गुरुवार, 18 अगस्त 2016

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का एक बहुत पुराना पत्र...

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पिताजी के नाम लिखा यह पत्र, आपके सामने रख रहा हूँ। पत्र जर्जर हो चुका है, लेकिन पिताजी के कागज़ों में पिछले ७५ वर्षों से बिना करवट लिए यह कैसे सानंद विश्राम कर रहा था, यही आश्चर्य का विषय है ! आज इसे जगत-सम्मुख रखकर मैं प्रसन्न हूँ। जय हिन्द!!
(--आनन्द.)


मूल प्रति का टंकित प्रारूप :
बजाजवाड़ी, वर्धा. ३०-१०-१९४१
प्रिय प्रफुल्लजी ,
आपके सब पत्र मिलते गए। पुस्तक का तीसरा फर्मा भी पहुँच गया। दो तो पहले ही पहुँच चुके थे। मेरे भाषण का वह अंश जो 'आरती' में उद्धृत होने जा रहा है, वह भी मिल गया। मुझसे जहाँ तक हो सकता है, मैं करने के लिए तैयार हूँ। इस पर भी अगर सफलता न मिले, तो हमारा दुर्भाग्य है। तौ भी, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। 'आरती' के विशेषांक के लिए मेरी इच्छा है कि मैं कुछ स्वतंत्र लिख भेजूँ। पुस्तक से उद्धरण विशेषांक के योग्य नहीं है। अभी समय है। मैं आशा करता हूँ कि कुछ लिख सकूँगा। अगर कोई चलता विषय जिस पर लिखने के लिए पढ़ने की ज़रूरत न हो, मिल जाता तो आसानी होती।
और सब आनंद है।
गान्धीजी ने नियम बना लिया है। वे पत्र-पत्रिकाओं के लिए न लेख लिखते हैं और न सन्देश भेजते हैं। इसलिए उनकी आशा तो छोड़ ही देनी चाहिए।
आपका--
ह०-- राजेन्द्र प्रसाद.
[पुनः : सन १९४०-४२ में पिताजी के सम्पादन में पटना से निकलनेवाली पत्रिका मासिक 'आरती' के सम्मान्य संरक्षक थे राजेन्द्र बाबू; उसी सन्दर्भ का है यह पत्र!]

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

'लोहासिंह' की अंतर्कथा : रामेश्वर सिंह काश्यप (२)

