बुधवार, 24 दिसंबर 2014

[पूज्य पिताजी की १९वीं पुण्य-तिथि (२ दिसंबर) के दिन मैं पटना में था। घर में विवाह का आयोजन था और वहाँ नेट भी काम नहीं कर रहा था। लिहाज़ा, उस दिन उन पर न कुछ लिख सका, न कुछ पोस्ट कर सका। घर में ही उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें स्मरण-नमन किया और फिर लौट आया...! पटना से जो सामग्री उठा लाया हूँ, उसमें उनका उपन्यास 'पुलिना के पत्र' भी है और डॉ. श्रीरंजन सूरिदेवजी के दो संस्मरणात्मक आलेख भी। एक उनके जीवन-काल में लिखा गया था, दूसरा मरणोपरांत। आपके सम्मुख रखते हुए मैंने लेख का क्रम बदल दिया है, बादवाला लेख पहले रख रहा हूँ। चाहता हूँ, इसे आप भी पढ़ें और दिसंबर बीतने से पहले मेरे स्मरण-नमन में मेरे साथ आ खड़े हों.--आनन्दवर्धन.]
हिन्दी के मुक्त-पुरुष मुक्तजी
--डॉ. आचार्यश्री श्रीरंजन सूरिदेव
अपने नाम-गुण के अनुसार सदा प्रफुल्ल रहनेवाले थे प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त'जी। वह साहित्यिक संस्मरणों के शब्द-निधि थे। साहित्येत्तिहासिक घटनाओं और परिस्थितियों का सजीव शैली और सप्राण भाषा में वर्णन की उनकी रीति की द्वितीयता नहीं है। उन्होंने अपने संस्मरणों में समय के इतिहास को रेखांकित करने की चेष्टा की है, साथ ही उन्हीं स्थितियों का वर्णन किया है, जिन्होंने उन्हें प्रभावित किया है या उनके जीवन-क्रम को संचालित या नियंत्रत किया है।
मुक्तजी तब बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् के कार्यालय में यदा-कदा आया करते थे। उस समय कदाचित पं. हंसकुमार तिवारी परिषद् के निदेशक थे। उन दोनों के वार्तालाप में एक अद्भुत सारस्वत आनन्द मिलता था। बातचीत में वह अपने 'सेक्रेटरी' की चर्चा अवश्य करते थे, जो उनके जीवन के दुःख-सुख में बराबर साथ देता था। यह सेक्रेटरी उनका उनका 'आध्यात्मिक सेक्रेटरी' था।
जैसा उन्होंने कहा था--एक बार वह परदेश-वास के क्रम में रात में सोये हुए थे। बरसात का दिन था। उस रात में इतनी वर्षा वर्षा हुई कि कमरे में सहसा पानी भर आया। कमरा बंद था। निकलने का कोई उपाय नहीं था। इस साँसत की घड़ी में उनको 'सेक्रेटरी' याद आने लगा। तभी अचानक कमरे की बंद खिड़की खुल गई, जिससे पानी कमरे से बाहर निकल गया और उनकी जान बच गई। वह जब भी मिलते, मैं उनके साथ घटी इस रोमांचकारी घटना का स्मरण अवश्य दुहराता था।
