रविवार, 27 मार्च 2016

माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेसी...?

कानों सुनी, आँखों देखी... (१)

बात बहुत पुरानी है। तब की, जब आलोक-भरे इस संसार को देखने के लिए मैंने आँखें भी नहीं खोली थीं, उसके भी कई-कई बरस पहले की। यह कहानी पिताजी से सुनी थी-मेरी स्मृति में कहीं चिपक कर रह गयी है। आप सुनेंगे? कहूँ कहानी, वही पुरानी... ?

मैंने अपनी पितामही (रामदासी देवी) को बाल्यकाल में देखा था, तब वह ८०-८५ के बीच की रही होंगी। वृद्धावस्था की उस उम्र में भी वह बहुत सुन्दर दिखती थीं, जबकि रुग्ण और शय्याशायी थीं! अत्यंत ममतामयी, मृदुभाषिणी और स्वच्छ-निर्मल मन की महिला! सारा खानदान उन्हें 'भौजी' की जगह जाने क्यों 'भौजा' कहता था, शायद इसलिए कि वह खानदान की सबसे बड़ी बहू थीं! उनकी ननदें और देवर मेरी बड़ी बुआ और पिताजी के हमउम्र थे। पितामही थीं तो वाराणसी की, लेकिन बनारसी भाषा बिसारकर अच्छी भोजपुरी बोलने लगी थीं; क्योंकि उनकी ससुराल की भाषा वही थी। पितामही के सभी बच्चे सुदर्शन और सर्वगुण-संपन्न थे! उद्भट विद्वान, सस्ंकृतज्ञ, सदाचारी और अनुशासनप्रिय कठोर पिता (साहित्याचार्य पं. चन्द्रशेखर शास्त्री) तथा उदार, करुणामयी, ममतामयी माता की छाया में उन सबों की परवरिश हुई थी। पितामही की दो बेटियां थीं--मेरी बड़ी बुआ और छोटी बुआ--दोनों एक-से बढ़कर एक--सुदर्शना! उन दोनों ने अपनी माता के सारे गुण ग्रहण कर लिये थे--मीठा बोलना, परदुःखकातर हो जाना और परोपकार के लिए सदैव प्रस्तुत रहना आदि-आदि।

संभवतः, वह १९२८-३० का ज़माना रहा होगा। तब छोटी उम्र में ही विवाह की परंपरा थी। बालपन में ही छोटी बुआजी (इंदिरा तिवारी) का विवाह बिहार में, भोजपुर के एक गाँव 'चनउर' के सम्भांत तिवारी परिवार में हुआ था। छोटे फूफाजी (रामसकल तिवारी) सरकारी पद (तहसीलदार) पर तो थे ही, उनके पास जोत की बहुत उपजाऊ पर्याप्त भूमि थी! लेकिन, निपट देहाती गाँव था--बहुत पिछड़ा हुआ! उन दिनों दो कोस पैदल या किसी बैलगाड़ी से चलकर ही वहाँ पहुँचना सम्भव हो पाता था। तब विवाह के बाद गौने की प्रथा थी। विवाह के ४-५ बरस बाद छोटी बुआजी का गौना हुआ था। छोटी बहन के स्नेह से बँधे पिताजी प्रायः उनसे मिलने के लिए इलाहाबाद से 'चनउर' जाया करते थे। वह ज़माना ऐसी रूढ़ियों से बँधा था कि नव-वधू के मायके से भी कोई आये, तो उसे तत्काल मिलने की अनुमति नहीं मिलती थी। उसे बाहरी दालान, ओसारे या बैठके में ही रोक लिया जाता था। थोड़ी देर बाद घर की कोई बालिका पीतल के परात में जल लेकर आगंतुक के पास आती थी। लोटे से जल डालकर आगंतुक के पाँव पखारती थी और, यह काम वह पूरे मनोयोग से, परिश्रमपूर्वक, करती थी, जिससे पदयात्रा की थकन मिट जाए! तत्पश्चात, गुड, मिस्री अथवा मनकुन्ती दाना मिश्रित गुड का एक विशेष प्रकार का लड्डू खिलाकर पेय-जल दिया जाता था।

और तो सब ठीक था, लेकिन इलाहाबाद के शहरी माहौल से आये पिताजी को ये पद-पखारन और पद-चम्पन बहुत अखरता था! फिर भी छोटी बहन की नयी-नयी ससुराल में वह कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं करते थे! उसके बाद शुरू होती थी पुरुष-प्रधान वर्ग की नीरस चर्चा, जिसमें आगंतुक के परिवार के प्रत्येक बुज़ुर्ग से लेकर बच्चों तक के कुशल-क्षेम की जानकारी ली जाती थी। जिससे यह परिलक्षित हो कि आगंतुक के परिवार के सभी सदस्यों की उन्हें भी बहुत फ़िक्र है! क्या ठिकाना, होती हो; लेकिन ऐसे प्रश्नों में जितनी आत्मीयता झलकती थी, उससे अधिक औपचारिकता ! जो भी हो, गाँव की सोंधी मिट्टी की वह ख़ास तरह की मिठास थी। मर्यादाओं का निर्वाह सजगता से होता था और मेहमानों की बहुत आवभगत होती थी।

आगंतुक बेचारा मन-ही-मन ऐंठता रहता था, मुस्कुराता हुआ सम्बद्ध-असम्बद्ध प्रश्नों के उत्तर देता जाता था, लेकिन अपने जिस स्वजन-परिजन से मिलने को वह आतुर-उद्विग्न होता, उससे मिलने की नौबत न आती थी। आगंतुक की दशा 'दरस को दुक्खन लागे नैन' जैसी हो जाती थी। सुबह के आये हुए व्यक्ति को मन मारकर पहले नाश्ता, फिर भोजन करने तक, बाहर ही रुके रहना पड़ता था। जब दोपहर का चौका-बर्तन सिमट जाता था, तब आगंतुक को गोबर से लिपे-पुते दो बड़े-बड़े आँगन पार करके तीसरे आँगन में ले जाया जाता था। उस तीसरे आँगन में बने अनेक छोटे-छोटे कमरों में एक कमरा उसका होता था, जिससे मिलने की आस लिए बेचारा प्रियजन तड़प रहा होता था।

छोटी बुआजी की ससुराल का घर बिलकुल ऐसा ही था--मिट्टी की मोटी दीवारों तथा फूस-खपरैल की छतों वाला बड़ा-सा घर! पहले आँगन में सानी-पानी की नादों के साथ मवेशियों का अड्डा और अन्न का भण्डार था। दूसरे और तीसरे आँगन में रहाइशी कमरे थे--बड़े-से आँगन के चौतरफे बने हुए! कमरे भी ऐसे, जिनमें खिड़कियां नहीं थीं, हवा-प्रकाश के लिए सिर्फ प्रवेश-द्वार को ही पर्याप्त माना गया था। दिन में भी उस एकलौते द्वार को बंद कर दिया जाए तो कमरे में अन्धकार उपस्थित हो जाता था! लेकिन आश्चर्य, कमरे बहुत शीतल, गोबर से लिपे हुए--परम पवित्रता का बोध देते हुए-से थे । होशगर होने के बाद मैं भी छोटी बुआ के गांव-घर कई-कई बार गया और पिताजी से सुनी हुई इस कहानी की कथाभूमि अपनी आँखों देख आया।

बहरहाल, शुरूआती दिनों में, उपर्युक्त समस्त प्रेममय अत्याचारों को बार-बार सहकर भी पिताजी अपनी छोटी बहन से मिलने वहाँ जाते रहे! ऐसी ही कई मुलाकातों के बाद,एक बार पिताजी प्रचण्ड गर्मी के दिनों में वहाँ सुबह-सुबह पहुँचे तो तीसरे आँगन में पहुँचने में उन्हें दिन के ढाई-तीन बज गए थे। छोटी बुआजी ने एक चारपाई पर चादर डालकर पिताजी को बिठाया और स्वयं दरवाज़े के पास बैठ गयीं। भीषण गर्मी तो थी ही, पूरे आँगन में अरहर की दाल भी फैली हुई थी। पिताजी ने समझा कि दाल की निगरानी के लिए बहन वहाँ बैठ गयी हैं। भाई-बहन में बातें होने लगीं, लेकिन पिताजी की चारपाई से बुआजी थोड़ी अधिक दूरी पर बैठी थीं। सहजता से संवाद हो सके, इसलिए पिताजी ने बुआजी से कहा--'इतनी दूर क्यों बैठी हो, थोड़ा पास आ जाओ!'
बुआजी ने कहा--'ना भइया, एहिजे ठीक बा। तनी हावा लागSता !' (नहीं भैया, यहीं ठीक है, थोड़ी हवा लग रही है)

फिर तो घर-परिवार की बातें शुरू हो गयीं और एक-डेढ़ घंटा कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। अचानक पिताजी ने देखा कि बुआजी आहिस्ता-आहिस्ता थोड़ा अंदर सरक आई हैं। पहले तो बुआजी ने एक पल्ला धीरे-से भेड़ा, फिर दूसरा भी बंद करने लगीं। जैसे-जैसे दूसरा पल्ला बंद होता जा रहा था, वैसे-वैसे कमरे में अँधेरा बढ़ रहा था। पिताजी ने पूछा--'दरवाज़ा क्यों बंद कर रही हो?'
बुआजी ने अपनी एक उँगली होठों पर रखकर पिताजी को चुप रहने का इशारा किया, फिर पिताजी के थोड़ा पास सरककर बोलीं--' भइया, चुपे रहS !' (भैया, चुप ही रहिये।)
पिताजी ने पूछा--'कांहें ?' (क्यों?)
बुआजी ने बहुत राज़दारी से धीमी आवाज़ में कहा--'जानत नइखS, पटिदारिन रहरिया चोरावSतिया, हमरा देखि लीही तS लजा जायी !' (आप नहीं जानते, पट्टिदारिन अरहर की दाल चुरा रही है, मुझे देख लेगी तो लज्जित हो जायेगी!)
उनकी बात सुनकर पिताजी विस्मित हुए और उन्होंने पूछा--'दाल किसकी है?'
बुआजी सतर्कता के साथ मंद स्वर में बोलीं--'रहरिया तS हमरे हS, बाकिर लेइओ जाई, तS केतना ले जाई ? ओकरा मनसान्ति से ले जाय दS ! हमरा कछु घटी ना !' (दाल तो हमारी ही है, लेकिन वह ले भी जायेगी तो कितनी? उसे मनःशान्ति से ले जाने दीजिये। मेरा कुछ घटेगा नहीं।)
 
पिताजी तो आश्चर्य से अवाक रह गए। छोटी बुआजी की कही यह बात वह आजीवन नहीं भूले। जब कभी यह कथा वह किसी को सुनाते, तो अंत में कबीर के इस सूफ़ियाना पद का उल्लेख करना नहीं भूलते--'जो घर जारै आपना, चले हमारे संग...!'