बहरहाल, बचपन के दिन तो आशियाना बदलते बीत गए। सन १९६०-६१ में काश्यपजी फिर हमारे पड़ोसी बने। पटना के श्रीकृष्ण नगर मुहल्ले के २३ संख्यक मकान में हम जा बसे और काश्यपजी सपरिवार ७ संख्यक मकान में आये! हमारे घरों की दूरी दो बाँस से अधिक नहीं थी। काश्यपजी के परिवार से पुरानी घनिष्ठता तो थी ही, उनके कनिष्ठ सुपुत्र विपिनबिहारी सिंह मेरे अभिन्न बाल-सखा वहीं बने! बचपन की उस मित्रता का रंग ही निराला था ! रात के शयन का वक़्त छोड़कर हम दोनों प्रायः साथ-साथ रहने को विकल रहते। स्कूल का साथ तो था ही, शेष समय भी विपिन या तो मेरे घर में होते या मैं उनके घर में। वह अपने गाँव से आया गुड़-चूड़ा मेरे लिए ले आते, मैं उसे अपनी हॉफ पैंट की दोनों जेबों में भर लेता और मज़े से खाता-चबाता रहता। मेरी शामत तब होती, जब माँ मेरे कपड़ों की धुलाई करतीं। पैंट की जेब से चूड़े के कण और गुड़ का मटमैला रंग निकलकर बहने लगता और मुझे उनकी डाँट खानी पड़ती। हम दोनों मित्र आम-अमरूद के बगीचे में साथ जाते, खेलते, खाते और मटरगश्तियां करते ! बाल्य-काल की मेरी नाट्य प्रस्तुतियों में विपिन मेरे सहभागी भी होते और प्रतिद्वन्द्वी भी।
काश्यपजी के घर में सर्वत्र मेरा निर्बाध प्रवेश था, लेकिन केवल उनका ही कमरा इसका अपवाद था। उनके कमरे में किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश की सख़्त मनाही थी, फिर भी विपिन की आड़ में मैं उनके कमरे में भी यदा-कदा चला ही जाता था। उस कक्ष में कागज़-पत्तर का अम्बार था, पुस्तकों से भरी-ठुंसी आलमारियाँ थीं और एक अदद ऊँची पलँग, जिसका अर्धांश फाइलों और पुस्तकों से भरा रहता था। वहाँ विश्वविद्यालय की उत्तर-पुस्तिकाओं के गट्ठर होते और ऐश-ट्रे के बगल में रखा होता 'पाशिंग शो' सिगरेट का टिन-पैक या 'गोल्डन फ्लैक' की सुनहरी डिब्बी ! हम सबकी आँखें बचाकर उसी डिब्बी से दो सिगरेट निकाल लेते और धूमपान की कला में निष्णात न होते हुए भी निर्जन वन-वीथियों में जाकर उसका धुआँ उड़ाते और फिर नींबू के पत्ते चबाकर मुँह की दुर्गन्ध मिटाने चेष्टा करते। अजीब सपनीले बेफ़िक्री से भरे दिन थे वे भी।...
उन दिनों श्रीकृष्णनगर लेखकों-कावियों-नाटककारों-संगीतज्ञों और प्रबुद्ध-प्रखर व्यक्तित्वों से भरा पड़ा था। पिताजी से मिलने सभी आया करते, लेकिन काश्यपजी तभी आते, जब छोटे चाचाजी राँची से पटना आते, जो आकाशवाणी, राँची में उद्घोषक के पद पर नियुक्त हो चुके थे। काश्यप चाचा आते भी, तो पिताजी से नज़रें बचाते हुए, हम बच्चों को घर के बाहर ही पकड़ने की फ़िराक़ में रहते। अधिकतर मैं ही उन्हें बाहर खेलता, उधम मचाता मिल जाता। वह धीमी आवाज़ में मुझसे कहते--"पंडितजी कहाँ हैं? उन्हें बुला दो।" हमें मालूम था, 'पण्डित' कहने से उनका अभिप्राय क्या होता था। मैं उनके आदेश पर चाचाजी को घर के बाहर बुला लाता और फिर वे दोनों मित्र कहीं और विचरण के लिए निकल जाते।
मैंने हमेशा उन्हें पिताजी से कन्नी काटते देखा। संभवतः युवावस्था से छोटे चाचाजी के साथ पिताजी का लिहाज़ और सम्मान का अभ्यास इस संकोच का कारण रहा हो, अन्यथा भद्र समाज में काश्यप चाचा स्वयं बहुत सम्मानित-समादृत व्यक्ति थे, गरिमामय भव्य मूर्ति तो वह थे ही। लेकिन पिताजी के प्रति उनका यह संकोच अंत तक बना रहा।...
काश्यप चाचा अधिकतर पैंट-शर्ट पहनते, जाड़ों में कोट धारण करते और गले में एक मफलर डाल लेते। कभी उनके सिर पर एक फेल्ट कैप होती, कभी टोपी भी। आँखों पर पॉवर का चश्मा। कभी सिगरेट पीते, कभी पाइप ! वह पान-प्रणयी भी थे, लेकिन पान खाकर महाविद्यालय जाना पसंद नहीँ करते थे। भरी-पूरी देह थी, स्थूल होने से बची हुई। वह बाहर से गुरु-गम्भीर दिखते, लेकिन अत्यंत विनोदी और स्नेही थे। उनका मित्र-मण्डल बड़ा था, वह जब अपने निकट मित्रों (ब्रह्मदेव नारायण सिंह, केशव पांडेय, शिवसागर मिश्र और भालचंद्र ओझा आदि) के बीच होते तो व्यंग्य-विनोद की ऐसी-ऐसी फुलझड़ियाँ छूटतीं, इतने ठहाके फूटते कि मत कुछ मत पूछिए ! विपिन के साथ मिलकर की गयी मेरी बाल्यकाल की उद्दंडताओं के लिए उन्होंने कभी डाँटा-फटकार नहीं मुझे। मैं चकित होकर सोचता हूँ, ऐसे गंभीर व्यक्ति की कलम से हँसी के फव्वारे छुड़ा देनेवाले संवाद कैसे उपजते थे ? उस ज़माने में पटना में इतना जन-कोलाहल और इतनी भीड़-भाड़ नहीं थी, रिक्शा शान की निरीह सवारी समझी जाती थी, जब जहाँ मन हो, रिक्शा रुकवा लीजिये, सड़क-किनारे खड़े मित्र से जी-भरकर बातें कीजिये, पान की दूकान पर पान खाइये और फिर उस पर सवार होकर आगे चल पड़िये। मैंने काश्यप चाचा को ज़्यादातर रिक्शे की सवारी करते देखा, सिगरेट का धुआँ उड़ाते-चलते। प्रतिदिन महाविद्यालय जाने के लिए उनकी प्रिय सवारी रिक्शा ही थी !
