मंगलवार, 21 जनवरी 2014

सहमे ज़माने रह गए...

"रूह एक फ़ना हुई, उसके फ़साने रह गए,
पत्थरों की नोंक पर ही अब निशाने रह गए!

हम हुए बेदार बेहद, उनकी बला ठहरी रही,
अब तो ग़ैरत को मसलने के बहाने रह गए !

कैसे कहें अच्छा हुआ, या हुआ बेहद बुरा,
हमनशीनों के न अब ठौर-ओ-ठिकाने रह गए !

एक क़तरा आँख से था, जब टपकना चाहता,
ठहर जा कम्बख़त, तुझे किस्से सुनाने रह गए!

मौत से भी क्या भली कोई शै होती है जनाब,
ख़ाक हुए सब मसलहे, किस्से पुराने रह गए !

अब मोहब्ब्त की ज़मीं पर ये सफ़र मुश्किल हुआ,
मौसमों की मार के सहमे ज़माने रह गए !!

रविवार, 12 जनवरी 2014

वशिष्ठ की वापसी : हमारी विक्षिप्तता...

[मित्रवर सुधांशु शेखर त्रिवेदीजी के आग्रह पर मेरे पूज्य पिताजी (पं. प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त') का यह आलेख, जो १७ फरवरी १९९३ को नवभारत टाइम्स, पटना में छापा था और उनकी अप्रकाशित पुस्तक 'सिर धुनि गिरा लागि पछितानी..' में संग्रहीत है, उनके लिए और अन्य पाठकों के लिए भी, ब्लॉग पर रख रहा हूँ. आलेख किंचित बड़ा है, थोड़ा धैर्य धारण कर कृपया इसे पढने का कष्ट करें--आनंद.]


वशिष्ठ की वापसी : हमारी विक्षिप्तता...