पितामह और दादीमाँ के दिये संस्कार उस दिन खुलकर बोल उठे थे। लेकिन सोचता हूँ, इस मायामय संसार में आज ऐसी विभूतियाँ कितनी होंगी...?
[--आनन्दवर्धन ओझा.]
[चित्र : श्रद्धेया दादीमाँ, जिनकी मधुर-मनोहर स्मृतियों से मन कभी मुक्त नहीं हुआ! सन १९६३-६४ का चित्र!]

मंगलवार, 22 मार्च 2016

।।कष्ट-कथा।।
'क्या ज़रूरी था, दाढ़ तोड़ के जाना तेरा,
माना, तू नरमदिल न हुआ, ठेकुआ मेरा...!'

बिहारी भारत के किसी कोने में रहे, वह अपनी प्रवृत्ति से विवश रहता है। गर्मियों में उसे चाहिए आम-लीची-बेल, हर मौसम में सत्तू, सुबह के नाश्ते में जलेबी-कचौड़ी-घुघनी और शाम के वक़्त भूँजा ! गाय-बकरी की तरह दिन-भर जुगाली करने को चाहिए मगही पान और सुगन्धित तम्बाकू! छठ-व्रत के समय ठेकुए-खजूर के लिए उसका जी मचलता है और होली के मौसम में गुझिया-पेडुकिया के लिए उसकी आत्मा ऐंठने लगती है! और, किसी भी दशा में प्रतिदिन रीति-नीति-राजनीति तथा साहित्य पर बतकुच्चन के लिए उसे चाहिए मित्रों-संघतियों की एक टोली, अपने बहुत करीब !
अजीब जीव होता है बिहारी--मेहनतकश, श्रमजीवी और हठी भी! किसी भी काम के लिए तत्पर, यह कहता हुआ--"होइबे नहीं करेगा? अरे, होगा कइसे नहीं?" और बिहार-रत्न कविवर दिनकर लिख भी तो गए हैं--
'ख़म ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड!
मानव जब जोर लगता है,
पत्थर पानी बन जाता है!!'
दिनकरजी की इस ललकार की अनसुनी कर देनेवाला भला बिहारी कैसे हो सकता है?

उस पर तुर्रा ये कि बिहारी अगर ब्राह्मण हुआ तो उसका विलक्षण मिष्टान्न-प्रेम तो जग-जाहिर है ही! कहा गया है न,'विप्रम् मधुरं प्रियं!' इसी कथन का उल्लेख करते हुए एक बार किसी ने कहा था--'पण्डितजी तो ऐसे मिष्टान्न-प्रेमी होते हैं कि गुड़ का एक टुकड़ा कहीं डाल दीजिए, पंडितजी वहीं चिपके मिलेंगे!' मुझे लगता है, भलेआदमी ने बहुत गलत नहीं कहा था। ....

पिछले साल अक्टूबर में, छठ पूजा के बाद, आस लगी रही कि बिहार से कोई-न-कोई आएगा, छठ के ठेकुए लाएगा--पांच-दस मुझे भी प्रसाद के रूप में दे जाएगा। सो, प्रतीक्षारत रहा और पलटते पन्नों की तरह दिन बीतते रहे, बिहार से कोई भलामानुस आया ही नहीं और ठेकुए की लालसा में जी मचलता रहा, आत्मा ऐंठती ही रही।
आख़िरश, एक दिन बिहारी का ब्रह्मतेज जागा, हठधर्मी, श्रमजीवी और स्वाबलम्बी जो ठहरा ! श्रीमतीजी विद्यालय गयी थीं। पूरे घर में मेरा साम्राज्य था। मैंने गुड़ की भेली उठाई। भई, पुणे का गुड़ था--पत्थरदिल था ! तोड़े न टूटता था। मैंने उसे नरमदिल बनाने के लिए धीमी आँच पर पानी में डालकर चढ़ा दिया। बगल के कमरे में टी.वी.ऑन था। बिहार से संबंधित महत्त्व का एक समाचार कानों पड़ा तो मैं दूसरे कमरे में दाखिल हुआ और समाचार सुनाने लगा ! अचानक गुड का ख़याल आया। किचेन में दौड़कर पहुँचा। पत्थरदिल गुड़ तो मोम-सा पिघलकर लेई बन गया था और खौल रहा था। मैंने शीघ्रता से बर्नर बुझाया और आंटे में उसे मिलाकर हाथ जला-जलाकर गूँथने लगा। खोजकर पटनहिया साँचा निकाला और उस पर परिश्रमपूर्वक आंटे की छोटी-छोटी गोलियों को ठेकुए की आकृति में ढालने लगा। जैसे-जैसे गुँथा हुआ आँटा ठंढा होता जा रहा था, वैसे-वैसे वह पथराता जा रहा था। अब तो साँचे पर दबने में भी उसे आपत्ति थी! मेरे हठी और श्रमजीवी मन ने हठ न छोड़ा ! बिहारी के स्वाभिमानी मन में दो ही वाक्य गूँज रहे थे--'तू है बिहारी, तो कर परिश्रम ! हार गया, तो बिहारी कैसा?'

लीजिये हुज़ूर, घंटों श्रम का प्रतिफल हुआ कि अब शक्लो-सूरत से ठेकुए तैयार थे, बस, उन्हें रिफाइंड में डूब-उतरा कर और थोड़ी देर नर्त्तन कर कड़ाही से बाहर आना भर था! श्रीमतीजी के विद्यालय से लौट आने के पहले ही यह कृत्य भी पूरा हुआ! ठेकुए तो देखते ही बनते थे--तले हुए लाल-लाल, सोंधे-कुरकुरे ठेकुए! लेकिन अभी गर्म थे, मुँह में डाल लेने का रिस्क कौन लेता ? सुविज्ञ बिहारी तो हरगिज़ नहीं !!

ठेकुए के शीतल होने की प्रतीक्षा हो ही रही थी कि श्रीमतीजी आ पहुँचीं ! घर में पाँव रखते ही चहकीं--"क्या बना है घर में ? बड़ी सुगंध आ रही है। क्या बनाया है 'मेड' ने ?"
मैंने गौरव से भरकर कहा--ठेकुए बनाये हैं मैंने--खास्ते और कुरकुरे--टुह-टुह लाल!'
श्रीमतीजी को सहसा विश्वास नहीं हुआ, विस्फारित नेत्रों से मुझे घूरते हुए बोलीं--'आपने?'
मेरा जी तो अगराया हुआ था--छाती ठोंकते हुए मैंने कहा--'हाँ भई, मैंने !'
दो-तीन घण्टों बाद ठेकुएजी ठंडे पड़े, एक मैंने, एक श्रीमतीजी ने मुश्किल से खाए। मेरा मन रखने को श्रीमतीजी ने नरमदिली से कहा--'मोयन नहीं डाला क्या? ठेकुआ थोड़ा कड़ा हो गया है।'
मैं भला क्या कहता? 'मोयन' शब्द से पहली बार मुलाकात जो हुई थी!

दूसरे दिन जब ठेकुए बिलकुल ठण्डे पड़ गए। मैं बड़ी हसरत से उनके पास गया। थोड़ी देर तक निहारता रहा उन्हें ! दिखने में तो वे बहुत सुदर्शन थे, आकर्षित करते थे अपनी ओर, किन्तु पुणे के गुड की तरह पत्थरदिल हो गये थे रात-भर में! मन मारकर रह गया, दाँत से उसका एक टुकड़ा भी काट लेना असंभव था ! मेरा सारा उत्साह भी ठण्ढा पड़ने लगा।
सप्ताह-भर में श्रीमतीजी ने ऐलानियाँ घोषणा कर दी कि ये ठेकुए असाध्य-असंभव खाद्य-सामग्री हैं! उन्होंने स्टील का एक बड़ा कटोरदान ठेकुओं से भरकर कबर्ड के किसी एकांत में झोंक दिया और शेष ठेकुओं को एक पॉलिथीन में भरकर कामवाली बाई को दे दिया, इस हिदायत के साथ कि लोढ़े से तोड़-कूचकर अपने बच्चों को खाने को दे! बाई तो खुश हुई, लेकिन मिष्टान-प्रेमी बिहारी का मन मुरझा गया! वह सोचता ही रहा कि जिन ठेकुओं के लिए स्वयंपाकी बना, उनकी रक्षा वह कैसे करे?
लेकिन एक-डेढ़ महीना बीत गया, ठेकुए तो मन से उतर ही गए थे, यादों की गलियों में कहीं खो भी गए।