मुक्तजी से मेरी पहली मुलाकात तब हुई, जब लोहानीपुर (पटना) में, एक सामान्य मकान में किराये पर रहते थे। उसके बाद तो कई मुलाकातें हुईं, जब वह पटना रेडियो में हिंदी-वार्ता के प्रभारी के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे। एक बार मैं वार्ता-प्रसारण के क्रम में रेडियो स्टेशन गया। उस समय मुक्तजी हिंदी-वार्ता के प्रभारी थे। मैंने जो आलेख वार्त्ता के लिए लिखा था, उसमें एक जगह कुछ संशोधन की आवश्यकता उन्होंने बतायी। मैंने उनसे अपेक्षित संशोधन कर लेने को कहा और ख़ुशी जताई कि इससे मुझे गौरव-बोध होगा। लेकिन, उन्होंने मुझे ततोSधिक गौरवान्वित तब कर दिया, जब यह कहा--"पाण्डुलिपि आपकी है, आप स्वयं उसका संशोधन करें।" संशोधन का प्रसंग तब आया, जब उन्होंने पाण्डुलिपि का निरीक्षण कर बताया कि इसमें कुछ ऐसी बात लिख गई है जो रेडियो नीति के अनुकूल नहीं है। मैंने उनके इच्छानुसार अपनी पाण्डुलिपि में संशोधन कर दिया। इस प्रकार, मैं उनकी सारस्वत प्रसन्नता अर्जित करने में सफल हो गया।
मुक्तजी जितने प्रभावशाली कथाकार थे, उतने ही अच्छे काव्यकार भी थे। पहले रेडियो स्टेशन में कवि-सम्मलेन का आयोजन प्रायः होता था। एक बार यथायोजित कवि-सम्मलेन के श्रोताओं में निर्मम समालोचक आचार्य नलिनविलोचन शर्मा भी सम्मिलित थे। उस सम्मलेन में मुक्तजी ने अपनी जिस कविता को उदात्त आवर्जक स्वर में प्रस्तुत किया, उसकी प्रसंशा नलिनजी ने भी की। यद्यपि उनके-जैसे तत्त्वभिनिवेशी आलोचक की प्रसंशा अर्जित करना सबके लिए संभव नहीं हो पाता था।
मुक्तजी पान खाने के शौक़ीन थे। पनडब्बा साथ रखते थे, बीच-बीच में पान की गिलोरियां बनाते और सेवन करते। मुझे भी एकाध बार उनकी बनायी गिलौरियों के आस्वाद का सौभाग्य सुलभ हुआ था। मैं इस अर्थ में बड़भागी हूँ कि मुझे अपने से छोटे और बड़े सभी साहित्यकारों का सहज स्नेह सुलभ रहा है।
मुक्तजी की कथा-शैली अपने ढंग की है। कथा में कथानक के साथ चरित्र भी होते हैं। मुक्तजी द्वारा प्रस्तुत कथानक और चरित्र इस प्रकार गुँथे हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। कथानक के बंधन में बांधकर चरित्र को विकृत करने की प्रवृत्ति मुक्तजी में कभी नहीं रही। यद्यपि उन्होंने मनोविज्ञानं के आधार पर अपने कथा-चरित्रों की सर्जना की है। मैंने मुक्तजी की कृतियाँ--'पुलिना के पत्र' (पत्र-शैली लिखित उपन्यास) और 'अतीतजीवी' (संस्मरण) पढ़ी हैं और इन दोनों ही कृतियों ने मुझे प्रभावित किया है। इन दोनों में मुक्तजी द्वारा उपन्यस्त आकर्षक कथावस्तु की मनोहारिता, चरित्र-चित्रण की कुशलता, संवाद या कथोपकथन द्वारा यथाकल्पित पात्रों में सजीवता की संचारिता, शैली की सुकुमारता और मनोज्ञता आदि औपन्यासिक तत्त्वों एवं संस्मरणात्मक उपादानों के युतपद विनियोग की निपुणता प्रबुद्ध पाठकों को रिझाये विना नहीं रहती है। मुक्तजी ने अपनी सामान्य रेखाओं द्वारा ही भावाभिव्यंजक शब्द-चित्रों को उरेहा है। उनकी यह कथा-शैली हिंदी के कई अन्य कथाकारों की शैली में परिलक्षित होती है।