अभी उस दिन मैंने अखबार में पढ़ा कि पांच वर्षों की गुमनामी के बाद वशिष्ठ बड़े नाटकीय ढंग से अपने घर पहुँच गए हैं. पांच बरस पहले, विक्षिप्तता में,  उन्हें इलाज़ के लिए पटना से पूना ले जाया जा रहा था. रस्ते में, रात के सन्नाटे में, एकाएक वह खंडवा में गाड़ी से उतर गए थे. साथ जा रहे भाई की जब नींद खुली, तो वशिष्ठ का कोई आता-पता नहीं था. उनकी खोज-ढूंढ का कोई नतीजा नहीं निकला.
किसी सामान्य व्यक्ति के लिए यह कल्पना भी अत्यंत कठिन है कि बदन पर पड़े एक धोती-कुर्ते के साथ उसने ये पांच बरस कैसे बिताये होंगे. वह तो अपने आपे में नहीं था. उसे पता नहीं था कि वह कहाँ, किन लोगों के बीच है और क्यों है? उसके रहने का कोई ठिकाना नहीं था, खाने का कोई साधन नहीं था, पहनने के लिए दूसरा कपड़ा नहीं था. परिवेश अजाना था, भाषा अपरिचित थी, लोग पराये थे. कैसे गुज़ारे होंगे उसने ये पाँच साल? कैसे जिया होगा? कैसे?
क्या वह इन पांच वर्षों तक नगर-नगर, डगर-डगर, निरुद्देश्य सड़कें नापता रहा होगा? क्या उमस भरी गर्मी की रातें  उसने किसी दूकान के पटरे पर, सड़क के किनारे या किसी खाली घर के बारामदे पर गुज़ारी होंगी? क्या वह बरसातों में किसी घर के पिछवाड़े या कोने-अंतरे में पड़ा रहा होगा या आसमान के नीचे खड़ा भीगता रहा होगा? और उसकी जाड़े की रातें कैसे बीती होंगी? क्या बर्फ-सी ठंडी ज़मीन पर गुड़ी-मुड़ी होकर उसने शीत-लहरियां झेली होंगी? क्या हवा के तेज झकोरे उसके अंजर-पंजर को बरछे की नॉक की तरह बेधते रहे होंगे? क्या किसी दयावान ने उसके शरीर पर कभी फटा कम्बल या टाट-बोरा डाल दिया होगा और सबेरे उन्हें झाड़कर वह आगे बढ़ चला होगा? कैसे जिया होगा वह इतने दिन?
लेकिन कौन है यह वशिष्ठ? क्यों उसका उल्लेख जरूरी है? काल के प्रचंड प्रवाह में क्यों मैं किसी मतवाली लहर पर उसका नाम दर्ज़ करना चाहता हूँ? आखिर कौन है यह वशिष्ठ? किसका नाम है वशिष्ठ?
वशिष्ठ नाम है भारत की ऊर्जा का. यह नाम है भारतीय मेधा के चरम विकास का. यह नाम है भारतीय प्रतिभा के नवोन्मेषशाली प्रचंड प्रकाश का, जिसने कुछ ही समय पहले गणितीय ज्ञान की चमक से संसार को स्तब्ध और विस्मित कर दिया था. संसार-भर के शिखर वैज्ञानिकों ने कहा था--"यह तो मनुष्य नहीं, चमत्कार है. इतना बड़ा गणितज्ञ, इनता बड़ा वैज्ञानिक, न तो पहले कभी हुआ था, न आगे कभी होगा."
हाँ, वशिष्ठ वैसा ही था. अगर हमने उसे पहचाना होता, अगर हमने उसका समुचित सम्मान किया होता, अनुकूल और स्वछन्द वातावरण दिया होता तो आज उसके नाम से दुनिया में भारत की पहचान होती, जैसे गांधी और टैगोर के नाम से होती है. लेकिन भारत की स्वतन्त्रता के बाद हमारे देश में एक ऐसी हाहाकारी बुभुक्षा ने जन्म लिया, भ्रष्टाचार की ऐसी सर्वनाशी संस्कृति का भीषण विकास हुआ कि जिसे भी अवसर मिला, सुविधा मिली, वह अपनी गोटी लाल करने के प्रयास में देश को, समाज को, व्यक्ति को--सबकुछ को भूलकर सर्वथा आत्ममभर बन गया. ईश्वर ने वशिष्ठ के रूप में भारत को जो अनमोल खज़ाना दिया था, कभी न ख़त्म होनेवाली जो पूँजी दी थी, उसे किसी ने नहीं पहचाना. उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया. नतीजा क्या हुआ? पाँच बरसों के बाद वह छपरा (बिहार) के डोरीगंज मुहल्ले में भीख मांगकर पेट पालता कई दिनों से पड़ा था. उसे कुछ लोगों ने पहचाना. उसे उसके गाँव, भोजपुर के वसंतपुर में, उसके परिवारवालों के पास पहुंचा दिया. अब वह वहीँ अपनी बिसरी ज़िन्दगी की याद में घुटता-छटपटाता अपने दिन बिता रहा है.
किसी ज़माने में विश्वबंधुत्व का, भाईचारे का, सह-अस्तित्व का, सत्य, अहिंसा और प्रेम का प्रचार-पसार करनेवाले हमारे देश में आज आग लगी हुई है. रोज दिन देश में हत्याएं होती हैं, नर-संहार होता है, हादसे होते हैं और मरनेवाले परिवार को नगद मुआवजे दिए जाते हैं. तूफ़ान आते हैं, बाढ़ आती हैं, सूखा पड़ता हैं, लोगों को  मुआवजे दिए जाते हैं--यह बात और हैं कि उसमें से कितनी राशि जरूरतमंदों तक पहुंचती हैं और कितनी उसको बांटनेवालों की तिजोरी में गायब हो जाती हैं.
देश की माली हालत यह है कि हम भिक्षा-पात्र लेकर विदेशों में जाते हैं और भिक्षा अथवा कर्ज के रूप में अरबों-खरबों की राशि हासिल करके राष्ट्र-निर्माण करते हैं. हम कर्ज का सूद चुकाने के लिए फिर कर्ज लेते हैं और बची हुई राशि से फिर राष्ट्र-निर्माण करते हैं.  राष्ट्र-निर्माण कैसे होता हैं? आये दिन देश भर में खेलों का आयोजन होता हैं, घुड़दौड़ होती है, सट्टा खेला जाता है, रैलियां और उनके जवाब में फिर रैलियां होती हैं. अरबों-खरबों का वारा-न्यारा होता है. राष्ट्र-निर्माण परवान चढ़ता है.
देश के विकास के लिए, देश को समृद्ध और समुन्नत देशों  की बराबरी पर पहुंचाने के लिए देश भर में दूरदर्शन और आकाशवाणी के केंद्र खोले जा रहे हैं, घर-घर में टी.वी. और रेडियो सेट पहुंचाए जा रहे हैं, गाँव-गाँव में बिजली के खम्भे, नल या नलकूप लगाए-बनाये जा रहे हैं, सिंचाई का इंतजाम हो रहा है, देश की जरूरत के मुताबिक बिजली के उत्पादन की जी-तोड़ कोशिशें हो रही हैं. जान-सुनकर छाती दो गज चौड़ी हो जाती है. हमारे राष्ट्र का निर्माण कैसा अद्भुत है, हमारा देश कैसे विस्मयकारी रूप से विकास कर रहा है.