वह जनवरी का महीना था! उस दिन भी घर पर मेरा ही आधिपत्य था। जैसे चूहा किसी खाद्य-सामग्री के लिए घुरियाता है, ठीक वैसे ही सुबह के जलपान के बाद किसी मीठी सामग्री की तलाश में भटकता हुआ मैं कबर्ड में रखे कटोरदान तक जा पहुँचा! बहुत दिनों के बाद उन्हें देखकर मन में हर्ष की लहर दौड़ गई! मैंने एक ठेकुआ उठाया और बांयीं दाढ़ से तोड़ने की कोशिश की। वज्र ठेकुआ काहे को टूटता? मैंने बायीं दाढ़ से भरपूर जोर लगाया और तभी दायीं दाढ़ में कनपटी के पास नगाड़े बज उठे--'कड़-कड़-कड़'! दिन में तारे देखने का सुख तो मिला, लेकिन असहनीय पीड़ा भी हुई! दायें कल्ले पर हाथ रखकर अपनी चौकी पर धम्म-से जा बैठा।
दोपहर में जब श्रीमतीजी आयीं, तब तक तो दायें जबड़े पर सूजन आ गयी थी! उन्होंने मेरी हालत देखी तो दाँतों तले अपनी ऊँगली दबा ली, फिर गुस्से से बोलीं--'इन नामुराद ठेकुओं पर मुँह मारने की क्या जरूरत थी? मैं तो इन्हें फेंकने ही वाली थी!' मैं अपने मिष्टान्न-प्रेम पर शर्मिन्दा होने के सिवा और कर भी क्या सकता था!
दूसरे दिन दन्त-चिकित्सक के पास गया और महीने-भर की दवाएँ लेकर लौट आया! दवाओं के सेवन से तात्कालिक आराम तो हुआ, लेकिन मेरा मुँह तो कड़कड़डूमा की अदालत बन गया है !


मित्रो, वह एक अकेला ठेकुआ मुझे कम-से-कम एक हजार रुपये का तो पड़ ही गया और जबड़े का दर्द अपनी जगह कायम है ! आज भी कुछ खाता हूँ तो दायाँ जबड़ा 'कड़कड़-कड़कड़' बोलता है। लगता है, लोहे के चने चबा रहा हूँ! लेकिन बिहारी तो बिहारी ठहरा--ज़िद्दी, श्रमजीवी और संघर्षशील! उसका पान और ठेकुआ-प्रेम आज भी यथावत बना हुआ है !...लेकिन, सोचता हूँ, क्या ज़रूरी था मेरी दाढ़ तोड़ के जाना उसका? ....जाने अब कब मिलेगा पथराए ठेकुओं की जगह मीठा, मुलायम, खस्ता और कुरकुरा ठेकुआ...!
[--आनन्दवर्धन ओझा]

रविवार, 31 जनवरी 2016

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (४०)

['बंद आँखों का वह चाक्षुष-दर्शन'…]

पिताजी से पूछे जानेवाले प्रश्नों की फेहरिस्त लम्बी होती जा रही थी। उनसे संपर्क की इच्छा बार-बार मन में उठती थी, जिसे मैं मन में ही दबा देता था। मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी कि प्लेंचेट बोर्ड बिछाकर बुलाऊँ उन्हें ! डर था कि कहीं बोर्ड पर ही बुरी तरह डाँट न खानी पड़े। पिताजी को गुज़रे सवा साल बीत गए थे, इस बीच उनको स्वप्न में कई बार देखा था, बातें की थीं, विलाप किया था; किन्तु प्लेंचेट पर बुलाकर बात करने की कभी हिम्मत नहीं हुई।

एक रात गहरी नींद सोया और विचित्र स्वप्न-दर्शन हुआ। मैंने देखा--
"एक प्रभामयी अप्सरा ने सोते से मुझे जगाया। मैं हक्का-बक्का उठ बैठा, कुछ समझ न पाया। अप्सरा ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा--'चलो मेरे साथ !' क्षण-भर में काले-लम्बे-घुँघराले केशोंवाली अप्सरा ने मेरा हाथ थाम लिया और मुझे अपने साथ अनंत आकाश में लेकर उड चली। उसके आसपास बिखरी हैं ज्योतिमयी रश्मियाँ! कुंतल केश-राशि हवा में लहरा रही है। उसका मुख मेरी विपरीत दिशा में है और मैं लगातार उससे पूछ रहा हूँ--'कौन हैं आप ? मुझे कहाँ लिए जा रही हैं? मेरी ओर देखिये तो सही, ताकि मैं जान सकूँ, कौन हैं आप देवि ?'
मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना और मुझसे मुखातिब हुए बिना, वह उड़ी जा रही है, मुझे भी अपने साथ हवा में लहराते हुए। मैं आतंकित हो रहा हूँ। मेरे पाँव अधर में हैं, कहीं अड़ जाने का ठौर भी नहीं और वह तेजोमयी कुछ सुनती ही नहीं! विवशता आर्त्त बना देती है, मैं रोने लगता हूँ। मेरे रुदन का स्वर सुनकर वह बोल पड़ती है--'तुम्हें अपने पिताजी से कई प्रश्न पूछने हैं न? उन्हीं के पास ले जा रही हूँ तुम्हें, रोते क्यों हो? चलो मेरे साथ, अपने मन के सारे प्रश्न पूछ लेना और उन दो श्वेत-वस्त्रधारियों के बारे में भी--याद से!'
मैंने कहा--'पहले आप यह बतायें, आप कौन हैं?'
हवा में तरंगित महिला बोल पड़ी--"न जाने कितनी बार यही सवाल मुझसे कर चुके हो तुम! और कितनी बार पूछोगे?'
उसका उत्तर सुनते ही मुझे वृश्चिक-दंशन-सी अनुभूति हुई। मैंने तड़पकर पूछा--'क्या तुम चालीस दुकानवाली ?'
वह हँसकर बोली--'मेरे सिवा और कौन?'
मैंने कहा--'आज तक बातें ही होती रही हैं तुमसे। एक बार मेरी तरफ मुड़ो, देखूँ तुम्हें, कैसी हो तुम?'
चालीस दुकानवाली ने हँसते हुए कहा--'सुनो, मुड़ तो मैं जाऊँ, लेकिन तुम देख नहीं सकोगे मुझे!'
मैंने पूछा--'वह क्यों?'
उसने कोई उत्तर नहीं दिया और अचानक वह पलटी। सच में, मेरी आँखें चुँधिया गयीं। आँख उसके चेहरे पर ठहरी ही नहीं। उसके मुख-मण्डल से प्रकाश-पुञ्ज छिटक रहा था, हजारों रश्मियाँ बिखर रही थीं। मैंने एक हाथ से अपनी दोनों आँखें ढँक लीं। उसकी हँसी का स्वर फिर कानों में पड़ा, वह कह रही थी--'मैंने कहा था न, तुम देख नहीं सकोगे मुझे!'
मैं चकित-विस्मित था ! सोच रहा था, उसे देखना भाग्य में ही नहीं है शायद... !

वह मुझे किसी अपूर्व लोक में ले गयी। और, बहुत दूर से ही, इशारे से, मुझे दिखाती हुई बोली--'वह देखो, तुम्हारे पिताजी वहाँ उस वृक्ष के नीचे विराजमान हैं और उसके आगे जो लोक है, वहीं रहते है वे दो श्वेतवस्त्रधारी ! पिताजी से उनके बारे में जरूर पूछना और लौटकर मुझे बताना ! उनके बारे में जानने की मुझे भी उत्कंठा है। आगे अब तुम्हें अकेले जाना है। इसके आगे मेरी गति नहीं, मैं वहाँ नहीं जा सकती, वह मेरे लिए वर्जित क्षेत्र है ! जाओ...!' इतना कहकर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया था।
मैं आँखें फाड़कर उधर देखता हूँ, जिधर चालीस दुकानवाली ने इशारा किया था। खासी दूरी पर श्वेत वस्त्र में लिपटे जाज्वल्यमान पिताजी मूर्तिमान दिखे। उनपर दृष्टि पड़ते ही मन में भयानक उत्क्रांति मची। मैं चालीस दुकानवाली को वहीं छोड़ उनकी तरफ दौड़ पड़ा और पिताजी के समीप पहुँचकर विलाप करता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा।"

मेरा तड़पकर गिरना ही निद्रा-भंग का कारण बना। जागकर भी देर तक अलस-भाव से बिस्तर पर पड़ा रहा और मन में उथल-पुथल मची रही। यह समझने और मान लेने में वक़्त लगा कि वह स्वप्न था। जानता हूँ, स्वप्न आँखों में टिककर लम्बे समय तक रहता नहीं, रहे तो वह स्वप्न काहे का ? स्वप्न तो शीघ्र मिट जाता है, किन्तु यह स्वप्न तो पिछले बीस वर्षों से आँखों में यथावत ठहरा हुआ है। इसकी स्मृति कभी धुँधली नहीं हुई। सच है, बंद आँखों का वह अद्भुत चाक्षुष-दर्शन था।....

अब तो चालीस दुकानवाली की उखड़ी-उखड़ी-सी स्मृति अवशिष्ट रह गई है और अनुत्तरित रह गए हैं वे प्रश्न, जिनकी बनायी थी फेहरिस्त! उन दो श्वेत-वस्त्रधारियों को अपना ही देव-पितर मानकर संतोष कर लिया है मैंने! सपनों का पीछा तो सभी करते हैं, मैं भी कर आया; लेकिन हवाओं का पीछा कौन करे--कब तक और कैसे.. ?
इस परा-विलास से मुक्त हुए ३०-३१ वर्ष हो गए हैं, लेकिन मन में जड़ जमाकर बैठी रही हैं स्मृतियाँ! आज उन्हें भी कागज़ पर उतारकर भार-मुक्त हो गया हूँ!...