मुक्तजी स्वभावतः कविहृदय थे। उनके लिखे 'पुलिना के पत्र' जैसे रूमानी उपन्यास में यथाचित्रित कथा का स्वरूप काव्य के उपकरणों के माध्यम से निरूपित हुआ है। अतएव, मुक्तजी की कथाओं में कवित्वपूर्ण और भाव-मधुर वातावरण भी बना रहता है। इस प्रकार, मुक्तजी को रोमांतिक कथाकारों में पांक्तेय माना जा सकता है।
संस्मरणकार के रूप में मुक्तजी प्रौढ़ निबंधकार थे। इसलिए, स्मृति के आधार पर व्यक्ति-विशेष पर लिखित उनके निबंध संस्मरण बन गए हैं, जिनमें विभिन्न पात्रों का कोमल और सजीव चित्रण हुआ है। बिहार के शिवपूजन-युग के संस्मरणकारों में मुक्तजी अग्रिम पंक्ति में परिगणनीय हैं। महादेवी वर्मा के 'अतीत के चलचित्र', 'वातकी' संस्मरणात्मक कृति के सादृश्य पर नामित 'अतीतजीवी' में मुक्तजी की संस्मरणात्मक गद्य-रचनाएँ संगृहीत हैं। इस कृति से अवश्य ही हिंदी का गद्य-साहित्य समृद्ध हुआ है।
मुक्तजी सच्चे अर्थ में उन्मुक्त विचारों के परिग्रह-मुक्त पुरुष थे। संसार से उनकी असामयिक विमुक्ति से हिंदी-जगत की अपूरणीय क्षति हुई है। भद्रता और विद्वत्ता का उनमें मणि-कांचन संयोग सुलभ हुआ था। स्वाभिमान के धनी, मनीषी-मनस्वी मुक्तजी अपने जीवन में अनैतिक कभी नहीं हुए। वह बहुत ही स्पष्टवादी थे। अपने नैतिक बल पर वह मानव-समाज में निर्द्वन्द्व विचरते थे। मनुष्य-जीवन के लिए स्वार्थ की जितनी आवश्यकता होती है, उतना ही मूल्य वह स्वार्थ को देते थे। अन्यथा, उनका समग्र जीवन परमार्थ का अनुकरणीय उदाहरण जैसा है।
मुक्तजी ने व्यवहारिक वैदुष्य और शास्त्रीय प्रज्ञा दोनों को सामान रूप से उपार्जित किया था। वह स्वार्जन को जितना मूल्य देते थे, परार्जन को उतनी ही हेय दृष्टि से देखते थे। योग्यों की योग्यता को परखने की उनमें अपूर्व क्षमता थी। एक-दो बार उन्होंने अपने सुयोग्य पुत्र आनन्दवर्धनजी के साथ अपने महनीय पदार्पण से मेरे किराए की कुटिया को मूलवान बनाया था।
आज उनके नहीं रहने से मैं सारस्वत अनाथता का अनुभव करता हूँ। हिंदी-जगत में हिंदी के वयोवृद्ध सारस्वत पुरुषों की संख्या बड़ी तेजी से कम हो रही है। मुक्तजी तो संस्कृत के भी अधीती थे। बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् से प्रकाशित प्रसिद्ध ऐतिहासिक संस्कृत-कथाग्रन्थ 'कथासरित्सागर' का सरल प्रांजल हिंदी-भाषा में अनुवाद उनकी गम्भीर संस्कृतज्ञता की आक्षरिक उद्घोषणा करता है। उनके अकालिक निधन से संस्कृत और हिंदी दोनों राष्ट्रीय भाषाएँ अधनता का अनुभव करती हैं।
[चित्र-परिचय : पूज्य पिताजी का यह चित्र १९४९ में प्रकाशित उनके उपन्यास 'पुलिना के पत्र' में छापा था, वहीँ से लिया गया है.]