प्रायः पाँच साल श्रीकृष्ण-नगर के आशियाने में सुख से बीते। वहीं मेरी माँ ने विपिन की माँ के साथ मिलकर छठ-व्रत का अनुष्ठान आरम्भ किया था। छठ के दिनों में हम दोनों का घर सम्मिलित परिवार-जैसा हो जाता। छठ जैसे पावन पर्व के दिन गहरी आस्था और उत्साह-उमंग में व्यतीत होते। दोनों व्रती माताएँ घर-परिवार की बेटियों के साथ मिलकर छठ के गीत गातीं, मिष्टान्न बानाये जाते, बाज़ार से खरीद-फ़रोख़्त होती और सर्वत्र पवित्रता का साम्राज्य होता। गुड़-मिश्रित गन्ने के रस में जो खीर मिट्टी के पात्र में 'खरना' (लोहण्डा) के दिन बनायी जाती, उसके अनूठे स्वाद को मेरी जिह्वा आज तक नहीं भूली। वैसी अमृतोपम रसना फिर जीवन में कभी नहीं मिली। वे जीवन के अविस्मरणीय दिन थे।
मैं अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ कि इन्हीं पाँच वर्षों में मुझे 'लोहासिंह' की दो-तीन मंच-प्रस्तुतियाँ देखने का अवसर मिला था। उन दिनों रेडियो का वार्षिक उत्सव मनाया जाता था, जिसे 'रेडियो-वीक' के नाम से जाना जाता था। पूरे सप्ताह एक-न-एक आयोजन होता, कभी किसी रंगशाला (भारतीय नृत्य-कला मन्दिर अथवा रवीन्द्र भवन) में या कभी आकाशवाणी के विशाल प्रांगण में मंच बनाकर और शामियाने-कनात लगाकर। 'लोहासिंह' का मंचन और कवि-गोष्ठी, सम्पूर्ण आयोजन का मुख्य आकर्षण होती थी। पिताजी की वज़ह से अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मुझे अग्रिम पंक्ति में बैठने का सुअवसर मिलता था। चीनी आक्रमण के बाद के वर्ष में 'लोहासिंह' की नाट्य प्रस्तुति की याद मैं कभी भूल न सका, उसमें देश-प्रेम की, दुश्मनों के दाँत खट्टे कर देने की जैसी ललकार और हुंकार भरी थी, वह मेरी चेतना में लंबे समय तक निरंतर गूँजती रही थी।
भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद काश्यपजी की एक भोजपुरी कविता किसी पत्रिका में छपी थी, उसे मैंने पढ़ा था। उस कविता की पहली कड़ी मेरी स्मृति में आज तक सुरक्षित है :
"मति भभकS भुट्टो बुतइब तूँ !
चाऊ-माऊँ के छौना तूँ,
बावन अँगुरी के बौना तूँ,
देखत बानी फुदकत बाड़S
माटी के रंगल खेलौना तूँ;
जब काम परी तरुआरन के
पानी पड़ते गलि जइब तूँ !
मति भभकS भुट्टो बुतइब तूँ !!"
सन १९६५-६६ में माताजी की नयी नौकरी के साथ परिवार श्रीकृष्णनगर से उखड गया और जीवन-दिशा बदल गयी। हम सभी उसके बाद नए नीड़ का निर्माण ही करते रहे--पटना सिटी, दिल्ली, ज्वालापुर और फिर वापस कंकड़बाग, पटना। इस बीच काश्यपजी और उनके परिवार से बहुत-बहुत दूरियाँ रहीं। इस दीर्घ कालावधि में माँ कहीं बीच राह में छोड़ गयीं, छोटे चाचा दिल्ली जा बसे। मेरे बाल-सखा विपिन मेरी बचपन की यादों में सिमटकर रह गए।...
मुझे अस्सी के दशक की याद है, पिताजी के अस्वस्थ होने की सूचना पाकर उनसे मिलने भालचंद्र चाचा पटना आये हुए थे। एक दिन दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने द्वार खोला तो देखा, काश्यप चाचा सामने खड़े हैं ! उनका वही सम्भ्रम, वही हिचकिचाहट, वही झिझक और वही प्रश्न--"पण्डित हैं क्या, बुला दो उन्हें!" बचपन के दृश्य आँखों में तारे-से छिटके। लेकिन चाचाजी घर पर नहीं थे, वह किसी से मिलने बाहर गए हुए थे, यह सूचना जैसे ही मैंने उन्हें दी, वे लौट जाने को तत्पर हुए ही थे कि पीछे से पिताजी प्रकट हुए और उस दिन उन्होंने काश्यप चाचा की खूब खबर ली, बोले--"ददन (छोटे चाचा का घर नाम) नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं तो हूँ! कभी मेरी भी खोज-खबर ले लिया कीजिये काश्यपजी !" और आश्चर्य, काश्यप चाचा सिर झुकाये बड़े भाई की फटकार चुपचाप सुनते रहे, फिर चाय पीकर लौटे ! वह अनन्य प्रीति की फटकार थी और काश्यप चाचा के विनयावनत होने की पराकाष्ठा।