फिर सोचता हूँ, स्मृतियाँ भी कितनी अक्षुण्ण हैं? कितना दीर्घ है स्मृतियों का जीवन? मस्तिष्क की शिराओं में जब तक रक्त-संचार है, जब तक दिल की धड़कनें गतिशील हैं, जब तक श्वास की गति अबाध है--उनमें स्मृतियाँ पल रही हैं ! और जैसे ही इन चेष्टाओं में व्यतिक्रम होगा, स्मृतियाँ भी विलुप्त हो जायेंगी! जो कल था, वह आज नहीं है; जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। कितनी पीढ़ियाँ आयीं और चली गयीं तथा ले गयीं अपने साथ उनके अनुभव, संवेदन; यादें उनकी-- कितनी-कितनी स्मृतियाँ उनके साथ ही मिट गयीं !... लगता है, स्मृति-बोध भी अपराध-बोध जैसा ही होता है, लेकिन शायद मैं कुछ गलत कह गया।... अपनी युवावस्था के घनिष्ठ कवि-मित्र रामकुमार 'कृषक' की कुछ पंक्तियाँ, भिन्न सन्दर्भ में, किञ्चित स्पर्शाघात के साथ, यहां रखना चाहूँगा--
"तुम अगर स्मृति हो
तो मेरा मस्तिष्क तुम्हारा कृतज्ञ है,
संवेदन हो तो हृदय
और लहू हो तो रोम-रोम!....
जब तक मैं हूँ,
तुम भी जीवित रहोगी...
जैसे स्मृति, जैसे संवेदन,
जैसे लहू...!"

इस अछोर संसार में और अनन्त आकाश-गंगाओं में जीवन न जाने कहाँ-कहाँ अपनी मृत्यु-यात्रा कर रहा है, कौन जानता है? विज्ञान भी इस अनुसंधान में लगा है। उसके सामने चुनौतियाँ बहुत हैं; जाने हुए से अजाना बहुत है, स्पष्ट आलोक से रहस्य का अन्धकार बहुत है ! और, समय-काल ढूंढता ही रहेगा अनसुलझे सवालों के उत्तर...!

अतीत की मञ्जूषा से स्मृतियों की धरोहर को निकालकर मैंने उन्हें इस दस्तावेज़ में मूर्त्त करने की चेष्टा की है। आप विश्वास करें, सुदूर अतीत में लौटने की मेरी यह यात्रा सचमुच कष्टकर ही थी। किन्तु, विचित्र बात है, यह कष्ट सहना भी सुखानुभूति देता रहा है... !
(समाप्त)

सोमवार, 25 जनवरी 2016

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (३९)

['स्मृतियों को समर्पित थे वे अश्रु-कण'…]

१६ नवम्बर १९९५। संध्या रात्रि का परिधान पहनने लगी थी। पिताजी कई घण्टों से मौन थे और खुली आँखों से कमरे से आते-जाते, बैठे-बोलते हमलोगों को चुपचाप देख रहे थे--निश्चेष्ट! शारीरिक यंत्रणाओं और अक्षमताओं ने उन्हें अवश कर दिया था। रात के आठ बजे थे, तभी कथा-सम्राट प्रेमचंदजी के कनिष्ठ सुपुत्र अमृत रायजी सपत्नीक पधारे। वे किसी प्रयोजन से पटना आये थे और मित्रों से यह जानकार कि पिताजी सांघातिक रूप से बीमार हैं, उन्हें देखने चले आये थे। अमृतजी पिताजी के सिरहाने कुर्सी पर बैठे और उनकी गृहलक्ष्मी सुधाजी (सुभद्रा कुमारी चौहान की सुपुत्री) पिताजी के पायताने। वे दोनों प्रायः दो घण्टे तक बैठे रहे और हमलोगों से बातें करते रहे। पिताजी पूरे समय मौन ही रहे, बस एक वाक्य मुझसे बोले--'इनको चाय पिलाओ।'

अमृत रायजी पापाजी (मेरे श्वसुर) से और साधनाजी सुधाजी से बातें करती रहीं। मैं बीच-बीच में दोनों के प्रश्नों के उत्तर देता रहा। दो घंटे में पिताजी एकमात्र वाक्य के सिवा कुछ नहीं बोले, चुपचाप आँखें खोले सबकी सुनते रहे। चाय के साथ नमकीन और शाम के वक़्त अभय भैया की लायी मिठाई (प्रसाद) भी उनके सामने रखी गई। मिठाई की प्लेट देखकर अमृतजी बोले--'ये मिठाइयाँ क्यों?'
उनका प्रश्न सहज-स्वाभाविक था। जहां इतना दुःख-दैन्य, रोग-शोक पसरा हो, वहाँ मिष्टान्न कैसे? मैंने उन्हें साधनाजी की नियुक्ति और अपनी विवाह की वर्षगाँठ के बारे में विस्तार से बताया। दो श्वेतवस्त्रधारियों के आगमन और अग्रिम सूचना देने की बात भी उन्हें बतायी। सारी बात सुनकर अमृतजी बहुत चकित नहीं दिखे, मुस्कुराकर बोले--'वे दो श्वेतवस्त्रधारी आपके ही कोई देव-पितर होंगे, जिनकी मुक्तजी पर अगाध प्रीति रही होगी। वे मुक्तजी की कृपा-पात्रता के विश्वासी देव होंगे और उन्होंने मुक्तजी के मुक्त-मन को ही इस पूर्व सूचना का अधिकारी माना होगा। मुक्तजी के मनःलोक में घुमड़नेवाली चिंताओं के निवारण के लिए ही वे अग्रिम सूचना देने आये होंगे। मैंने ऐसे कई देशी-विदेशी किस्से पढ़े हैं और जीवन में ऐसे एक-दो अनुभव मुझे भी प्राप्त हुए हैं। मेरी सलाह है कि आपलोग उन्हें अपना परम हितैषी और आराध्य-देव मानकर नमन करें।'
अमृत रायजी की बात सुनकर मैं विचारमग्न हो उठा--तो क्या वे श्वेतवस्त्रधारी मेरी ही पूर्व पीढ़ी के कोई सिद्ध-शिखर-पुरुष थे? क्या उन्होंने मुझे चालीस दूकानवाली से विलग करने में ही मेरा कोई हित देखा था? तत्काल किसी निश्चय पर पहुँच पाना मेरे लिए कठिन था। मेरे मन में उनकी यह बात घुलती रही और मैं सोचता रहा कि वह स्निग्ध, स्नेही, कोमल मन की चंचला, मेरी हित-चिंता में निमग्न और स्वयं पीड़ित चलीस दुकानवाली आत्मा मेरा कौन-सा अहित करनेवाली थी कि मेरे देव-पितरों ने उसे मुझसे मिलने नहीं दिया ? मेरा मन तो दुविधा में ही पड़ा रहा...!

दो घण्टे बाद अमृतजी जाने लगे तो उन्होंने पिताजी को झुककर प्रणाम किया। पिताजी ने हाथ बढ़ाकर उनके बद्ध हस्त-द्वय को थाम लिया, बोले कुछ नहीं। फिर पिताजी के पायताने से उठते हुए सुधाजी ने उनके चरण छुए और पिताजी के सिरहाने करबद्ध आ खड़ी हुईं। पिताजी ने अपना बायाँ हाथ बढाकर उनके हाथों को थाम लिया और थोड़ी कठिनाई से कहा--'इतना बता दो, तुम वही सुधा हो न?'
सुधाजी बोलीं--'हाँ मामाजी, मैं वही हूँ, सुभद्रा...!' उनकी आवाज़ काँप रही थी और आँखें डबडबा आयी थीं।
पिताजी ने सुधाजी का वाक्य पूरा होने न दिया, बीच में ही बोल पड़े--'बस, बस! और कुछ न कहो। थोड़ा झुको, तुम्हारी पीठ पर थपकी दूँ मैं... ।'
सुधाजी झुकीं और पिताजी ने दायें हाथ से उनकी पीठ पर स्नेह-पूरित थपकियाँ दीं और हमने पूरी बीमारी में पहली बार उन्हें विह्वल होते देखा। उनकी आाँखों से आँसू की दो बूँदें लुढ़ककर बह चलीं। सुधाजी पिताजी के पास से सिसकते हुए हट गयीं।
अवांतर कथा यह थी कि सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहानजी पिताजी की मुँहबोली बहन थीं। उनकी यत्र-तत्र बिखरी हुई कविताओं को एकत्रित करके पिताजी ने ही पहली बार अपनी प्रकाशन-संस्था 'ओझा-बंधु आश्रम', इलाहबाद से 'मुकुल' के रूप में पुस्तकाकार प्रकाशित किया था कभी....। इस प्रयत्न में वह कई बार इलाहबाद से जबलपुर गए थे और सुभद्राजी के घर पर ही ठहरे थे। यह उन दिनों की बात है, जब स्वतंत्रता-संग्राम में संलग्न सुभद्राजी के पति, प्रसिद्ध वकील, चौहान साहब जेल में थे और घर की दशा अच्छी नहीं थी। उन्हीं जबलपुर-प्रवासों में पिताजी ने सुधाजी को बालपन में देखा था।.... (इन सारे प्रसंगों को पिताजी ने अपने संस्मरणों की पुस्तक 'अतीतजीवी' में 'मेरी बहन और हिंदी की ऊर्जा : सुभद्रा कुमारी चौहान' शीर्षक के अंतर्गत लिपिबद्ध किया है)... और, अब इतने वर्षों बाद वह पिताजी के सामने एक बुज़ुर्ग महिला के रूप में आ खड़ी हुई थीं। उस दीन-कातर दशा में पिताजी के मन में जाने क्या-क्या उमड़ा-घुमड़ा होगा--कौन जानता है? ये दो बूँद आँसू उन्हीं स्मृतियों का प्रतिफल थे, जो पिताजी के नयन-कोरों से बह चले थे।....