सोमवार, 3 नवंबर 2014

दो-दो फुलझड़ियाँ...


दीवाली की रात बिताकर
प्रात-भ्रमण पर निकला घर से
बहुत सबेरे,
अंधियारा तो कहीं नहीं था,
फिर भी किरणों का पता नहीं था;
चलते-चलते देखा मैंने
जश्न अनूठा--
नाकाम पटाखों,
दगे पटाखों,
छुर-छुर करके बुझे पटाखों
और रहे अधजले पटाखों को
चुनते देखा सड़क-किनारे
उन निर्धन बच्चों को मैंने
जिन्हें नहीं मिले थे
रात पटाखे...!
हसरत की देखीं तेज़ हवाएँ
उन चेहरों पर
जिन पर कल थी गहरी मायूसी
आज मिली थी उन्हें ख़ुशी,
आनंदित वे झूम रहे थे,
चौबारे के इस घर से
उस घर तक वे घूम रहे थे !
कुछ बच्चे थे,
जो खूब जतन से,
नाकाम पटाखों से
निचोड़ रहे बारूद
प्लास्टिक की थैली में
और इकट्ठा करते जाते दौड़-दौड़कर
दीये, चकरी, मोमबत्तियाँ,
बम-पटाखे और फुलझड़ियाँ !
अलग खड़ा एक छोटा बच्चा
फुलझड़ियों की तीली से
राख पीटकर झाड़ रहा था
और तीलियाँ अपनी जेबों में डाल रहा था...!
उस अबोध के पास गया मैं,
पूछा मैंने--"क्या करोगे इस तीली का,
मुझे बताओ, मैं भी तो जानूँ!"
वह तो मेरा स्वर सुनकर ही
चौंक पड़ा था,
जैसे चोरी पकड़ी जाती,
वैसे वह भयभीत खड़ा था...!
प्रश्न दुबारा सुनकर वह तो
सरपट भागा,
जो मेरे मन का कौतूहल था
और तीव्रता से वह जागा!
धीरे-धीरे चला गया मैं
बच्चों की दूजी टोली तक
जो छुर-छुर करके बुझे पटाखों की
तह में जाकर खुरचते थे बारूद,
मैंने पूछा--"भई, क्या करते हो?
जो सम्पदा तुम इतने श्रम से जुटा रहे हो
उससे क्या होगा...?"
एक साहसी बालक था उनमें
आगे आया, बोला मुझसे--
"हम इस बारूद की
छोटी-छोटी पुड़िया बनाएंगे
और उन्हें फुलझड़ियों की तीली पर लटकाकर
उनमें आग लगाएंगे,
अधजली मोमबत्तियाँ
हम फिर से जलाएंगे
कल तो कोठीवालों की दीवाली थी,
थोड़ी दीवाली हम आज मनाएंगे..!"
इतना कह बच्चों की टोली
हुर्रे-हुर्रे कहती-कहती
भाग चली गलबहियां डाले
मैं हैरत में पड़ा रहा पलकें झपकाते...!
दीवाली के दिन भी क्या हम
उन निर्धन बच्चों को
नहीं दे सके थोड़ी खुशियाँ ?
कुछ अधिक नहीं तो फिर भी भाई,
दो-दो फुलझड़ियाँ...!!

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

मेरे पुण्य-प्रसून...


समय के साथ
बहता रहा जीवन
हम अनजाने ही
बोते रहे अपनी ज़मीन पर
यश-अपयश...!
ऊर्जा क्षीण हुई तो ज्ञात हुआ
यश उपजानेवाले बीज तो
अंकुरित हुए ही नहीं
जाने कहाँ, किस मरु में
जा पड़े थे वे
कि कुंद हो गए...!
अपयश के बीजों ने
उर्वर या बंजर की परवाह न की,
वे तो पूरी उमंग से उठ खड़े हुए
विशाल कंटीली झाड़ियों-से
जिसमें चक्रवाती हवाओं-सी
उलझी पड़ी है ज़िन्दगी...!
कब तक पुकारूं तुम्हें
कि आओ, सुलझा दो जीवन,
संवारो उसे,
खोजो उन यशदायी बीजों को
मेरे साथ--
क्या पता,
तुम्हारे फूल-से हाथों लग जाएँ
वे बीज और--
उन्हें उर्वर भूमि मिले तो
वे फिर से
हो उठें अंकुरित
और कभी-न-कभी
उनकी कोमल टहनियों पर
खिल उठें मेरे पुण्य-प्रसून....!