खम्भे गड़े हैं, उनसे रौशनी नहीं होती. नल और नलकूप बने हुए हैं, बिजली के अभाव में उनसे पानी की एक बूँद नहीं टपकती. रेडियो और टी.वी. सेटों से घर-घर शोभायमान है, लेकिन आवाज़ उनसे कभी-कदाचित ही आती है, वह भी परम सौभाग्यशाली बड़े नगरों और प्रादेशिक राजधानियों में ही. राष्ट्र-निर्माण की ऐसी धूमधाम और देश के ऐसे त्वरित विकास की आपाधापी में वशिष्ठ की याद किसे आ सकती है? वह है किस खेत की मूली?
इसी शती के उत्तरार्द्ध में एक दिन उस परम शक्ति ने अपने आशीर्वाद से अभिषिक्त करके एक तेजस्वी बालक को बिहार की धरती पर, आधुनिक भोजपुर के वसंतपुर ग्राम में, एक निर्धन किसान के घर अवतरित किया. स्मरणीय है कि वशिष्ठ भगवान् राम के गुरु थे. ओट में छिपी नियति के द्वारा यह नाम उसे अकारण नहीं दिया गया था. हमारा अतीत साक्षी है कि युगों से इस देश का इतिहास बिहार ने ही बनाया है. ईश्वर ने किसी विशेष अभिप्राय से ही वशिष्ठ को बिहार में ही जन्म दिया था.
वशिष्ठ के पिता कलकत्ता में पुलिस के सामान्य सिपाही थे, लेकिन बेटा उनके घर असामान्य प्रतिभा लेकर उत्पन्न हुआ था. उस प्रतिभा ने ही उसे नेतरहाट में शिक्षा प्राप्त करने का सुयोग दिया. मैट्रिक में सर्वप्रथम आकर उसने सबको चकित कर दिया. फिर पटना के साइंस कॉलेज का द्वार उसके लिए अनायास ही खुल गया.
जब पहली बार वशिष्ठ आई.एस-सी. की कक्षा में बैठा, तो अध्यापक ने उसे देहाती-गंवार समझकर कक्षा से बाहर जाने को कहा. लेकिन उसकी मेधा के चमत्कार ने पासा पलट दिया. वशिष्ठ ने इण्टर की पढाई के दौरान ही स्नातकोत्तर परीक्षा के सभी प्रश्न-पत्रों को हल करके विश्वविद्यालय के इतिहास में क्रांति कर दी. इण्टर के बाद उन्हें सीधे एम.एस-सी. की डिग्री दे दी गयी. ऐसा कभी नहीं हुआ था.
फिर वह अमेरिका पहुंचे. वहाँ भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का अलौकिक चमत्कार दिखलाया. उन्होंने पी.एच-डी. किया; डी.लिट. की उपाधि ली और उसी विश्वविद्यालय में वह अध्यापन करने लगे. उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें 'वशिष्ठाज़ थ्योरी ऑफ़ रेलेटिविटी' को संसार के वैज्ञानिकों द्वारा अभूतपूर्व सम्मान मिला. उस ग्रन्थ को सापेक्षवाद के मानक ग्रन्थ के रूप में सर्वस्वीकृति मिली. वशिष्ठ ने आइंस्टीन के काम को आगे बढ़ाया था. उनकी स्थापनाएं और तर्क अकाट्य थे.
इसी समय वशिष्ठ की निजी ज़िन्दगी को एक गहरा झटका लगा. उनके विभागाध्यक्ष ने प्रस्ताव किया कि वह उनकी एकमात्र कन्या से विवाह कर लें और अमेरिका की नागरिकता लेकर यहीं बस जाएँ. गँवई-गाँव की मानसिकतावाला बेचारा वशिष्ठ! इस प्रस्ताव ने उसे त्रस्त कर दिया. उसे अपना गाँव याद आया, अपने माँ-बाप याद आये, अपना देश याद आया. मेम बहू की कल्पना से ही वह थर्रा उठा. विनम्रतापूर्वक उसने वह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. फिर अमेरिका में टिके रहना उसके लिए कठिन हो गया. वह अपने देश लौट आया.
अपने देश में भी वह जहां काम करने गया, उसे उपेक्षा मिली, तिरस्कार मिला, नीचा दिखने की कोशिश की गई. उसकी मेधा और प्रतिभा ही उसकी दुश्मन बन गई. उसका मन भटकने लगा. वह नौकरी छोड़कर लौट आया.
इस बीच छपरा जिले के एक डॉक्टर की कन्या से उसका विवाह हो गया था, लेकिन जिसने पहले ही गणित से परिणय कर लिया हो, हाड-मांस की पत्नी से उसकी पटरी नहीं बैठी. असंतुष्ट पत्नी उसको छोड़कर हमेशा के लिए मायके चली गई. वशिष्ठ का मानसिक संतुलन बिगड़ता गया.
मैं वैज्ञानिक नहीं हूँ. डॉक्टर भी नहीं हूँ. एक सामान्य लेखक हूँ. फिर भी मैं मानता हूँ कि विक्षिप्त डॉक्टर वशिष्ठ नहीं हैं, उनके देशवासी हम सब लोग हैं, जो उन्हें विक्षिप्त मानते हैं और उन्हें वैसा ही बना रहने देना चाहते हैं. उनके लिए कुछ करना नहीं चाहते. डॉक्टर वशिष्ठ विक्षिप्त नहीं हैं. उनका मन सो गया है. अवचेतन में चला गया है. उसे जगाने की जरूरत है. उसे जगाने का प्रयास करना हमारा प्रथम और आवश्यक कर्त्तव्य है. हमें अपने उस कर्त्तव्य का पालन करने में सावधान होना चाहिए.
जिस देश में अनर्थक कामों में अरबों-खरबों की राशि खर्च की जा रही हो, उस देश को ईश्वर की धरोहर को, इस अक्षय पूंजी को बचाने के लिए दस-बीस लाख या दस-बीस करोड़ भी खर्च करने पड़ें, तो वह तत्काल खर्च करके यह सार्थक काम समय रहते कर लेना चाहिए. डॉक्टर वशिष्ठ के मन को जगाने का काम वशिष्ठ की रक्षा का प्रश्न नहीं है, यह भारत की तेजस्विता की, मेधा की और गरिमा की रक्षा का प्रश्न है. हमारे देश के कर्णधारों का मन जागेगा, तभी वशिष्ठ के मन को जगाने का प्रयास किया जा सकेगा. अपने ही हित के लिए यह प्रयास अवश्य और अविलम्ब किया जाना चाहिए.
वशिष्ठ जागेगा तो हमारा देश भी जाग उठेगा. उसके ज्ञान और प्रतिभा का प्रकाश युगों तक भारत को तेजस्वी और भास्वर बनाये रखेगा. उसके कृतित्व से विश्व-सभा में भारत को सदा सम्मानित स्थान मिलेगा. मैं आशा करता हूँ कि हमारे देश के कर्णधार वशिष्ठ को जगाने से नहीं चूकेंगे--उन्हें चूकना भी नहीं चाहिए!

