्र-सा दमकने लगता है उसका पूरा व्यक्तित्व; लेकिन नहीं याद आता तो उसका नाम और मन विचलित हो उठता है। मेरे साथ ऐसा ही हुआ है इस प्रसंग में। मैंने अनेक प्रयत्न किये, पुराने कगज-पत्तर पलटे, कई-कई फोन किये, पूना में बैठे-बैठे कई लोगों को प्रेरित किया, पूछा; लेकिन सब व्यर्थ हुआ। पटना जाकर, स्वयं उत्खनन करके, 'बिजली' की पुरानी फाइल से, मैं खोज लाया हूँ उनका नाम--डाॅ. सत्यनारायण सिंह (सिन्हा); जिन पर मुझे लिखना था यह स्मृति-लेख। क्योंकि, नाम के बिना इस संस्मरण की राह खुलती भी तो कैसे?
(--आनन्दवर्धन.)]
स्वतंत्रता-सेनानी सत्यनारायण सिंह...
वह तो 'मुक्त-कुटीर' था। घर का मुख्य-द्वार सुबह एक बार जो खुल जाता तो देर रात तक खुला ही रहता। आगंतुक आते, बैठते, पिताजी मिलते, बातें करते, सुख पाते और लौट जाते। दोपहर का थोड़ा-सा वक़्त छोड़कर सारे दिन घर में हलचल बनी रहती और मेरी श्रीमतीजी चाय-जलपान के प्रबंधन में जुटी रहतीं।
यह 1990-92 की बात है। एक दिन सुबह के नौ बजे एक सज्जन बेधड़क उसी प्रवेश-द्वार से घर में प्रविष्ट हुए, जोरदार पुकार लगते हुए--"परफूल, घरवा में बाड़ऽ का हो? ए परफूल, केने बाड़ऽ हो?
'परफूल ?' पिताजी को 'प्रफुल्ल' कहकर पुकारनेवाले लोग तो दुनिया से जाने कब के कूच कर गये थे, फिर यह कौन सज्जन हैं जो इस तरह पिताजी को पुकार रहे हैं? मैं तेजी से द्वार की ओर बढ़ा, लेकिन आगंतुक तो प्रवेश करके अंदर आ चुके थे। पिताजी के हमउम्र थे और वैसे ही सुदर्शन भी--श्वेतकेशी, धवल धोती-कुरते और बंडी में सुशोभित! अपनी शक्ल पर प्रश्नचिह्न लिए मैंने कुछ पूछना चाहा, लेकिन इसका अवकाश उन्होंने मुझे नहीं दिया और यह पूछते हुए आगे बढ़ चले कि 'प्रफुल्ल कहाँ हैं भाई?'
अपने नाम की ऐसी पुकार सुनकर पिताजी भी सचेत हो गए थे। वह अपने आसान से उठकर खड़े हुए ही थे कि उनके कमरे के दरवाजे पर आगंतुक जा खड़े हुए। उन्होंने गर्मजोशी से पूछा--"का हो परफूल, चीन्हलऽ? हम सत्यनारायण !"
पिताजी पहचानने की चेष्टा में दो क्षण गौर से उन्हें देखते रहे, फिर हुलसकर गले जा मिले। मैंने देखी थी उन दोनों के मिलन की वह प्रसन्नता, उत्कट उछाह की वह विकलता! उन्हीं के बताने से इतना तो मैं जान ही चुका था कि वह बुजुर्ग कोई 'सत्यनारायणजी' हैं, लेकिन उनका इतिवृत्त कुछ ज्ञात नहीं था।
पिताजी के कक्ष में सत्यनारायणजी जो जमे तो सुबह से शाम हो गयी और वार्ता का अंत न हुआ। दोपहर का भोजन और शाम की चाय भी उसी कमरे में पहुँच गयी। रात आठ बजे सत्यनारायणजी यह कहकर घर से विदा हुए कि कल वह फिर आयेंगे। रात के भोजन के वक्त मैंने पिताजी से उनके बारे में जिज्ञासा की। उन्होंने थोड़े क्षोभ से कहा था--'सत्यनारायण तो बहुत तेजस्वी और पराक्रमी व्यक्ति रहे हैं, लेकिन लगता है, अब चुक रहे हैं और उनके मस्तिष्क में विचलन और चिंतन में विश्रृंखलन भी आने लगा है। वह सम्बद्ध-असम्बद्ध बातें बोलने लगे हैं और ये अच्छे लक्षण नहीं हैं।' इसके अतिरिक्त पिताजी ने जो कुछ बताया, उसे संक्षेप में कहूँ, तब भी कथा थोड़ी विस्तृत ही होगी। लेकिन यह कथा मुझे कहनी होगी, क्योंकि वह जितनी रोचक है, उतनी ही रोमांचकारी भी।...