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

अंतर्यात्रा...

वो जो तुम कहते रहते हो न
मुझसे बार-बार--
"अपने अंदर में झाँकूँ,
करूँ अंतर्यात्रा और
खोजूँ अपने आप को--
देखूं-जानूँ कौन हूँ मैं,
कहाँ हूँ मैं,
क्यों यहां हूँ मैं...?"

मैं अंतर की गहराइयों से ही तो
निकाल लाता हूँ
कविताएँ, कथाएं और गल्प,
अंतर में झांकता-डूबता-खोजता नहीं
तो लिखता कैसे हूँ भाई...?
यह अंतर्यात्रा नहीं तो और क्या है...?

तुम्हारा प्रतिवाद रहता है तैयार
कहता है मुझसे--
"तुम मन की भावनाओं तक ही तो जाते हो
वहाँ से कुछ भाव, अभाव अपने
उठा लाते हो
उन्हें मस्तिष्क की भट्ठी में पकाते हो
और फिर जगत की थाली में
परोस जाते हो;
ऐसा करके तुम आत्मतुष्ट होते हो,
आत्ममुग्ध होते हो--
आत्मानुसंधान नहीं करते...!"

मैं चकराया-सा घूरता हूँ
प्रतिवादी को,
मन में उठते हैं प्रश्न--
आकाश अपनी तलाश
कब करता है निस्सीम व्योम में..?
समुद्र अपनी तलहटी में
कहाँ खोजता है अपनी सत्ता...?
वायु कहाँ ढूंढती है अपने प्रवाह में
अपने होने को...?
प्रज्ज्वलित अग्नि भी तो
नहीं करती अपने उत्स की खोज...?
और यह धरती भी
जो सौर-मंडल में
निरंतर डोल रही है--
कब करती है--अंतर्गमन...?

फिर छिति, जल, पावक, गगन, समीर से
रचित--मैं, क्यों करूँ अंतर्यात्रा...?
क्यों खोजूँ अपने आपको--
कहाँ हूँ मैं...?
जब तक जीवन में हूँ
चलचित्र-सा चलने दो मुझे
बहने दो मुझे मेरी त्वरा में...!

इतना आसान भी तो नहीं होता,
अचानक
चित्र से
विचित्र हो जाना...!

बुधवार, 27 अगस्त 2014

पहाड़ के पैर ...


[मालिण गाँव की त्रासदी पर एक प्रवेग से उपजी कविता--यथावत]

सुबह हुई तो चिड़िया-चिरगुन
और परिंदे हैरत में थे,
कहाँ गए वे छप्पर-छाजन और मुंडेर
जिन पर जा बैठा करते थे,
कहाँ गई वह पूरी बस्ती
जो कल रात यहां सोई थी,
सुबह-सुबह की हलचल जाने
कहाँ खो गई,
बर्तन-बासन धोती माँ-बहनें
कहाँ सो गईं ?

गौरैया का प्यारा जोड़ा
दहशत में था,
सोच रहा था--
कहाँ गई वह मुनिया-बिटिया
जो डाला करती थी दाने
फुदक-फुदककर हम जाते थे
जिनको खाने...?
बैजू राउत, चंदू पाटिल
कहाँ छुप गए,
कल की शाम यहीं बैठे थे
कहाँ गुम गए...?