बात दरअसल यह थी कि उन दिनों पिताजी, पितामह की अनूदित कृति वाल्मीकीय रामायण के पुनर्प्रकाशन की वृहत योजना पर काम कर रहे थे! इसके लिए उन्होंने अपने तमाम मित्रों, अनुजों और सम्बन्धियों से सहायता की याचना की थी। उन्होंने काश्यप चाचा को भी दो-तीन पत्र लिखे थे, लेकिन पत्र अनुत्तरित रहे। सेवा-मुक्त होकर काश्यप चाचा सासाराम चले गए थे। वह कभी वहाँ होते, कभी पटना में और इन्हीं व्यस्तताओं में पिताजी के पत्र का उत्तर न दे सके थे। पिताजी को यह बात नागवार गुज़री थी और वह काश्यप चाचा से नाखुश थे।
फिर कुछ वर्ष बीत गए। वह १९९२ का अक्टूबर महीना था, एक दिन पिताजी मेरी मोटर साइकिल पर बैठकर एक सभा में शिरक़त करने गए थे, वहीं नाटककार डॉ. जितेंद्र सहाय से उन्हें यह सूचना मिली कि पिछली रात काश्यप चाचा का निधन (24-10-1992) हो गया है। वह मधुमेही थे, प्रतिदिन नियम से इन्सुलिन का इंजेक्शन लिया करते थे, इसी कारण अन्य व्याधियों ने भी उन्हें घेर लिया था। यह सूचना पाकर पिताजी का मर्म आहत हुआ, मुझे भी गहरा धक्का लगा। सभा की समाप्ति पर लौटते हुए पटना रेलवे स्टेशन के महावीर-मन्दिर के पास फूलों की एक दूकान पर रुकने का आदेश पिताजी ने दिया। वहाँ से उन्होंने थोड़े-से फूल लिए और मुझसे कहा--'मुझे श्रीकृष्ण नगर ले चलो, काश्यपजी को अन्तिम प्रणाम तो कर आऊँ ! दीर्घ आयुष्य की यह पीड़ा भोगने के लिए मैं ही तो अभिशप्त बचा हूँ।"
हम ७, श्रीकृष्णनगर पहुँचे। दिन के २-२.३० बज रहे थे और काश्यपजी के आवास पर गहरा सन्नाटा पसरा था। प्रवेश-द्वार से अंदर तक फूलों की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं। पड़ोसी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि सुबह १०-११ बजे ही घरवाले पार्थिव शरीर को लेकर सासाराम चले गए हैं। पैतृक ग्राम में ही उनका अंतिम-संस्कार होगा। यह खबर और भी मर्माहत करनेवाली थी। पिताजी की मुख-मुद्रा देखकर मैं चिंतित हो रहा था। पिताजी ने प्लास्टिक की थैली से फूल अपनी अँजुरी में लिए और मुख्य द्वार पर उन फूलों को रखकर उठ खड़े हुए--करबद्ध, बंद नेत्र थोड़ी देर वहीं स्तम्भित खड़े रहे, मैंने भी पिताजी का अनुसरण किया। दो क्षण बाद पिताजी लौट चलने को पलटे और लड़खड़ाये, मैंने उन्हें सहारा दिया। मोटरसाइकिल के पास पहुँचकर पिताजी ने कहा--'थोड़ी देर कहीं रुकना होगा... ।'
मैं समझ गया, यह आघात पिताजी के लिए असहनीय हो उठा है। मैंने मोटरसाइकिल वहीं छोड़ दी और पिताजी को धीरे-धीरे सड़क के पार ले गया, जहाँ श्रीराधाकृष्ण प्रसादजी का आवास था---१७, श्रीकृष्णनगर ! राधाकृष्णजी पिताजी के अनुज मित्र तो थे ही, पुराने सहकर्मी भी थे। पिताजी वहीं बैठे, राधाकृष्णजी से बातें कीं, प्रकृतिस्थ हुए। उसके बाद हम घर लौट आये। उस दिन एक यशस्वी जीवन-दीप बुझ गया था और परिवार-जनों, परिजनों, निकटस्थों, आत्मीयों के बीच छोड़ गया था एक बड़ी रिक्तता और गहरा अवसाद...!...
इस साल सावन में जब मेघ मल्हार गा रहे हैं, मेरे मन में उमड़-घुमड़ रही हैं काश्यपजी लिखी एक भोजपुरी कविता की कुछ पंक्तियाँ, जो उन्होंने वीर कुँवर सिंह के जीवन पर लिखी थीं--'गदर सत्तावन के, महीना रहे सावन के' :
"गदर सत्तावन के,
महीना रहे सावन के,
सुराज के लड़ाई में भारत के पहिला सिंह गरजन,
बनल रहे आसमान धरती के दरपन.
नीचे धरती पर रहे गोली सनसनात.
घोड़ा भागत रहे हिनहिनात,
छूटत चिनगारि रहे टाप के रगड़ से,
खा के महावत के गजबाँक, हाथी चिंघारत रहे.
तोप के दहाना से दनादन आग बरसे,
मइया से असीस ले के,
तिरिया के पीठ ना देखावे के वचन दे के,
जबकि भोजपुरिया जवान,
रख तरहत्थी पर जान, निकल पड़ले घर-घर से
गदर सत्तावन के,
महीना रहे सावन के !"
काश्यप चाचा के गुज़र जाने के सवा साल बाद भालचंद्र चाचा (२४-२-१९९४) और उसके प्रायः दो वर्ष बाद पिताजी (२-१२-१९९५) भी इस दुनिया से चले गए। पिताजी ठीक कह गए थे कि अनुजों के जगत से विदा होने की पीड़ा भोगने के लिए वे ही अभिशप्त थे।....
(समाप्त)