रविवार, 5 जनवरी 2014

नए वर्ष का अभिनन्दन है...!


मन की मोहक चिड़िया बोली,
नया साल आया है,
उठो, लिखो कुछ आज,
कोई ख़याल नया आया है?
मैं बोला उस चिड़िया से,
तू नाहक चीं-चीं करती है,
बहुत सबेरे मुझे जगाकर
माथापच्ची करती है !
वर्षों का क्या करूँ मोल मैं,
जीवन-क्षण बीत रहा है,
अंतर का जो सहज भाव था,
प्रतिक्षण रीत रहा है !
बस, सम्बल है एक भाव का,
अन्तस्तल निष्कलुष रहे,
मलिन वसन हो तन पर लेकिन,
घट-नाद निष्कलुष रहे!
मैंने देखा, यह सुनकर
चिड़िया पलकें झपकाती है,
अपने पंख खोलकर वह,
मन-आँगन में उड़ती जाती है!
विगत वर्ष का शोक क्या करूँ,
नए वर्ष का अभिनन्दन !
अभिवादन है आप सबों का,
सबका करता मैं वंदन!!
--आनंदवर्धन ओझा.
[नव-वर्ष प्रभात पर रचित पंक्तियाँ, १ जनवरी, २०१४]

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

याद आते हैं गंगा चाचा...

[समापन क़िस्त]

कभी गंगा चाचा घर आते और पिताजी से कहते--"मैं तुम्हारे लिए सिर्फ पंद्रह मिनट का वक़्त निकालकर किसी तरह भाग आया हूँ। तुम कुछ नहीं कहोगे, मैं जल्दी से अपनी बात कह लूँ तो चलूँ।" लेकिन जब वह बैठ जाते और बातें शुरू हो जातीं तो दो-ढाई घंटे कैसे बीत जाते, पता ही नहीं चलता। घड़ी पर नज़र पड़ते ही वह घबरा कर उठ खड़े होते और यह कहते हुए चल देते--"तुमने आज मेरा बहुत नुक्सान कर दिया 'मुक्त'! अब चलता हूँ, फिर मिलते है।"

मद्रास में दिनकरजी के निधन के वक़्त और आपातकाल की घोषणा के बाद जयप्रकाशजी की गिरफ्तारी के समय दिल्ली के गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में गंगा चाचा उपस्थित थे। उन्हीं से इन दोनों कठिन अवसरों का विस्तृत विवरण पिताजी को मिला था--दिनकरजी के महाप्रयाण की व्यापक चर्चा से पिताजी शोकाकुल हो उठे थे। गंगा चाचा से ही यह सुनकर पिताजी विस्मित-हतप्रभ हुए थे कि जेल जाने से पहले जयप्रकाशजी ने इंडियन एक्सप्रेस के स्वत्वाधिकारी रामनाथ गोयनकाजी को अलग ले जाकर पिताजी का ख़याल रखने का उनसे अनुरोध किया था। गंगा चाचा का मित्र-मंडल बहुत बड़ा और श्रेष्ठ-सिद्ध लोगों से भरा था. वह देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बहुत निकट थे. देश के तत्कालीन राजनेताओं, वरेण्य साहित्यकारों और विद्वद्जनों की पूरी जमात में उनकी गहरी पैठ थी और सर्वत्र उनका समादर होता था।

एक बार पिताजी ने गंगा चाचा से कहा था--"तुम्हारे पास अनुभवों और अनमोल संस्मरणों का खज़ाना है, भाषा पर तुम्हारा पूरा अधिकार है। अब भाग-दौड़ भी तुम्हारे वश की बात नहीं रही। एक जगह जमकर बैठो और उन संस्मरणों-अनुभवों को लिख डालो। मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि तुम्हारा वह लेखन साहित्य की अमूल्य निधि और समय का जीवित इतिहास सिद्ध होगा।" पिताजी की बात सुनकर गंगा चाचा मुस्कुराये थे और उन्होंने कहा था--"मुक्त, सचमुच चाहता हूँ, कुछ लिखूं। जानता हूँ, लिखने लायक बातें मेरे पास हैं; लेकिन इस यायावरी, इस भाग-दौड़ से मुक्ति नहीं मिलती। लगता है, इस जीवन में अब मिलेगी भी नहीं। फिर, समय की पूंजी भी कितनी बची है मेरे पास....?"