२ दिसंबर, १९९५ की सुबह पिताजी ने पास बुलाकर मुझसे स्पष्ट कहा था--'ये सारी औषधियां बंद कर दो। आज मैं जाऊँगा--ये सारी किताबें छोड़कर आज मैं जाऊँगा !'
और हुआ भी ऐसा ही। प्रायः १६ दिनों की शारीरिक यंत्रणा के बाद पिताजी ने शरीर के साथ ही पीडाओं से भी मुक्ति पायी थी।... उनकी 'इलाहाबादवाली भाभी' ने ठीक ही कहा था--'ई तकलीफ़ो कौन रही!'... न पिताजी रहे, न तकलीफें रहीं!... पिताजी जीवन-मुक्त हुए... !

पिताजी के विछोह की दारुण पीड़ा साल भर तक मुझे और परिवारजनों को सालती रही ! साल-भर बाद जब मन की उद्विग्नता कुछ कम हुई और हृदय में लावा-सा धधकता शोक किंचित शिथिल हुआ, तो कई बार इच्छा हुई कि पिताजी से सम्पर्क साधूँ, बुलाऊँ उन्हें अपने प्लेंचेट के बोर्ड पर और पूछूँ उनसे कि "परालोक में क्या उनकी मुलाक़ात 'दो श्वेतवस्त्रधारियों' हुई कभी? कौन थे वे दोनों? वहाँ उनकी 'इलाहाबादवाली भाभी' भी मिलीं क्या? और, क्या कभी 'चालीस दुकानवाली' नाम की कोई आत्मा तो नहीं मिली उनसे?" मेरी यह जिज्ञासा प्रबल थी, लेकिन प्लेंचेट करके पिताजी को बुलाने में मुझे बड़ा संकोच होता था। इसके दो प्रमुख कारण थे--एक तो पिताजी इस संपर्क-साधन के पक्षधर नहीं थे और इसे दुविधा की दुनिया कहा करते थे, दूसरा यह कि इन प्रयत्नों को छोड़े हुए मुझे प्रायः दस वर्ष हो गए थे। फिर उसी 'दुविधा की दुनिया' में लौटने का मेरा न मन होता था, न साहस। मैं सोचता ही रहा, लेकिन पिताजी से कभी संपर्क साध न सका।
और, दिन पर दिन बीतते गए....!
(क्रमशः)

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (३८)

['विषाद की छाया में सच हुआ स्वप्नादेश'…]

पिताजी की शारीरिक अक्षमता बढ़ती जा रही थी, हमारा सारा ध्यान उन्हीं की परिचर्या में लगा था, दो श्वेतवत्रधारियों का चिंतन करने का अवकाश भी कहाँ था? पिताजी की शोचनीय दशा की ख़बर पाकर स्थानीय और दूर-दराज़ के परिजन घर आने लगे थे। मेरी सासुमाँ और श्वसुर मध्यप्रदेश से आ गये थे। घर भरा हुआ था। पिताजी आगंतुकों को पूरे आत्मविश्श्वास से बताते कि साधना की नियुक्ति केंद्रीय विद्यालय में हो गई है और आगंतुक साधनाजी को बधाइयाँ देने उनके पास पहुँच जाते। साधनाजी क्षुब्ध और निरीह हो जातीं; उन्हें कहतीं कि बाबूजी को भ्रम हुआ है, ऐसा कुछ हुआ नहीं है; लेकिन यह सिलसिला तो चलता ही रहा। पिताजी बार-बार मुझसे पूछते कि मैं साधनाजी के लिए साड़ियाँ खरीद लाया या नहीं? मैं उन्हें कहता कि आप स्वस्थ हो जाएँ, फिर मैं साड़ियाँ भी ले आऊँगा उनके लिए। कहने का तात्पर्य यह कि पिताजी ने अपनी कही बात का दृढ़ निश्चय मन में बद्धमूल कर रखा था और उसे बीमारी की शोचनीय दशा में भी बार-बार दुहराते जा रहे थे।
जिन्होंने जीवन-भर अंग्रेज़ी दवाओं से परहेज किया था, उनके शरीर में वे ही दवाएं भरी जाने लगीं। डॉक्टर, औषधि, इलाज, परीक्षणों का दौर चल रहा था। इन एलोपैथिक औषधियों को त्याज्य माननेवाले पूज्य पिता पर उनका दुष्प्रभाव ही होना था। तभी, एक दिन अचानक पिताजी ट्रांस में चले गए और असम्बद्ध बातें बोलने लगे; लेकिन साहित्य-संसार और युवावस्था तक सेवित इलाहाबाद से जुड़ी बातें! मेरे मन-प्राण की शक्ति चुक रही थी, वह पत्ते-सा काँप रहा था--पिताजी ७६ घंटे से जाग रहे थे और निरंतर कुछ-न-कुछ बोलते जा रहे थे। कभी कवि-सम्मेलनों का आयोजन करते और दिग्गज रचनाकारों को काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित करते। कभी अपने बचपन के दिनों की याद करते और कभी अपने मित्रों से बातें करने लगते। मैं उनकी छाया बना उनके आसपास ही रहता और मूक-दर्शक बना, सिर धुनता...!
पूरे छिहत्तर घंटे बाद पिताजी ट्रांस से बाहर आये। उन्होंने मुझे आवाज़ दी। तिथि तो ठीक-ठीक स्मरण में नहीं रही, लेकिन वह भी सुबह का ही समय था, तकरीबन आठ-साढ़े आठ का। मुँहअँधेरे थोड़ी बारिश हुई थी। मिट्टी के भीगने की सोंधी महक सर्वत्र फैली हुई थी। मैं उनके सिरहाने जा खड़ा हुआ, बोला कुछ नहीं। मुझे देखते ही उन्होंने कहा--'बाहर बारिश हुई है क्या?'
यह सुनते ही मेरी जान में जान आयी, मैं आश्वस्त हुआ कि पिताजी की चेतना लौट आयी है और इतने घंटों तक ट्रांस में रहने का कोई दुष्प्रभाव उनके मस्तिष्क पर नहीं पड़ा है। मैंने हामी भरी, तो पिताजी बोले--"जानते हो, 'इलाहाबादवाली भाभी' आयी थीं। विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ, मैं निद्राभिभूत नहीं था। ब्राह्ममुहूर्त के ठीक पहले वह सचमुच आयी थीं।"
अपने पायताने छत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने अपनी बात जारी रखी--"सस्मित दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार की मुद्रा में थीं। केश खुले थे, श्वेत साड़ी में थीं। मैंने उनसे कहा--'मैं इतनी तकलीफ में हूँ और तुम मुस्कुरा रही हो?' भाभी इलाहाबादी में बोलीं--'ई तकलीफ़ो कौन रही! ... हम इधर से जात रही तो सोचा तोंसे मिल लेई!" ....
मैं, मेरा परिवार ही नहीं, हिंदी-साहित्य पढ़ने-लिखनेवाला सुधी-समाज भी जानता है कि जब पिताजी 'इलाहाबादवाली भाभी' का नामोल्लेख करते थे, तो उनका अभिप्राय कविवर बच्चनजी की प्रथम पत्नी पूजनीया श्यामाजी से होता था। सन १९३६ में ही उनका देहावसान हो गया था, लेकिन साठ वर्षों की दीर्घावधि में उनकी आत्मा ने चार बार पिताजी के गाढ़े वक़्त में परालोक से आकर हस्तक्षेप किया था, उनकी सहायता की थी, सांत्वना दी थी। 'मरणोत्तर जीवन' नामक आलेख में ऐसी तीन घटनाओं की पिताजी ने विस्तार से चर्चा की है। इस अंतिम हस्तक्षेप के बारे में कुछ लिखने का मौक़ा उन्हें क्रूर काल ने नहीं दिया था। ...
बहरहाल, पिताजी से यह वृत्तान्त सुनकर मैं आश्वस्त हुआ था कि अब उनकी तकलीफें दूर हो जायेंगी और वह पहले की तरह स्वस्थ-प्रकृतिस्थ हो जायेंगे। तब मोही मन यह सोच भी न सका था कि जब शरीर ही न रहेगा, तो तकलीफें भी न रहेंगी।...
६ नवम्बर की सुबह पधारे दो श्वेतवस्त्रधारियों की कथा के बाद, परालोक से हस्तक्षेप की यह दूसरी कथा थी, जो पिताजी ने रुग्णावस्था में मुझे सुनाई थी। हम सभी हतचेत, संज्ञा-शून्य और विस्मित हो रहे थे। इसके बाद प्रभु-कृपा की याचना करते दस दिन और बीत गए थे।
फिर आ पहुँचा १६ नवम्बर, १९९५ का दिन। वह मेरे विवाह की वर्षगांठ का दिन भी था। लेकिन मन-प्राण और हमारी समस्त चेतना पिताजी की चिंता में लगी थी।
शाम हुई, चार बज रहे होंगे, मैं रात्रि-जागरण से क्लांत, भोजन के बाद थोड़े विश्राम के लिए लेटा ही था कि मेरी आँख लग गयी। तभी डाक से एक राजिस्टर्ड पत्र आया। मेरी श्रीमतीजी ने लिफ़ाफ़ा देखा और प्रेषक के नियत स्थान पर यह पढ़कर कि वह भुवनेश्वर से आया है, रोमांचित हो उठीं। उन्होंने मेरे पास आकर मुझे जगाया तो मैंने खीझकर कहा कि 'थोड़ा सो लेने दो भई!' वह मन की उत्सुकता पर अंकुश लगा न सकीं, बगल के कमरे में बैठे अपने पिताजी के पास गयीं और उन्हें लिफ़ाफ़ा देते हुए बोलीं--'देखिये न पापाजी, क्या है इसमें?'
उनके पापाजी ने लिफ़ाफ़ा खोला, पढ़ा और घर में तहलका मच गया--वह साधनाजी का नियुक्ति-पत्र था, जिसके अनुसार उड़ीसा संभाग के केंद्रीय विद्यालय में उन्हें प्रशिक्षित शिक्षिका (हिंदी) के रूप में पदभार ग्रहण करना था।
नियुक्ति-पत्र तो पढ़ा गया, लेकिन देर शाम को जब उसे पूरे मनोयोग से दुबारा देखा-पढ़ा गया तो यह जानकर हम सभी सिहर उठे कि पत्र के शीर्ष पर ६ नवम्बर तिथि पड़ी हुई थी। यह वही तिथि थी, जिस दिन ब्राह्म-मुहूर्त में दो श्वेतवस्त्रधारियों ने पिताजी को इस नियुक्ति की अग्रिम सूचना दी थी। फिर तो घर-भर में अफ़रा-तफ़री मच गयी। हम सभी भागे-भागे पिताजी के कक्ष में गए, उन्हें यह सुसंवाद सुनाया। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूरी आश्वस्ति के भाव से कहा था--'मुझे क्या बताते हो? मैंने तो उसी दिन कह दिया था।'
श्वेतवस्त्रधारियों का कथन यथारूप सत्य सिद्ध हुआ था और पूरा घर और सभी आगन्तुक हैरत में थे।
शाम ५ बजे के आसपास मेरे ममेरे बड़े भाई अभयशंकर पराशर पिताजी को देखने घर आये। उन्हें भी नियुक्ति का समाचार मिला तो वह बाहर जाकर मिठाइयाँ ले आये और साधनाजी से बोले--'इतनी प्रसन्नता की खबर आयी है, घर में मिष्टान्न तो आना ही चाहिए। जाओ, ठाकुरजी को भोग लगाकर सबको प्रसाद दो!'
मुझे अच्छी तरह स्मरण है, मिष्टान्न-प्रेमी पिताजी ने प्रसाद (मिष्टान्न) का वही अंतिम ग्रास ग्रहण किया था।
उस दिन जग्गनियन्ता की यह प्रवंचना कुछ समझ न आई। जीवन में ऐसे अवसर कम ही आते हैं, जब एक ओर विषाद की गहरी छाया हो और दूसरी ओर स्तंभित प्रसन्नता ! ६ नवम्बर की सुबह पिताजी को दिया गया दो श्वेतवस्त्रधारियों का स्वप्नादेश सत्य होकर साकार खड़ा था और हम सभी मुमूर्षुवत हतप्रभ, स्थिर-जड़ थे। वे दोनों श्वेतवस्त्रधारी तो अपने दिव्यलोक को चले गए थे और दे गए थे हमें हर्ष-विषाद की मिश्रित सौगात। उस दिन विषाद और हर्ष को हमलोगों ने एक-दूसरे के ठीक सामने खड़ा देखा था--परस्पर घूरते हुए !....
(क्रमशः)