परेशान हवाएँ पौधों-वृक्षों से
लिपट-लिपटकर पूछ रही थीं--
हम गली-गली में चकरातीं,
दरवाज़ों की साँकल खटकातीं
घर-घर घूमा करती थीं,
तोता-मैना के पिंजरों को
बजा-बजा झूमा करती थीं,
अब कैसा सन्नाटा पसरा है
सबकुछ क्यों बिखरा-बिखरा है...?
ये तो निपट सपाट धरा है,
अमिय-धार-सी बारिश में भी
कैसा यह अवसाद भरा है...?

एक अकेला काला कुत्ता
दुम दबाये भौंक रहा है,
पगलाया-सा इधर-उधर
क्यों दौड़ रहा है...?
शायद वह भी ढूंढ रहा है
वे घर-दरवाज़े, उनके आँगन,
जहां सुबह की धूप निकलते
मिलते थे रोटी के टुकड़े
थोड़ी जूठन...!

हवा, चिरैया, काले कुत्ते ने
दौड़-भागकर पता लगाया,
देख अजूबा, औचक ही
गौरैया का जोड़ा चिल्लाया--
अरे, गाँव-किनारे जो पहाड़ था,
उसका भी कुछ पता नहीं है,
धैर्य-प्रतीक-सा खड़ा हुआ था जाने कब से
वह विलुप्त हो गया आज अचानक कैसे !
सबने इकसाथ उधर देखा, पलकें झपकाईं
बात किसी की समझ न आई...!

सुख-दुःख की पूरी बस्ती पर ही
काल झपट्टा मार गया था,
प्रकृति के दोहन के सम्मुख
पर्वत का धीरज हार गया था...!

यह कैसी थी प्रभु की माया,
क्यों लूट गई पर्वत की छाया?
जिसे हम सभी नमन करते थे,
पीपल के नीचे मंदिर में
प्रतिदिन ही पूजन करते थे,
हमसे क्या अपराध हो गया?
पूरी बस्ती को काल खा गया...!
उस सर्जक की बलिहारी है,
उसकी महिमा भी न्यारी है...!

जो हुआ, अच्छा हुआ, भव-बंध छूटा,
जन-समूह की साँसों का
एकसाथ ही तार भी टूटा..!
मेल-मोहब्बत, सारे झगड़े ख़त्म हो गए
दुःख-दैन्य से मुक्ति मिली,
क्लेश-द्वेष निर्वैर हो गए,
जबसे यह सुनने में आया--
पहाड़ों के भी पैर हो गए...!!

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

।। दरबे में भेड़िया ।।


देह के दरबे में दुबककर
बैठा है एक भेड़िया
वह रह-रहकर उचकाता है
अपनी गर्दन, 
उसकी आँखों से
निकलने लगती हैं चिंगारियां,
चमक उठते हैं उसके पैने दांत,
निकलने लगते हैं
उसके नुकीले नख,
वह हमारी रूह पर
छाने लगता है
और हमारी सम्पूर्ण सत्ता पर
आधिपत्य जमा लेना चाहता है,
हमारी किंचित अनवधानता का
लाभ उठाकर
वह हमें मनुष्य नहीं रहने देता,
बना देता है
एक हिंसक पशु--भेड़िया...!

आदिम सभ्यता के हर दौर में
हमने देखे हैं
मनुष्य-शरीर में भेडिये
और देखा है उनका हश्र भी;
लेकिन इन दिनों
उनकी संख्या में हुआ है
तेजी से इज़ाफ़ा,
बढ़ी है उनकी तादाद
और मनुष्यों की हर जमात में
मची है हलचल,
उठा है कोलाहल और आर्त्तनाद...!

ऐसे मनुष्य-देहधारी भेड़ियों को
चिन्हित कर लेना आसान नहीं है,
आदमी की भीड़ में
भेड़ियों की सहज पहचान नहीं है...!
जितनी क्षिप्रता से
मनुष्य भेड़ियों में तब्दील होते हैं,
उतनी ही शीघ्रता से
मनुष्यता को कलंकित कर
वे मनुष्य बन जाते हैं
और मनुष्य-समुदाय में
शालीनता से सिर झुकाये
सम्मिलित हो जाते हैं...
हम कैसे पहचानेंगे उन्हें...?
कैसे करेंगे उनकी शिनाख्त...?