[चित्र : आकाशवाणी, पटना के ५० वर्ष पूरे होने पर 'दि हिंदुस्तान टाइम्स', पटना ने २५ जनवरी १९९८ को सम्पूर्ण रविवारीय पृष्ठ तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों की चर्चा को समर्पित किया था। इस पृष्ठ पर काश्यपजी का चित्र और उनकी चर्चा है। मेरे व्यक्तिगत अनुरोध पर भाई विनोद नारायण सिंहजी ने उसकी क्लिप मुझे भेजने की कृपा की है। तदर्थ आभार उनका--आनंद.]

बुधवार, 3 अगस्त 2016

'लोहासिंह' की अंतर्कथा : रामेश्वर सिंह काश्यप ... (१)

पटना का एक पुराना मुहल्ला है चिरैयाटाँड़। इसी मुहल्ले में वैद्यनाथ आयुर्वेद की फैक्ट्री और प्रमुख कार्यालय है। कार्यालय परिसर जहाँ ख़त्म होता है, उससे थोड़ा आगे बढ़ते ही पूर्व दिशा की ओर एक सड़क जाती है। इसी सड़क पर एक वकील साहब का दुमंज़िला भवन था। इसी भवन के निचले तल पर ५ नवम्बर १९५२ की सुबह मैंने अपनी आँखें खोली थीं और इस जगत में फैला प्रकाश पहली-पहली बार देखा था। इसी भवन के प्रथम तल पर सपरिवार रहते थे रामेश्वर सिंह काश्यप। रोहतास जिले के सेमरा गांव में जन्मे (16 अगस्त, 1927) काश्यपजी मेरे छोटे चाचा (भालचंद्र ओझा) के घनिष्ठ मित्र थे। एक ही भवन में रहते हुए दोनों का दिन-रात का साथ तो था ही, पारिवारिक निकटता भी थी।
जिस ज़माने की बात कह रहा हूँ, काश्यपजी ने पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और उसी के बी.एन. कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए थे। मेरे छोटे चाचा कहानी-लेखक के रूप में प्रसिद्धि पा रहे थे। दोनों की उम्र में ख़ासा अंतर तो था, लेकिन दोनों पिताजी से बहुत छोटे थे। दोनों धूमपान के व्यसनी थे और उन्हें पिताजी का इतना लिहाज़ था कि छोटे चाचा रह-रहकर ऊपरी मंज़िल पर काश्यप चाचा के पास जा बैठते थे अथवा चिरैयाटाँड़ के चौराहे तक टहलते चले जाते तथा चौराहे की खपरैलवाली एक चाय की दूकान में जा बैठते, चाय पीते और धूमपान कर लौट आते।