सचमुच, समय की पूंजी तो धीरे-धीरे ख़त्म ही हो गई, जब ८३ वर्ष की अवस्था में सन १९८८ में गंगा चाचा ने जीवन-जगत से मुक्ति पाई। मैं पिताजी को लेकर राजेंद्र नगर (पटना) वाले आवास पर गया था। गंगा चाचा निर्विकार भाव से चिरनिद्रा में सोये थे, किन्तु उनके मुख-मंडल पर एक सहज स्मित परिलक्षित कर मैं स्तंभित रह गया था। एक समर्पित जीवन में वह जितना कुछ हिंदी के उन्नयन के लिए और देश की राजनीति के लिए भी कर गए हैं, आज की दुनिया का आदमी तो उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन सच है कि अनुभवों का, संस्मरणों का और प्रखर चिंतन का विशाल भण्डार भी उन्हीं के साथ चला गया था। वह उसे लिपिबद्ध नहीं कर सके थे।

गंगा चाचा के निधन पर पिताजी ने बहुत विह्वल होकर कहा था--"गंगा भाई शारीरिक रूप से बहुत पीड़ा में थे, मुझसे चार-पांच साल बड़े भी थे; उनका चला जाना उनके लिए चाहे जितना अच्छा रहा हो, लेकिन उनका विछोह मुझे निरीह और कातर बना गया है। एक वही मेरे दुःख-सुख के साथी बचे थे, आज वह भी साथ छोड़ गए... !" पिताजी की पैंसठ साल पुरानी मित्रता की मज़बूत डोर उस दिन टूट गई थी। उनकी इस पीड़ा का मैं साक्षी रहा हूँ।
मेरे मन-प्राण में बसनेवाले गंगा चाचा मुझे आज भी रह-रहकर याद आते हैं...!
{समाप्त}
{चित्र में : बाएं मेरे पिता मुक्तजी और दायें बाबू गंगाशरण सिंहजी}

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

याद आते हैं गंगा चाचा...

[तीसरी कड़ी]

सच है, गंगा चाचा आजीवन हिंदी-प्रेम को अपनी आत्मा में बसाये रहे। फ़ोन की घण्टी  बजते ही वह उसे उठाते और 'जी', 'जी हाँ', 'हाँ कहिये', 'मैं गंगाशरण बोल रहा हूँ, कहा जाए' आदि से वार्तारंभ करते। उनके उपर्युक्त कथन से प्रभावित होकर मैंने भी यह प्रयोग कुछ समय तक किया था; लेकिन बाद में मैं उसे निभा न सका था, इसका मुझे खेद है। मुझे लगता है कि सेठ गोविन्द दास और राजर्षि टण्डन के बाद गंगा चाचा ही हिंदी के ऐसे हिमायती थे, जिन्होंने हिंदी-सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र ध्येय बना लिया था। वह अप्रतिम हिंदी-सेवा-व्रती थे। उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिदी के प्रचार-प्रसार का बहुत काम किया था। मुझे लगता है कि वह शताधिक हिन्दीसेवी संस्थानों से अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे। निरंतर गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करके वह लगातार देशव्यापी यात्राएँ किया करते थे। आयोजनों, व्याख्यानों, अभिभाषणों,मंत्रणाओं और बैठकों के दौर से उन्हें जीवन-भर मुक्ति नहीं मिली। मुझे याद है, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के एक आयोजन में वह सम्मिलित हुए थे, जिसमें 'संस्मरण सत्र' की अध्यक्षता करने के लिए पिताजी भी पटना से दिल्ली गए थे। सभा-भवन में गंगा चाचा की तबीयत बिगड़ गई थी और वह मूर्च्छित हो गए थे। जब उनकी हालत थोड़ी सँभली तो पिताजी ने उन्हें समझाया था और थोड़ी तुर्शी से कहा भी था--"तुम क्या समझते हो, तुम न रहोगे तो क्या ये आयोजन ठप पड़  जायेंगे ? जब तबीयत इतनी नासाज़ थी, तो तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।" पिताजी की नाराज़गी देखकर गंगा चाचा निरीह भाव से बोले थे--"तब तो सारा झगड़ा ही ख़त्म हो जायेगा। लोग इतने प्यार से बुलाते हैं कि इनकार  करते नहीं बनता। बोलो,क्या करूँ?" सच है कि गंगा चाचा अंतिम समय तक शारीरिक व्याधियों-पीड़ाओं की  परवाह किये बिना हिंदी और हिन्दीसेवी संस्थानों के उत्थान के लिए प्राणपण से जुटे  रहे।