रविवार, 17 जनवरी 2016

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (३७)

['फिर आ पहुंचे दो श्वेतवस्त्रधारी देवदूत'…]

मित्र के घर देर से जागा और एक कप चाय पीकर दूसरे मित्र के घर गया। वह मुझे देखते ही शर्मसार हुए, कहने लगे--'कल श्रीमतीजी ने बहुत बखेड़ा कर दिया था। बहुत दुखी हूँ यार कि कल रात मैं आ नहीं सका ! ये बताओ, संपर्क हुआ क्या? समाधान का कोई सूत्र तुम्हें मिला क्या?'
मैं उन्हें क्या बताता, बस इतना भर कहा कि 'तुमने जिनका आह्वान करने को कहा था, वे तो आये नहीं; लेकिन चालीसदुकानवाली आत्मा ने मुझे बताया है कि तुम्हारी पत्नी को किसी प्रकार की प्रेत-बाधा नहीं है। उनका बहुत प्रेम और गहरी सहानुभूति से परिपालन किया जाए तथा किसी योग्य चिकित्सक से उनका इलाज करवाया जाए। वह स्वस्थ हो जाएंगी।'
उनकी शक़्ल पर आते-जाते भावों के आलोक में मैंने परिलक्षित किया कि वह बहुत संतुष्ट नहीं थे। मुझे अपने घर लौटना था, सिर चकरा रहा था मेरा! उनका जलपान का आग्रह ठुकराकर मैंने प्रस्थान किया।

चित्त पर एक अवसाद छाया हुआ था और चालीस दुकानवाली की बातें मेरे चेतन-अवचेतन में निरंतर गूँज रही थीं। हमारी अवधारणाएँ किस हद तक ग़लत, सत्य से कोसों दूर और कल्पित-निर्मित होती हैं, हो सकती हैं--यह पिछली रात की वार्ता से सिद्ध हो चुका था। मैं और चालीस दुकानवाली--हम दोनों अपनी-अपनी कल्पना के संताप से ८-९ वर्षों तक विकल रहे थे और जब सत्य निरावृत्त हुआ तो चकित-विस्मित रह गए थे। जब हमारे अवगुंठन का तिलस्म टूटा, तब मन का बोझ हल्का तो हुआ था, लेकिन एक नयी त्रासद पीड़ा अपनी जड़ें जमा चुकी थी और वह थी-- चालीस दुकानवाली का 'अलविदा' कह जाना। मुझे विश्वास हो चुका था कि अब उससे कभी संपर्क-संवाद न हो सकेगा। उसे उधार की ओढ़ी हुई शकल में नहीं, यथारूप देख पाना कभी नसीब न होगा--मेरी यह पीड़ा बड़ी थी। मेरी अंतरात्मा पर छाया हुआ यह अवसाद दीर्घजीवी भी हुआ। जिसे मैं अपनी स्मृतियों के प्रकोष्ठ से खुरचकर कभी हटा न सका।
समय बड़ा आनंदी प्रवाह है। पानी-सा बहता जाता है--सबों को उनके हिस्से का सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, आनंद-उमंग, राग-विराग और रोग-शोक बाँटता, निर्विकार भाव से, अप्रतिहत। वह किसी भी भाव-प्रभाव से निरपेक्ष होता है। वही समय अवसाद-विराग के साथ एक जटिल प्रश्न की सौगात दे गया कि 'वे दो श्वेतवस्त्रधारी कौन थे? मुझे चालीस दुकानवाली से अलग रखने के पीछे उनका अभिप्राय क्या था? इस प्रश्न का कोई उत्तर पाना मेरी शक्ति-सीमा से परे था।

इसके बाद, संपर्क-साधन और परा-भ्रमण से मुझे ऐसा विराग हुआ कि मैंने इसे अंतिम नमस्कार किया और अपने यन्त्र-तंत्र समेटकर एक किनारे रख आया। मुझे वर्षों पूर्व पिताजी के कथन की सत्यता समझ में आई और उस पर यक़ीन होने लगा कि यह सचमुच दुविधा की अनोखी दुनिया है। इस दुनिया में भटकने का लाभ क्या और हश्र क्या? किसी एक राग की डोर से बंध जाना और आत्यंतिक अवसाद का प्रसाद पाना? मैंने उफ़ और तौबा एकसाथ की।
उसके बाद दीर्घ काल तक मैंने किसी अनुनय-आग्रह का मान न रखा और परा-जगत से विरत रहा, लेकिन पिताजी का मित्र-मंडल बहुत बड़ा था। पिताजी के मित्र अर्थात मेरे बुज़ुर्ग और आदरणीय ! बाद के दस वर्षों के प्रसार में ऐसे मात्र एक-दो अवसर ही आये, जब विवश हो कर और विनयपूर्वक यह निवेदन करते हुए भी कि यह सब मैं छोड़ चुका हूँ, मुझे सम्पर्क-साधन करना पड़ा था; लेकिन उनसे संतोषजनक परिणाम न मुझे मिले थे और न आग्रही बुज़ुर्ग को।
समय अपनी ही गति से उड़ा जा रहा था और उसने जीवन के दस वर्ष चुरा लिए थे। वर्ष १९९५ आ पहुंचा था। मेरी श्रीमतीजी की बड़ी इच्छा थी कि वह नौकरी करें। उन्होंने अनेक प्रयत्न भी किये थे और केंद्रीय विद्यालय में एक शिक्षिका की पद-प्राप्ति के लिए भुवनेश्वर संभाग में आयोजित अंतर्वीक्षा में सम्मिलित हो आयी थीं। मेरी दोनों बेटियां बड़ी हो रही थीं--बड़ी बेटी को इसी वर्ष दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में सम्मिलित होना था, जबकि छोटी बिटिया आठवीं कक्षा की छात्रा थी। सुख-शान्ति से दिन व्यतीत हो रहे थे। पिताजी मानसिक रूप से अविकसित मेरी छोटी बहन की सेवा-सुश्रुषा और अपने लिखने-पढ़ने में व्यस्त रहते तथा मैं 'आस्था प्रकाशन' की देख-सँभाल में।