सत्यनारायणजी पिताजी की किशोरावस्था के मित्र थे, लेकिन सत्तर वर्षों की दीर्घकालिक मित्रता के दौरान पाँच या छह बार ही वह पिताजी से मिले थे और रह-रहकर लंबे अंतराल के लिए अलभ्य हो जाते थे। वह पिताजी के समवयसी थे। उनका पूरा नाम था-- सत्यनारायण सिंह (सिन्हा)। बिहार के छपरा-सीवान के आसपास के रत्न थे। पहली बार मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में (सन् 1925) वह घर से विद्रोह करके इलाहाबाद, मेरे पितामह (साहित्याचार्य पं. चंद्रशेखर शास्त्री) के पास, संस्कृत-ज्ञान-लाभ की पिपासा लेकर आये थे। प्रायः एक महीने तक वह पिताजी के साथ ही रहे और पितामह को अपनी विद्या-बुद्धि से प्रभावित करने की हर संभव चेष्टा करते रहे। इन्हीं पचीस-अठाइस दिनों में उनकी पिताजी से ऐसी घनिष्ठता हुई जो आजीवन बनी रही।

मासांत होते-होते एक दिन पितामह ने सत्यनारायणजी को अपनी बैठक में बुलाया। पिताजी छाया की तरह उनके साथ ही थे। सत्यनारायणजी कौतूहल-जड़ित किशोर की तरह पितामह के सम्मुख करबद्ध आ खड़े हुए, जैसे कोई परीक्षा-फल घोषित होनेवाला हो। धीर-गम्भीर स्वरों में पितामह बोले--'सत्यनारायणजी! मैं अपनी बात स्पष्ट शब्दों में कहूँगा। संस्कृत देव-भाषा है। सबकी जिह्वा पर चढ़ती नहीं, मुख से कढ़ती नहीं। संस्कृत-ज्ञान-समुद्र में गहरे उतरने के योग्य नहीं है अभी आपकी जिह्वा। आप किसी दूसरी दिशा में बढ़ने का यत्न करें, यही उचित होगा।'
जिस आशा और उत्साह से सत्यनारायणजी पितामह के पास आये थे, उसे ठेस लगी थी। पितामह अपनी बात पूरी कर चुके थे, वहाँ खड़े रहने का कोई औचित्य नहीं था। क्योंकि पितामह अक्सर कहा करते थे--'रामो द्विर्नाविभासते'--राम दो बार नहीं बोलते। उनका रोबो-दाब भी ऐसा था कि किसी को उनसे आग्रह-दुराग्रह करने का साहस नहीं होता था। लेकिन जब सत्यनारायणजी वहीं स्थिर खड़े दिखे तो पितामह ने पूछा--'तब क्या विचार है, क्या करना चाहेंगे आप?'
सत्यनारायणजी ने दृढ़ता से उत्तर दिया--'मैं देश-सेवा के काम करना चाहूँगा।'
इतना कहकर सत्यनारायणजी पिताजी के साथ वहाँ से हट गये। रात बीती और सुबह हुई, लेकिन तब तक सत्यनारायणजी नदारद हो चुके थे। अनुमान किया गया कि वह मुँहअंधेरे उठकर कहीं चले गये थे। गये तो ऐसे गये कि वर्षों उनका कुछ पता नहीं चला। न कोई चिठ्ठी-पत्री, न संदेश, वह तो गायब ही हो गये!...
फिर बारह-तेरह साल बीत गए। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। पितामह लोकांतरित हुए, पिताजी इलाहाबाद छोड़ पटना आ बसे और उन्होंने वहाँ से साप्ताहिक पत्रिका 'बिजली' निकाली। पत्रिका चल निकली। प्रतिदिन ढेरों डाक आने लगी।
यह संभवतः 1937 की बात होगी। द्वितीय विश्वयुद्ध की सुन-गुन शुरू हो गयी थी। एक दिन पिताजी 'बिजली' की डाक छाँट रहे थे कि एक मोटे-से लिफाफे पर उनकी नज़र ठहर गयी। वह लिफाफा जर्मनी से भेजा गया था। उस पर 'बिजली'-कार्यालय का पूरा पता लिखा हुआ था। पिताजी को आतुर जिज्ञासा हुई कि ये कौन सज्जन हैं जिन्होंने जर्मनी से पत्र भेजा है, वह भी इतना भारी-भरकम! उन्होंने शीघ्रता से लिफ़ाफ़ा खोला और यह देखकर चकित रह गये कि पत्र-प्रेषक और कोई नहीं, वर्षों के बिछड़े बंधु सत्यनारायण थे। पिताजी को परम आश्चर्य हुआ कि वह जर्मनी कैसे जा पहुँचे? युद्ध की विभीषिका के कई चित्रों के साथ सत्यनारायणजी का लंबा आलेख ('भयंकर बमवर्षा के बीच') संलग्न था। यह आलेख अबिसीनिया पर भीषण बमवर्षा का भयावह चित्र प्रस्तुत करता था। पिताजी ने चित्र-सहित वह आलेख 'बिजली' में यथावत् प्रकाशित किया था।
इसके बाद पाँच-छह वर्षों के लिए सत्यनारायणजी फिर गायब हो गये। उनका कुछ पता न चला।...
सत्यनारायणजी का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए एक आलेख में पिताजी ने लिखा है--"मेरे एक मित्र हैं। उनसे मेरी मित्रता लगभग 65 वर्ष पुरानी है। यद्यपि इस लंबी अवधि में केवल चार बार उनसे मेरा मिलना हुआ था, लेकिन मित्रता आरंभ में ही इतनी घनिष्ठ हो गयी थी कि समय के अंतराल का मुझे कभी अनुभव नहीं हुआ। पहले-पहल जब इलाहाबाद में वह हमारे यहाँ आये थे तो एक महीने तक हमारे यहाँ ठहरे थे।"...
(क्रमशः में, क्रमशः)
[चित्र : बिजली में प्रकाशित उस आलेख की क्लिपिंग और युवावस्था के सत्यनारायणजी, जिन्हें मैंने वृद्धावस्था में देखा था]