४  अप्रैल १९८७ का एक वाकया याद आता है। उस दिन अचानक गंगा चाचा मेरे घर आ पहुंचे थे। वाहन से उतरकर दस-पंद्रह कदम चलना भी उनके लिए दुष्कर था। बड़ी कठिनाई से वह पिताजी के पास पहुँच सके थे। उन्होंने अपने शरीर को एक लौह-शिकंजे से जकड़ रखा था, सोफे पर बैठते हुए उनका एक पाँव भी सहजता से मुड़ता नहीं था। उसे लंबवत उन्होंने ज़मीन पर टिका दिया था. उठाने-बैठने में उन्हें असह्य पीड़ा होती थी, लेकिन जाने किस योग-बल से चहरे पर उसका प्रभाव वह आने न देते थे। वह उसी शाम अपने साथ पिताजी से लखीसराय के बालिका विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में मुख्य-अतिथि के रूप में सम्मिलित होने का आग्रह करने आये थे। पिताजी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। उन्होंने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए क्षमा-याचना की। पल भर को गंगा चाचा पिताजी को देखते रहे, फिर बोले--"तुमसे सौ गुना ज्यादा मैं तकलीफ में हूँ और अनेक व्याधियों से जूझ रहा हूँ। मैं मानता हूँ कि इस दशा में यदि मैं इस उत्सव में शरीक हो सकता हूँ तो तुम भी सम्मिलित हो सकते हो।" इसके बाद उन्होंने अपनी व्याधियों और शारीरिक दशा का जो वर्णन किया, वह सचमुच मर्म-विद्ध करनेवाला था। उनकी रीढ़ की हड्डी में एक दोष हो गया था, जिससे रक्त-प्रवाह में अवरोध उत्पन्न होता था और उन्हें चक्कर आते थे। इसी वजह से वह लोहे का एक बेल्ट कमर पर बांधते थे। बेल्ट बांधने में उनकी हड्डियां तड़कती थीं और वह पीड़ा से तड़प उठते थे। गठिया ने उनके पाँव को जकड़ लिया था और पाँव मोड़ पाना भी उनके लिए असम्भव हो गया था। बहरहाल, पिताजी उसी दिन गंगा चाचा के साथ लखीसराय गए थे और वहीं उन्हें और गंगा चाचा को आकाशवाणी से यह दुःखद समाचार मिला था कि हिंदी के वरेण्य साहित्यकार महाकवि अज्ञेय नहीं रहे। लखीसराय का समारोह संपन्न कर पिताजी पटना लौट आये थे, किन्तु अज्ञेयजी के विछोह से बहुत विकल और अवसन्न-मन थे।

गंगा चाचा अपनी शारीरिक अक्षमताओं और असह्य पीड़ा की अनदेखी कर निरंतर यात्राएं करते रहे, किन्तु उनके श्रीमुख पर हमेशा एक सहज मुस्कान खेलती रही। वह विनोदी वृत्ति के थे, बातें खूब रस लेकर करते थे और बातों-बातों में अपने अनुभवों, संस्मरणों और शेरो-शायरी की ऐसी छौंक लगाते कि सुननेवाला मुग्ध भाव से सुनता ही जाता। उनके मुख से कथा-सरित-सागर ही छलकता जाता था। मेरे पिताजी भी इसी कोटि के रस-सिद्ध साहित्यकार थे, दोनों मित्र जब मिलते, समय को पंख लग जाता। एक बार गंगा चाचा पिताजी और दिनकरजी को अपने साथ देवघर ले गए थे। रात की गाडी से जाना था। वह पूरी रात का सफ़र नहीं था। मध्य-रात्रि में ही देवघर स्टेशन पर उतरना था। तीनों मित्रों ने तय किया कि ट्रेन में सवार होते ही थोड़ा विश्राम कर लिया जाएगा और एक नींद ले ली जायेगी, ताकि मध्य-रात्रि में जब ट्रेन से उतरना पड़े तो सभी तरोताज़ा रहें। उस यात्रा से लौटकर पिताजी ने बताया था कि ट्रेन में सवार होते ही बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह देवघर तक अनवरत चलता रहा और तीनों मित्र मुखर वक्ता बने रहे तथा ठहाकों का दौर चलता रहा।
{क्रमशः}

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

याद आते हैं गंगा चाचा...

 [दूसरी कड़ी]