उन्हीं दिनों की बात है, अचानक काल-गति विषम हुई। अक्टूबर १९९५ में पिताजी बीमार हुए और अनेक उपचार के बाद भी उनका स्वास्थ्य गिरता ही चला गया। उनका शरीर दिन-प्रतिदिन छीज रहा था, अशक्तता बढ़ती जा रही थी और घर-भर का मन आशंकाओं से भरने लगा था। इसी वर्ष जनवरी में पिताजी अपने जीवन का पचासीवाँ वसंत देख आगे बढ़े थे और पूरी तरह स्वस्थ-प्रकृतिस्थ थे, कार्यक्षम थे; लेकिन दस महीने बाद ही उनकी यह दशा देखकर हम सभी व्यथित, उद्विग्न और हतप्रभ हो उठे थे। नवम्बर आते-आते हमें प्रतीत होने लगा था की पिताजी शय्याशायी नहीं, मृत्यु-शय्या पर हैं; लेकिन हमारा मन इसे स्वीकार नहीं कर पता था। उनकी सेवा-सुश्रुषा के लिए और हरक्षण उनका ख़याल रखने के लिए मैं उन्हीं के कमरे के बाहर एक खाट पर सोने लगा था। वे अजीब बेरंग दिन थे--दुश्चिंताओं और मानसिक संताप से भरे हुए।
६ नवम्बर १९९५ की सुबह, छह बजे, पिताजी के कक्ष के सामने लगे बेसिन पर मैं ब्रश कर रहा था कि पिताजी की पुकार सुनकर उनके पास गया, पूछा--'क्या है बाबूजी?'
पिताजी धीमी आवाज़ में कहने लगे--'मेरी बात ध्यान से सुनो। साधना (मेरी पत्नी) का अपॉइंटमेंट केंद्रीय विद्यालय में हो गया है। मेरे अकाउंट से ५००० रुपये निकालकर उसके लिए अच्छी-अच्छी साड़ियाँ खरीद लाओ। अब उसे रोज़ विद्यालय जाना होगा न ?'
मैं आश्चर्य में था ! यह क्या हुआ बाबूजी को? ऐसा विभ्रम कैसे हुआ? क्या ज्वर-अशक्तता और अत्यधिक ताप का प्रभाव उनके मस्तिष्क पर प्रभाव डाल गया है ? मैंने चिंतातुर होकर कहा--'बाबूजी! कोई नियुक्ति-पत्र तो आया नहीं है अब तक, आप कैसे कह रहे हैं कि साधना की नियुक्ति हो गयी है?'
उन्होंने पूरे विश्वास के साथ दृढ़ स्वर में कहा--'मैं कह रहा हूँ न, उसकी नियुक्ति हो गयी है। '
वह कुछ और कहते, इसके पहले ही मैंने पूछा--'लेकिन किस आधार पर...?'
उन्होंने निश्चिन्त स्वर में थोड़ा ठहरकर कहा--"आज सुबह, ब्राह्म-मुहूर्त में दो श्वेतवस्त्रधारी मेरे कमरे में आये थे। उनके सिर छत से लगे थे और पाँव अधर में थे। उन्होंने ही मुझे बताया है। तुम तो वह करो, जो मैंने तुमसे कहा है।'

उनका आदेश सुनकर मैं कमरे से बाहर निकल आया और मैंने मान लिया कि पिताजी किसी स्वप्न के प्रभाव में ऐसी बात कह रहे हैं। लेकिन, उनके मुख से 'दो श्वेतवस्त्रधारियों' का उल्लेख सुनकर मेरा माथा ठनका था ! रोमांचित हो उठा था मैं! दस वर्ष पहले चालीस दुकानवाली ने भी तो 'दो श्वेतवस्त्रधारियों' का ज़िक्र किया था मुझसे। क्या ये वही महानुभाव हैं--तेज से भरे, प्रकाश-पुञ्ज के सदृश देवदूत? मैं सोचता ही रहा, किसी निश्चय पर पहुँच नहीं सका।...
(क्रमशः)

बुधवार, 13 जनवरी 2016

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (३६)

['अलविदा, मेरे अच्छे दोस्त!'…]

लेकिन गहरे ध्यान में जाने अथवा किसी को पुकारने का मुझे अवसर ही नहीं मिला। मैंने जैसे ही गिलास हाथ में उठाया, शरीर में जाना-पहचाना कम्पन हुआ, जो इस बात का संकेत था कि कोई आत्मा बिना बुलाये ही आ पहुंची है। मैंने शीघ्रता से संपर्क साधा और पूछा--'आप कौन हैं? अपना परिचय दें।'
आत्मा ने अपना परिचय पहले हंसकर दिया, फिर बोली--'परिचय क्या पूछते हो ? मैं हूँ चालीस...!'
उसकी उपस्थिति की जानकारी से मेरे पूरे बदन में झुरझुरी-सी हुई। रोमांचित होकर मैंने कहा--'अरे, इतने दिनों बाद तुम्हें मेरी याद आई है?'--'हुश्श... ! याद तो उसकी आती है, जिसे कोई भूल जाता है। मैं तुम्हें भूली ही कब थी ? तुम तो घर-गृहस्थी में ऐसे फँसे कि पलटकर तुंमने हमारी तरफ देखा ही नहीं! मुँह तुमने फेर रखा था, मैंने नहीं।'
--'ऐसा कैसे कह सकती हो तुम? जाने कितनी बार मैंने तुम्हें याद किया है, पुकारा है तुम्हें, तुम कभी आयीं ही नहीं ! हाँ, यह जरूर है कि तुम्हारे लोक से संपर्क की चेष्टा लम्बे-लम्बे अंतराल में हुई है मुझसे। और देखो न, अभी दो घंटे से मैं किसी आत्मा को पुकार रहा था और तुम इतने विलम्ब से आई हो?'
--'हाँ, जानती हूँ, तुम किसी को पुकार तो रहे थे, लेकिन मुझे तो नहीं !'
--'लेकिन तुम आसपास थीं, तो आ सकती थीं न ? एक मित्र संकट में पड़े हैं.... !'
मैंने तात्कालिक समस्या के समाधान के इरादे से उसे मित्र की कहानी सुनानी चाही तो उसने मुझे बीच में ही रोक दिया और बोली--'सब जानती हूँ मैं! अपने मित्र से कहो कि उनकी पत्नी पर किसी प्रेतात्मा की छाया नहीं है। वह अपनी पत्नी पर शासन करना छोड़ दें। उन्हें अपनी प्रीति दें। घर की स्थितियों को सामान्य बनायें और पत्नी का किसी अच्छे चिकित्सक से इलाज़ करायें। धीरे-धीरे स्थितियाँ अनुकूल हो जायेंगी। उनके घर की विद्रूपताओं ने उनकी पत्नी को इस दशा में पहुंचा दिया है।'