उन दिनों चिरैयाटाँड़ का पुल निर्माणाधीन था। चाय की दूकान का छप्पर अपेक्षया कुछ अधिक झुका हुआ था, जिसमें बैठकर चाय या सिगरेट पीते हुए पुल के निर्माण का अर्धांश ही देखा जा सकता था। मेरे छोटे चाचाजी ने वहीं देखा था उन मज़दूरों को सिर पर बोझ ढोते हुए, जो एक पतली पगडण्डी पर पंक्तिबद्ध चलते थे; लेकिन छप्पर की ढलान के कारण मज़दूरों के पाँव ही दिखते थे, सिर नहीं। ऐसा लगता था, सिर्फ पाँव चल रहे हैं--कतारबद्ध! चाचाजी को अपनी एक कहानी का प्लॉट यहीं, इन्हीं मुद्राओं को देखकर मिला था। उनकी उस प्रसिद्ध कहानी का शीर्षक था--'क़तार के पैर'। आकाशवाणी, पटना के 'पुस्तक-चर्चा' कार्यक्रम में चाचाजी की इस कहानी की भूरि-भूरि प्रशंसा आचार्य नलिनविलोचन शर्माजी ने की थी।
बहारहाल, जब मैं डेढ़-दो साल का बालक था, माँ-पिताजी से सुना है, थोड़ा श्यामवर्णी था--ईषत स्थूल, घुंघराले बालोंवाला चंचल बालक ! काश्यप चाचा जब महाविद्यालय से लौट आते, तो मुझे अपनी गोदी में उठा लेते, हवा में उछालते और भोजपुरी में कहते--"ई लइकवा तS लोहासिंह हS भाई!' 'का हो लोहा सिंह, कइसन मिजाज बा ?" वगैरह...! काश्यपजी के इस लाड़-दुलार का मुझे तो बिलकुल स्मरण नहीं, लेकिन पिताजी बताते थे कि रोज़-रोज़ की इस पुकार से ही उन्हें 'लोहासिंह' नामक हास्य-नाटक लिखने की प्रेरणा मिली थी और वह नाटक इतना मकबूल हुआ था कि वर्षों तक उसका प्रसारण आकाशवाणी, पटना से साप्ताहिक रूप से होता रहा। विशेष बात यह थी कि हास्य-नाटिका में प्रमुख पात्र 'लोहासिंह' की भूमिका स्वयं काश्यप चाचा निभाते थे। संवाद की आदायगी का उनका अंदाज़ निराला था। उनके बोले हुए हर वाक्य श्रोताओं को कुछ इस तरह गुदगुदाते कि वे ठठाकर हँस पड़ते थे।
जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ और सोचने-समझने की मेरी बुद्धि किंचित विकसित हुई, तब की ठीक-ठीक याद है मुझे, पूरे बिहार में, गाँव-देहात और जनपदों में लोग 'लोहासिंह' नाटक के प्रसारण के पहले ही अपने-अपने रेडियो-सेट ऑन करके एकत्रित हो जाते थे और पूरा नाटक सुनकर खूब आनंदित होते थे। वे अगले सप्ताह की आतुर प्रतीक्षा किया करते थे। टी.वी. सीरियल 'रामायण' और 'महाभारत' के लिए घर-मुहल्ले और जनपदों में तो लोग बाद में एकत्रित हुए थे, उसके बहुत पहले 'लोहासिंह' के लिए गाँव-गाँव के चौपालों में रेडियो-सेट के पास पूरे गाँव के पुरुष जमा होते थे और रेडियो-नाटक का श्रवण कर आनंद-विभोर हो जाते थे। इस नाटक में पात्रों की बहुलता नहीं थी, बहुत कम पात्रों के बीच कथा का ऐसा ताना-बाना बुना जाता था कि श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते थे। इस रेडियो-नाटक से काश्यपजी को यथेष्ट प्रसिद्धि मिली थी। कहने का तात्पर्य यह कि 'लोहासिंह' नाटक का प्रेरक-शिशु मैं ही था, यह मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ था।...
'लोहासिंह' ब्रिटिश काल की सेना के एक अवकाश-प्राप्त सैनिक थे। उनकी पत्नी थीं--खदेरन को मदर (खदेरन की माँ), खदेरन (बाबू लोहा सिंह के सुपुत्र), बुलाकी [बाबू लोहा सिंह के साले साहब जो कुछ-कुछ मन्दबुद्धि थे और जिनकी शक्ल का चौखटा महिलाओं की तरह साफ़-सुथरा ('मेहरारूवन जइसन सफाचट) था], भगजोगनी (खदेरन की माँ की सेविका, जो मालिक और मालकिन, दोनों की मुँहलगी थी), फाटक बाबा (बाबू लोहा सिंह के पुरोहित)। इन पात्रों के अलावा कई पात्र स्क्रिप्ट की माँग के अनुसार आते-जाते रहते थे, जैसे--खोभारी (पीकर 'धुत्त' रहनेवाला गाँव का एक व्यक्ति), बंगाली डॉक्टर (परिवार नियोजन विषय पर आधारित हास्य नाटिका का एक पात्र)।
लोहा सिंह के मुँह से जब 'काबुल का मोर्चा पर सार्जेण्ट का मेमिन' का ज़िक्र आता, तो लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते थे। पटना आकाशवाणी से जब 'लोहासिंह' नाटक का प्रसारण होता तो पूरा बिहार थथम जाता और दूसरे दिन से हफ्ता भर उसके संवादों की गूँज सर्वत्र होती रहती। 'लोहसिंह' हास्य-नाटक के संवाद की एक बानगी देखना आनंददायी होगा--
"लोहा सिंह--'फाटक बाबा ! काबुल का मोरचा पर हम एक से एक करनैल का मेम आउर एक से एक जरनैल का मेमिन देखा, बाकी खदेरन को मदर का डिजैन का एक्को नहीं था. बुझाता है, जे बिधाता इसको बनाके ऊ सँचवे तूर दिया, जे मे कि इसको डिजैन का दोसर जनाना पैदे जन होखे।'
खदेरन की माँ--'आ मार बढ़नी रे ! जब देख त काबुल के मोरचा, जब देख त मेम आ मेमिन ! ई 'मेम' आ 'मेमिन' का होला जी?'
लोहा सिंह (ठहाका लगाते हुए)--'तुम मेम आ मेमिन का फरक नहीं बूझा ? अरे, मेम आ मेमिन में ऊहे फरक होखता है, जे 'जनाना' आ 'जनानी' में होखता है. का कहते हैं फ़ाटक बाबा ?'
फाटक बाबा--'जजमान ! तूँ चल्हाँकी के चीलम, काबीलियत के कनस्तर, अकिल के अलमारी आ बुधी के बटलोही हवS. तहार बराबरी केहू कर सकेला का ?'
लोहा सिंह'-'चाबस ! चाबस !"
कालान्तर में 'लोहसिंह' नामक एक फिल्म भी बनी थी, जो बिहार के बाहर बहुत नहीं चल सकी।
(अगली पोस्ट में समापन)
[चित्र : खेद है, नेट पर बहुत खोजने पर भी प्रो. रामेश्वर सिंह काश्यपजी का कोई चित्र मुझे नहीं मिला। अंततः उनकी कार्य-स्थली बिहार नेशनल कॉलेज का एक चित्र रखकर आलेख की पहली कड़ी पोस्ट कर रहा हूँ।]

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

'कील गुर्रों' उर्फ़ काठ का घोड़ा...