गंगा चाचा मस्तमौला मन के प्रसन्नचित्त व्यक्ति थे। सबसे खुले ह्रदय से मिलते थे।  सन १९७२ में जब मैं पहली बार पिताजी और बड़ी बहन के साथ दिल्ली गया था, तब गंगा चाचा राज्यसभा के सदस्य थे और वेस्टर्न कोर्ट में सांसदों के एक फ्लैट में उनका निवास था। पिताजी ने उन्हें फ़ोन किया और मिलने कि इच्छा ज़ाहिर की। उन्होंने कहा कि "तुम दोनों बच्चों को भी साथ ले आओ। मेरे पास सुबह का ही वक़्त है, फिर तो संसद जाना है। बच्चे अगर संसद-दर्शन करना चाहेंगे, तो उन्हें भी साथ ले चलूँगा।" हमें बिन माँगे  ही मन की मुराद मिल गई थी। दूसरे दिन सुबह-सुबह हम दोनों पिताजी के साथ वेस्टर्न कोर्ट पहुंचे। गंगा चाचा पिताजी से मिलकर प्रफुल्लित हो उठते थे, उनके साथ हमें देखकर उस दिन वह बहुत प्रसन्न हुए थे और छोटे बच्चों-जैसा व्यवहार हमारे साथ कर थे, जबकि बड़ी दीदी एम० ए० की छात्रा थीं और मैं स्नातक का विद्यार्थी था। उनका यह वत्सल स्वरूप  देखकर हम बड़े खुश थे। हमारे एक-एक प्रश्न का वह विस्तृत उत्तर देते। बातें बहुत बारीकी से हमें समझाते। उनकी बातों में कई कथाएँ, उद्धरण, शेरो-शायरियाँ आ जुड़ती थीं। हमने वेस्टर्न कोर्ट में उनके साथ नाश्ता किया। वह खाने-खिलाने के बड़े शौक़ीन थे।  एक-एक व्यंजन का रस लेकर खाते थे और उतनी ही प्रीति से सबों को खिलाते भी थे--व्यंजनों का गुणावगुण बताते हुए। जल्दी ही संसद पहुँचने का समय गया। वह हम सबों को लेकर संसद-भवन पहुँचे।  उन्हीं की कृपा से हमने पहली बार संसद की कारवाई देखी। संसद-भवन का सम्पूर्ण दिग्दर्शन उन्होंने ही हमें करवाया और वह स्थल भी पूर्ण विवरण के साथ हमें दिखाया, जहां से कभी शहीद भगत सिंह ने बम का प्रहार किया था।  फिर दोपहर के वक़्त गंगा चाचा हमें संसद के भोजनालय में ले गए थे, जहाँ हम सबों ने मिल-बैठकर स्वादिष्ट भोजन किया था। वह पूरा दिन उन्होंने हमारे साथ व्यतीत किया था और बहुतेरी बातें की  थीं। उनकी प्रीति, उनके वात्सल्य और अपरिमित स्नेह से भीगे-भीगे हम शाम ५ बजे उनसे विलग हुए थे।

गंगा चाचा का हिंदी-प्रेम अप्रतिम था। एक बार मैंने उनसे पूछा था--"फ़ोन की घण्टी बजने पर जब आप उसे उठाते हैं तो 'हेलो' के स्थान पर 'जी' क्यों कहते है? सब लोग तो 'हेलो' बोलते हैं।" मेरा प्रश्न सुनकर वह हँस पड़े थे, फिर गम्भीर होकर उन्होंने कहा था--"मैं दूसरी ज़बान में क्यों उत्तर दूँ ? मेरी अपनी भाषा है। मैं अपनी भाषा में उत्तर दूँगा। मान लो, किसी ने तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दी। तुम द्वार खोलकर आगंतुक को देखोगे, फिर क्या कहोगे ? यही न, कि 'कहिये, किससे मिलना है ?' फ़ोन की घण्टी को मैं दरवाज़े पर हुई दस्तक मानता हूँ, इसीलिए फ़ोन उठाकर 'जी हाँ, कहिये' कहता हूँ। हिंदी ही हमारी बोली-बानी है। हमारी सत्ता की  संरचना में हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिंदी हमारी आत्मा में रची-बसी है। मैं उसी भाषा में उत्तर देता हूँ।"
{क्रमशः}

रविवार, 8 दिसंबर 2013

याद आते हैं गंगा चाचा …

[एक आत्मीय स्मरण-नमन]
 
राष्ट्रवादी नेता, गांधीवादी विचारक, प्रखर सांसद और हिन्दीसेवी स्व० गंगा शरण सिंह को मैं भूल नहीं पाता। वह मुझे याद आते हैं। औसत क़द, स्थूल शरीर, खादी का शफ्फ़ाक़ श्वेत परिधान--धोती-कुर्ता और सिर पर दुपल्ली गांधी टोपी। बिहार के एक ज़मींदार परिवार में जन्मे और बड़ी शानो-शौकत में पले-बढ़े। अपनी युवावस्था में अत्यंत सुदर्शन और गठीली देह-यष्टि के रहे होंगे: क्योंकि बाल्य-काल में जब मैंने उनके प्रथम दर्शन किये थे, तब वह अधेड़ावस्था की दहलीज़ थे, किन्तु हृष्ट-पुष्ट, सक्षम और फुर्तीले व्यक्ति थे। मेरे पूज्य पिताजी (स्व० पं प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') से उम्र में चार-पाँच वर्ष बड़े थे, लेकिन युवावस्था के दिनों से ही पिताजी से उनकी 'तुम-ताम' कि प्रगाढ़ मित्रता थी। सर्वप्रथम वह स्वतन्त्रता सेनानी बने और स्वेच्छा से उन्होंने असहयोगी के कठिन जीवन का वरण किया था। आरंभिक दौर में गांधीजी के विचारों से प्रभावित हुए, लेकिन कालान्तर में नरेंद्रदेवजी और जयप्रकाश के निकटतर होते गए और बाद में उन्होंने अपने आपको पूरी तरह हिंदी-सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। 