उसकी पूरी बात सुनकर मैंने पूछा--'अच्छा, यह बताओ इतने दिनों से गायब कहाँ थीं तुम?'
--'हाँ, मैं बंधन में थी।'
--'कैसे बंधन में ?'
--'छोडो, वह बात पुरानी हुई! आज तो मैं तुमसे कुछ जरूरी बातें कहने आई हूँ।'
--'तुम्हारी जरूरी बातें भी सुनूँगा, पहले यह बताओ कि वह तुम्हीं थीं न, जो मेरे कमरे में मुझे जगाने आई थीं? और कमरे की खिड़की के खुले प्रभाग में तैर रहा था तुम्हारा भयावह मुख-मंडल... ?'
--'हाँ, वह मैं ही थी। तुम्हें आकृष्ट करने का मेरे पास और कोई साधन या मार्ग नहीं था।'
--'आकृष्ट करने का? वह आकृष्ट करने का यत्न था या भयभीत करने का ? मैं तो बुरी तरह डर गया था उस रात। क्या तुम वैसी ही हो, जैसी उस रात दिखी थीं मुझे ? मेरे मन का भय अवसन्न कर गया था मुझे।'
--'अरे नहीं, मैं तो सुन्दर-सी हूँ, बहुत प्यारी! जिस शक्ल में मैंने तुम्हारे कमरे की खिड़की पर खट-खट की थी, वह तो उधार की ओढ़ी हुई शक्ल थी। मैंने तुमसे कहा था न, जब कभी तुम मुझे देखोगे तो आँखें चुँधिया जाएंगी तुम्हारी! क्या याद नहीं तुम्हें?'
--'हाँ, अच्छी तरह याद है...! लेकिन तुम हमेशा मेरे सामने भयप्रद स्थितियों और भयावह शक्लों में क्यों आती हो? आठ-नौ साल पहले भी तुमने झड़बेरी के पेड़ के पास ऐसी विषम और विकट मायाजाल की संरचना की थी और मेरी आत्मा को इस तरह भय और आतंक से भर दिया था कि मैं प्राण छोड़कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ था। हलक सूख गया था मेरा! आखिर हर बार तुम ऐसा क्यों करती हो मेरे साथ ?'
उस रात की बातचीत में चालीस दुकानवाली का अंदाज़ कुछ निराला था, जैसे उसके पास वक़्त कम हो और उसे जल्दी-जल्दी बहुत-सी बातें मुझसे कहनी हों। वह मेरे हर प्रश्न के लिए जैसे पहले से तैयार होकर आयी हो। मेरी आत्मा पर पड़ी हर खरोंच पर जैसे वह मलहम लगाने का इरादा, निश्चय और उत्साह लेकर आयी हो! मैं आश्चर्य में पड़ा था, तभी वह बोल पड़ी--'ऐसा इरादतन कभी नहीं किया मैंने! तुम नहीं जानते, हम जगत से विलग हुए लोगों की सीमाएँ क्या हैं? तुम्हारे जगत में पुनःप्रकट होने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं, कितनी बाधाएँ पार करनी होती हैं और कितनी अधिक मर्यादाओं का निर्वाह करना पड़ता है हमें! कितनी सीमित संभावनाएं हैं हमारे पास! हवा की तरंगों में मैं इठलाती फिरूँ, तो कहीं कोई बंधन नहीं, निःसीम में विचारण करूँ, नदी-समुद्र-पहाड़ लाँघती रहूँ, तो किसी को आपत्ति नहीं कोई; लेकिन तुम्हारे जगत में थोड़े-से हस्तक्षेप के लिए मुझे इन्हीं मर्यादाओं के बीच से राह बनानी पड़ती है--सच में, यह लक्ष्मण-रेखा के उल्लंघन से कम पीड़ादायक नहीं है। और, शक्लों का क्या है, हर शक्ल को तो अंततः बदशक्ल ही होना है न ? तुम्हारे जगत से जो कोई हमारे लोक में आता है, चाहे वह अपमृत्यु, अकालमृत्यु या सामान्य मौत पाकर आया हो, विकृत शक्ल ही लेकर आता है। जीवन की यही परिणीति है--यह तुम क्या नहीं जानते? मैं जहाँ रहती हूँ, जहाँ से आती हूँ, वहाँ तो ऐसी ही विकृत शक्लें मिलती हैं! शीघ्रता में उन्हीं में से किसी एक का चयन करना पड़ता है हमें ! जीवन-सत्य जानकार भी तुम उनसे भयभीत क्यों होते हो, मुँह क्यों फेरते हो, घृणा क्यों करते हो? तुम्हारी यह बात मेरी समझ में नहीं आती....!'
चालीस दुकानवाली धाराप्रवाह बोले जा रही थी। कागज़-कलम और गिलास को सँभालना मुझ अकेले के लिए कठिन हो रहा था। गिलास की गति भी बोर्ड पर इतनी अधिक थी कि मैं चकित था। एकमात्र स्पर्श से ऐसी असाध्य गति मैंने पहले कभी देखी नहीं थी। उसके इतने लम्बे संवाद से मैं आक्रान्त हुआ और मेरे मुँह से अविचारित वाक्य सहसा निकल गया--'हाँ, तुम्हें डर क्यों लगेगा, तुम तो उसी लोक से आती हो, उन्हीं लोगो के बीच से, उसी मसानी मुहल्ले से न? डरते तो इहलोक के वासी हैं।'
वह क्षण-भर के लिए मौन रही, फिर बोली--'तुम्हारी इस बात से मुझे दुःख पहुंचा है। कोई बात नहीं कि तुम परम सत्य से मुख फेरकर भ्रम की परिधि में खड़े रहना चाहते हो; लेकिन याद रखना, यह भ्रम स्थिर नहीं रहनेवाला ! एक-न-एक दिन वह टूटेगा ज़रूर..।'
मुझे तुरत महसूस हुआ, मैंने अपने कथन से अकारण उसे पीड़ा पहुँचायी है, मैंने क्षमा-याचना के स्वर में संभलकर कहा--'तुम्हें दुखी करने का मेरा इरादा नहीं था, मैं तो बस अपने दुर्वह भय के बारे में बता रहा था। सच कहो, तुम्हीं नहीं, कोई भी इस तरह भयभीत करता पास आएगा तो डर व्यापेगा नहीं क्या? क्या तुम नहीं जानतीं कि खिड़कीवाली घटना के बाद मेरी श्रीमतीजी मुझ से ही भयभीत रहने लगी हैं ?'
मेरी बात पर चालीस दुकानवाली आत्मा हंस पड़ी और बोली--'भय एक प्रकार की स्वनियोजित दुर्बलता है, निजता की सृष्टि है। जीवन-सत्य जाननेवाले भयग्रस्त नहीं होते... !'
मैंने कहा--'चलो, ठीक है, मान ली तुम्हारी बात! अब यह भी बता दो कि झड़बेरी के पेड़ से उतरते हुए मुझे डराना क्यों जरूरी समझा तुमने? शक्ल-सूरत की बात मैं नहीं कहता, फिर भी, एक सामान्य चेहरा लेकर तुम शांति से मेरे सामने आ खड़ी होतीं, तो क्या मैं इतना भयभीत होकर बदहवास-सा भाग खड़ा होता? जब इतने आत्म-संयम से मैं भैरवघाट तक चला आया था, तो उस दिन तुमसे मिलकर और बातें करके ही लौटता न? तुमने वातावरण को इतना भयोत्पादक क्यों बना दिया था आखिर?'
कुछ क्षणों का उसने फिर मौन धारण किया। मैंने पूछा--'क्या हुआ ? तुम चली गयीं क्या?'
चालीस दुकानवाली ने फिर भी चुप्पी साधे रखी तो मैं चिंतातुर हुआ। गिलास पर ध्यान केंद्रित किया तो लगा, आत्मा स्थिर और जड़ बनी हुई है, गयी नहीं अभी ! मैंने पूछा--'बोलो न, क्या हुआ तुम्हें ?'
अंततः उसने कहा--'मैंने बातचीत की शुरुआत में कहा था न, मैं बंधन में थी!'
मैंने आतुर प्रश्न किया--'कैसा बंधन?'
वह सम्भ्रम में पड़ी बोल पड़ी--'हाँ भई, मैं उस रात झड़बेरी तक पहुंची ही कहाँ थी ?"
अब चकराने की बारी मेरी थी, आश्चर्यचकित होकर मैंने पूछा-'क्या मतलब?'
--'सच में, मुझे बेरी के पेड़ के एक बाँस पहले ही रोक लिया गया था। मैं विवश हो गयी थी। मैंने जब तुम्हारी ओर देखा तो पाया कि तुम घबराकर सीढ़ियाँ फलाँगते बदहवास-से दौड़ते जा रहे हो।'
--'किसने तुम्हें रोक लिया था? कौन था वह?'
चालीस दुकानवाली ने दीन स्वर में कहा--'वे दो श्वेतवस्त्रधारी थे--देवदूत-से प्रकाश-पुञ्ज, उज्ज्वल आभा-मंडल से घिरे हुए। एक ने झड़बेरी से दूर ही मुझे रोककर जड़वत बना दिया था और दूसरे झड़बेरी के पेड़ तक गये थे और उन्होंने ही वृक्ष को समूल झकझोर दिया था और तुम्हें भय से आकण्ठ भर दिया था।'
यह विवरण सुनकर मैं तो जैसे आसमान से गिरा, तभी मेरी चेतना से प्रश्न उभरा--'लेकिन मैंने तो एक काली छाया देखी थी वहाँ, जो सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश कर रही थी। उसी छाया को देखकर मेरा मन-प्राण सिहर उठा था। जबकि तुम उसे उज्ज्वल आभा बता रही हो। तुम्हारी बात सत्य से मेल नहीं खाती। मुझे सबकुछ सच-सच बताओ न।'
उसने साधिकार कहा--'मैं सच कह रही हूँ, विश्वास करो मेरा! तुम्हें वे श्वेतवस्त्रधारी काली छाया-से दिखे, तो इसमें भी उन्हीं की कोई माया होगी। मेरा कुछ अपराध नहीं। वे इतने प्रभावी, बलशाली और तेज से भरे हुए थे कि मेरे चंचल पाँव, जो तुमसे मिलने की व्यग्रता में थिरक रहे थे, जड़ हो गए थे। तुमसे मिलने के लिए मैंने बहुत श्रम किया था, शृंगार किया था और अनेक प्रयत्न किये थे, लेकिन मुझसे पहले वे दोनों वहाँ पहुँच गए थे और उन्होंने सारी योजना उलट-पलटकर रख दी थी।'
--'कौन थे वे दोनों श्वेतवस्त्रधारी ? मैं समझ नहीं पा रहा कि मुझे इस तरह डराकर वहाँ से भगा देने से उन्हें क्या लाभ होनेवाला था ? इसमें उनका प्रयोजन क्या था?'
--'यह तो मैं भी नहीं जानती, सच्ची....! मैंने अपने लोक में भी ऐसे तेजोमय देवदूत कहीं नहीं देखे। शपथ ले लो, मैं नहीं जानती कि वे कौन थे और ऐसा करने के पीछे उनका मक़सद क्या था! उनका रहस्य तो मैं आज तक नहीं जान सकी। लेकिन इतने वर्षों तक उन्होंने ही मुझे तुमसे दूरी बनाये रखने को विवश कर रखा था। जाने क्यों, पिछले दो वर्षों से वे दिखे नहीं मुझे। मैं तभी से तुमसे संपर्क की चेष्टा कर रही हूँ और तुम थे कि इसी कालखण्ड में तुमने पराजगत से दूरी बना रखी थी। अनेक प्रयत्न के बाद मुझे वह सब करना पड़ा, जिससे प्रभावित होकर तुम मुझसे संपर्क-संवाद करो।'
--'तुम मन से इस अपराध-बोध को निकाल दो, मैं तुम्हें किसी प्रकार का दोष कहाँ दे रहा हूँ? सच्ची बात तो यह है कि मैं खुद को ही डरकर भागने का अपराधी मान रहा था। मेरे मन पर इसका बड़ा बोझ रहा है अब तक। आज तुमसे सारा वृत्तांत सुनकर भार-मुक्त हो गया हूँ मैं! सच मानो, मैं तो बहुत-बहुत आभारी हूँ तुम्हारा !'
--'लो, मिलने का वादा करके, नियत समय पर न पहुँच पाने का दोषी तो मैं स्वयं को माने बैठी थी। क्षमा की याचना तो मुझे करनी थी। आज मेरे कलेजे को भी ठण्डक मिली है....।'
मैंने निरीह होते हुए पूछा--'इन तारों भरे आकाश में तुम कब तक, कहाँ-कहाँ भटकती फिरोगी ? आखिर कब तक चलेगा यह सिलसिला...?'
--'मेरी मुक्ति के दिन भी आएंगे ही। लौटूंगी तुम्हारे पास ही कभी-न-कभी, किसी-न-किसी युग-काल में--विश्वास करना मेरा!'
सुबह के चार बजने में बस थोड़ी ही देर थी, अचानक उसने कहा--'अब मुझे जाने दो। अलविदा, मेरे अच्छे दोस्त!'
'मेरे अच्छे दोस्त?' मैं भाव-विगलित हो रहा था--स्तंभित और अवाक! मेरे पास ऐसी कोई अलौकिक शक्ति नहीं थी कि देख सकूँ उसे, लेकिन जान रहा था कि चालीसदुकानवाली आत्मा की आँखें भी सजल हो गयी होंगी। यह उत्तर जैसे ही आया, बोर्ड पर रखा गिलास स्थिर हो गया और मुझे लगा, मेरे हाथ में आया चालीस दुकानवाली आत्मा का हाथ छूटकर मुझसे दूर होता जा रहा है और मैं ब्रह्माण्ड की विराट सत्ता में एक पत्ते-सा गिरा जा रहा हूँ--अवलम्ब-हीन होकर।....
(क्रमशः)