मेरे घर के सामने ही उनका घर था--भिन्न-मुखी ! मेरा घर पश्चिमाभिमुखी तो उनका उत्तराभिमुखी ! १२ वर्ष का चंचल बालक मैं क्षण-भर में २० फ़ीट की सड़क लाँघकर उनके घर पहुँच जाता था। उस घर में निवास करती थीं दक्षिण-भारतीय एक सुघड़ ब्राह्मणी! ३५-३६ की उम्र रही होगी, दुबली पतली थीं, नासिका में अपेक्षाकृत बड़ा-सा सोने का आभूषण पहने रहती थीं--सामान्य रूप-स्वरूप की हंसमुख महिला! तेलुगुभाषिणी थीं, लेकिन वर्षों उत्तर भारत में व्यतीत करते हुए साफ़-सुथरी हिंदी भी धाराप्रवाह बोलने लगी थीं। आज इतनी मुद्दत बाद उनका स्मरण करता हूँ तो यादों के आसमान में उभरता है उनका मुस्कुराता हुआ गोरा चेहरा और मन में एक अजब-सी कसक उठती है ! उन्हें मैंने हमेशा एक रंगीन सूती साड़ी में देखा, जिसे वह दक्षिण भारतीय महिलाओं की तरह धारण करती थीं। मैंने जब कभी उनके घर की साँकल बजाई, वह फुर्ती से आयीं--किसी काम से हाथ छुड़ाकर, द्वार खोला, आँचल से मुँह पर आया पसीना पोंछा और 'तुम बैठो, मैं अभी आयी' कहती हुई लौट गयीं। अत्यन्त स्नेहमयी थीं वह ! हम उनके स्नेह के वशीभूत उन्हें 'चाचीजी' कहते थे !
चाचीजी का परिवार सुदर्शन लोगों का परिवार था। उनके दो प्रवासी बच्चे, एक बेटी और एक बेटा, अपने दादा-दादी के पास किसी दूसरे शहर में रहते थे और गर्मी की छुट्टियों में ही अपनी माँ के पास आया करते थे ! वे जब आते, हमारा खेल खूब जमता--आइस-बाइस, चोर-सिपाही, कैरम-लूडो...! घर के बरामदे में सेफ्टी पिन से परदे डालकर हम बाल-नाटक भी खेला करते थे। उस कच्ची उम्र में मैंने अति उत्साह में एक लघु-नाटक भी लिखा था--'अमर शहीद भगत सिंह'! मेरे लिखे उस बचकाने नाटक का बार-बार हमने मंचन किया था और उसे मोहल्ले की महिलाओं की खूब सराहना मिली थी।
चाची के पतिदेव निर्लिप्त व्यक्ति थे--घर से भी, अपने बच्चों से भी और आस-पड़ोस, टोले-मुहल्ले-समाज से भी। उन्हें अपने दफ़्तर से कभी फुर्सत ही नहीं होती थी। सुबह के निकले देर रात, जाने कब घर आते। हमें तो कभी-कभार ही उनके दर्शन होते। उम्र की चालीसवीं पायदान के आसपास ही थे वह भी।
चाचीजी की बड़ी बेटी मेरी बड़ी दीदी की हमउम्र थीं औेर सुपुत्र मेरी उम्र के। हमारी गहरी मित्रता थी और गर्मी की छुट्टियों के दिन बड़ी मौज-मस्ती में व्यतीत होते ! लेकिन ऐसा तो वर्ष में एक ही बार होता, एक-सवा महीने के लिए। जब वे चले जाते, तब भी हमारा अड्डा चाचीजी का घर ही होता ! स्कूल से लौटकर हम सीधे उनके घर चले जाते, वहाँ हमारा निर्बाध प्रवेश था। हमारा स्वागत करते हुए बेध्यानी में कई बार उनके मुँह से तेलुगु में एक वाक्य निकल जाता--'रा बाई कूरचो!' (आओ बच्चों बैठो)। अर्थ के साथ वह वाक्य मैं आज तक नहीं भूला। चाची हमेशा मुस्कुराती मिलतीं। वह हमारे साथ कैरम खेलतीं, लूडो खेलतीं, खूब बातें करतीं और मुग्ध कर देनेवाली कहानियाँ सुनातीं।
ऐसी ही सम्मोहक और विमुग्धकारी एक कहानी उन्होंने हम बच्चों को धारावाहिक रूप में सुनाई थी--'कील गुर्रों' अर्थात~ काठ का घोड़ा ! लम्बी कथा थी, सात-आठ दिनों में ख़त्म हुई थी। उस कहानी की अगली कड़ी की हम सभी व्यग्र प्रतीक्षा करते थे और रातों की नींद में उसी कथा के पात्रों को स्वप्न में देखा करते थे ! यह बाल-मन पर कहानी का सहज प्रभाव था या कथा की अतुलनीय सम्मोहक शक्ति--यह मैं कभी सुनिश्चित नहीं कर सका ! लेकिन इतना तय है कि कथा-वाचन की अद्भुत कला चाचीजी के पास अवश्य थी।
मुख़्तसर में कहूँ तो कथा यह थी कि एक राजकुमार अपनी प्रेमिका की तलाश में राजमहल से निकलता है। उसी प्रेमिका से उसका विवाह होनेवाला था, लेकिन उसके पहले ही वह विलुप्त हो गयी थी। बहुत भटकने के बाद बीहड़ वन में उसे एक तांत्रिक से प्राप्त होता है--काठ का घोड़ा और खोयी हुई राजकुमारी का संभावित सूत्र ! काठ का वह घोड़ा आकाश-मार्ग में विचरण करनेवाला जादुई घोडा था। राजकुमार उसी घोड़े पर बैठकर उड़ चलता है। फिर तो वह अनेक लोकों में जाता है, अनेक बिघ्न-बाधाओं-संकटों से जूझता है, नदी-पहाड़-समुद्र लाँघता है, नगर-द्वीपों पर युद्ध करता है और इंद्रजालिक तिलस्मी नगरों के तिलस्म तोड़ता है; लेकिन अंततः वह अपनी राजकुमारी को ढूँढ़ लाने में सफल हो जाता है।
इस कथा का हम सभी बच्चों पर विस्मयकारी जादुई असर था। हम उसके सम्मोहन में ऐसे बँधे थे कि मत पूछिये। आज ५५ वर्षों बाद भी, कथा का सिलसिलेवार क्रम चाहे मन से मिट गया हो, मूल कथा अच्छी तरह याद है मुझे ! चाचीजी ने अपने बचपन के दिनों में यह कहानी तेलुगु में पढ़ी थी कभी !