एक ज़माना ऐसा भी था, जब बिहार में गंगा, मुक्त और बेनीपुरी--इन त्रिदेवों की तूती। बोलती थी। सन १९३७ में रामवृक्ष बेनीपुरीजी और गंगा शरण सिंहजी सम्मिलित रूप से 'युवक' नाम की पत्रिका निकालते थे और पिताजी 'बिजली'। मित्रता अपनी जगह थी और पत्रिका का ख़म-पेंच अपनी जगह। तब पिताजी, बेनीपुरीजी और गंगा चाचा--ये सभी मित्र पटना में आसपास ही रहते थे और इन सबों के बीच अत्यंत घनिष्ठ और प्रगाढ़ सम्बन्ध थे। गया (बिहार) के प्रख्यात कवि मोहनलाल महतो 'वियोगी' ने १९३८ के एक पत्र में पिताजी को था--"… और तुम--क्या मैं भूल गया हूँ तुम्हें ? इस जन्म में तो शायद गंगा, मुक्त और बेनीपुरी--त्रिदेवों को भूल नहीं सकता, पर-जन्म की राम जाने!... " सच है, उस ज़माने में बिहार की साहित्यिक भूमि पर इन तीनों मित्रों ने अच्छी-खासी धूम धूम मचा रखी थी।  लेकिन गंगा चाचा से पिताजी की मित्रता उस समय की थी, जब पिताजी इलाहाबाद में थे। बिहार से बेनीपुरीजी के साथ गंगा चाचाजी भी इलाहाबाद जाते तो मेरे पितामह (साहित्याचार्य पं० चंद्रशेखर शास्त्री) के  दर्शन करना न भूलते। युवावस्था के उन्हीं दिनों की मित्रता आजीवन बनी रही।

बचपन में मैंने गंगा चाचा को कई बार देखा था, लेकिन वह बस देखे-भर का था; क्योंकि तब इतना ही बोध था कि वह पिताजी के मित्र हैं। गंगा चाचा जब घर आते, मैं उन्हें प्रणाम कर दायित्व-मुक्त हो जाता। वह पिताजी के पास बैठते और घंटों बातें करते। थोड़ा  बड़ा हुआ तो इतना जरूर जान सका कि वह पिताजी के अनन्य मित्र हैं और जब आये हैं तो दोनों मित्रों की बैठक लम्बी चलेगी। मेरी माता चाय की  ट्रे या नाश्ते की प्लेटें बैठक में ले जाने का आदेश देतीं या पिताजी पान-सुपारी ले आने का हुक्म देते, तो मैं आदेश का पालन करने को तत्पर रहता। मैं बचपन से ही अतिभाषी था। पिताजी के मित्र मुझसे जो कुछ पूछते, उसका उत्तर मेरी जिह्वा पर तैयार रहता, लेकिन यह जरूरी नहीं था कि वह युक्तिसंगत हो। मेरे बे-सिर-पैर के उत्तरों पर गंगा चाचा भी कई बार ठठाकर हँस पड़ते थे।
 
फिर वक़्त का एक लंबा टुकड़ा हाथों से फिसल गया। सन १९७१-७२ में जब मैं 'दिनकर की डायरी' पर काम कर रहा था, तब पटना के राजेन्द्र  नगर में उनके आवास पर प्रतिदिन जाया करता था। इसी मुहल्ले  में गंगा चाचा ने भी अपना मकान बनवा लिया था। उन दिनों मुझ पर एक फ़ितूर सवार था। मैं जिन बड़े साहित्यकारों से मिलता, उनसे अपनी एक पॉकेट डायरी में 'ज़िन्दगी क्या है'--इस विषय पर कुछ लिख देने का आग्रह करता था। एक दिन दिनकरजी के यहाँ से मैं जल्दी छूट गया। मैंने सोचा, क्यों न गंगा चाचा के दर्शन करता चलूँ। दिनकरजी के आवास से गंगा चाचा का घर दस मिनट की  पदयात्रा की  दूरी पर था। मैं उनके पास पहुँचा। वह बड़े स्नेह से मिले। उनके सिरहाने ही कई डिब्बे रखे होते थे, जिनमें  मठरी,मनेर के लड्डू, स्वादिष्ट मिठाइयाँ,तिलकुट आदि होता था। उन्हीं डिब्बों से निकालकर उन्होंने आग्रहपूर्वक मुझे मिठाइयाँ  खिलायीं और ढेरों बातें कीं। फिर मैंने अपनी पॉकेट डायरी निकली और उनके हाथों में देते हुए आग्रह कि  'ज़िन्दगी क्या है', इस पर दो-चार पंक्तियाँ  लिख देने की करें। उन्होंने एक क्षण भी कुछ न सोचा और कलम उठाकर एक शेर मेरी डायरी में लिख दिया--
यक़ीं  मोहकम अमल पैहम, मोहब्बत फ़ातहे आलम,
ज़हादे  ज़िंदगी में हैं यही मर्दों की शमशीरें !
उर्दू-फ़ारसी मिश्रित इस शेर का अर्थ भी उन्होंने मुझे समझाया था--'सब पर विश्वास करो और उस विश्वास को जीवन में उतारो, सारी  दुनिया को जीत लेनेवाला प्रेम अपने अंदर पैदा करो--जीवन-युद्ध में यही मर्दों की तलवारें हैं।'
[क्रमशः]