यही प्रश्न है,
और, यह भी एक बड़ा और मारक प्रश्न है कि
आज का आदमी
कितना बचा रह गया है मनुष्य-सा...?

नयी पौध की परवरिश में
कहीं कुछ गलत हो रहा है
कोई विष मस्तिष्क में
फैल रहा है तेजी से
वायरल-सा,
कुछ विषाक्त परोसा जा रहा है
उसके सामने बेधड़क, और--
भेडिया उचका रहा है बार-बार अपनी गर्दन,
मनुष्य की आँखों में उतर रही हैं
भेडिये की आँखें--तीक्ष्ण, हिंसक, भयावह आँखें...!

संस्कारों की नींव पर ही
उन्हें पिलानी होगी
आत्मानुशासन की घुट्टी, जिससे
धीरता और धैर्य से,
बुद्धि और विवेक से,
प्रज्ञा और ज्ञान के आलोक से
वे आसुरी शक्तियों को परास्त कर सकें...!

हम चाहें तो
भेडिये के नख का पैनापन
कुंद कर सकते हैं
तोड़ सकते हैं उसके नुकीले दांत
निष्प्रभ कर सकते हैं
उसकी चमकीली आँखें
और उसके गले में डाल सकते हैं
आदमीयत का मज़बूत पट्टा,
दुम दबाकर दरबे में ही
रहने को कर सकते हैं उसे बाध्य..!
आज हमें अपने मनुष्य होने के दावे को
सिद्ध करने की मजबूरी है...!

बुधवार, 16 जुलाई 2014

चलता रहेगा न यह सिलसिला...?


पक तो गए थे तुम
तुम्हें तो गिरना ही था
जगत-वृक्ष की डाल से... !
तुम गिरे,
मैंने साभार झुककर तुम्हें उठाया,
धोया, स्वच्छ किया;
फिर किया तुम्हारा उपभोग--
कितने मीठे,
कितने सुस्वादु हो गए थे तुम--
मैं आकंठ तृप्त हुआ,
क्षुधा शांत हुई मेरी...!

तृप्ति के संतोष से
उपजे आशीष को
दो खण्डों में बांटकर
मैंने एक भाग तुम्हें दिया,
दूसरा उसे दे आया
जिसकी कोमल बाहें छोड़
तुम टपक पड़े थे भूतल पर!

आशीष बांटकर मैं निःस्व हो गया;
लेकिन अपनी कृतज्ञता का ज्ञापन करते हुए
तुम्हारे बीज-स्वरूप अवशेष को
रख आया हूँ बगीचे में--
भुरभुरी मिटटी में
खाद-पानी के साथ!

बोलो न, कब तक बन जाओगे तुम
एक छायादार विशाल वृक्ष
मेरे मीठे-सुस्वादु
पके हुए फल...?
ऐसा कब होगा कि
मेरे मन में फिर उपजेगा आशीष,
जागेगा भीतर दाता...?

हम तुम्हारे मौन का
अर्थ-विन्यास नया करते हैं
सच है, भावुकता में बहुधा
हम प्रश्न बहुत करते हैं!

छोडो, प्रश्नों को जाने दो,
तुम नए वृक्ष की बांह पकड़
फिर से आना,
मैं भी वस्त्र बदलकर आ जाऊंगा--
कालचक्र के साथ-साथ
चलता रहेगा न यह सिलसिला--
अनवरत...?

बीज मौन था,
किन्तु धरती से उठती
मंद ध्वनि मैंने सुनी,
जैसे बीज कह रहा हो--
ये तो भविष्य के गर्भ में
झांकने का यत्न है,
बन्धु ! यह भी एक प्रश्न है...!!