सन् १९६०-६१ में उस मुहल्ले में स्थापित होने के कुछ समय बाद ही मेरी माताजी ने वहाँ की महिलाओं के सहयोग से भजन-कीर्तन की एक मण्डली बना ली थी। मेरी माता प्रभु-भक्त महिला थीं। अब सप्ताह में दो दिन (मंगल और शनिवार) कीर्तन की तेज आवाज़ मुहल्ले में गूँजने लगी थी। कीर्तन में ढोलक-वादन का दायित्व चाचीजी निभाती थीं। जब हमने उन्हें पहली बार पूरी दक्षता से ढोलक बजाते हुए देखा था, तो हमें आश्चर्य हुआ था। हंसमुख महिला तो थीं ही, मग्न-भाव से वादन करतीं और साथ ही कीर्तन में अपना मधुर तेजस्वी स्वर भी मिलाती जातीं। मेरी माताजी उनके सुमधुर व्यवहार, सद्भाव और उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थीं। शीघ्र ही दोनों में प्रगाढ़ मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो गये थे, लेकिन मेरी माताजी उम्र में चाची से बड़ी थीं। लिहाज़ा, चाची मेरी माँ का बड़ी बहन-सा बहुत आदर-मान किया करती थीं।
साल के दस-ग्यारह महीने, दिन के वक़्त, चाची घर में तनहा रहतीं। एक अपने लिए उन्हें क्या-कितना भोजन बनाना होता? किचन से घण्टे-भर में फारिग हो जातीं और उसके बाद हम बच्चों के स्कूल से लौट आने की आतुर प्रतीक्षा करतीं। हम भी उनके पास पहुँचने की व्यग्रता में रहते। घर से जल्दी-जल्दी कुछ खा-पीकर चाची के पास पहुँच जाते। फिर जमता हमारा खेल या शुरू हो जाती चाची की कथा-कहानी ! मैंने हमेशा उन्हें मुस्कुराते, गुनगुनाते, दौड़ते-भागते देखा--सदैव प्रसन्नचित्त! प्रायः दो वर्ष उनके सान्निध्य में सुखपूर्वक बीत चुके थे।
एक दिन उनके पास अकेला ही पहुँचा और कैरम की गोटियाँ बोर्ड पर बिछा लीं, लेकिन चाची 'अभी आती हूँ' कह तो रही थीं, आती नहीं थीं ! मैंने उन्हें आवाज़ें लगनी शुरू कीं। बहरहाल, थोड़े अधिक विलम्ब से वह आयीं और खेल शुरू हुआ। मैंने देखा, उनका मुख कुछ मलिन है, कांतिहीन है। चेहरा भी कुछ धुला-धुला-सा; जैसा बहुत रो लेने के बाद होता है। एक गहरी उदासी से घिरी हैं वह ! यह मेरे लिए अप्रत्याशित था। मैंने पूछा--'चाची, आप उदास क्यों हैं?'
उन्होंने कहा--'नहीं, कुछ नहीं, आज तबीयत ठीक नहीं है !' मैं निरुत्तर हो गया। बेमन से खेल तो हुआ, लेकिन चाचीजी की उदासी का सबब मेरे दिमाग में प्रश्न बनकर घूमता रहा ! उनकी ऐसी दशा कई दिनों तक रही और मेरी बाल-बुद्धि यही मानती रही कि आज भी उनकी तबीयत ठीक नहीं है शायद। लेकिन जब एक पखवारा बीत गया और वह सामान्य मनोदशा को प्राप्त नहीं हुईं, तो मैं उदास रहने लगा। उनके दुःख का कारण जानने के लिए उनसे बार-बार प्रश्न करने लगा। मेरे निरन्तर और आकुल प्रश्न पर अंततः वह भाव-विगलित हो उठीं और एक दिन तो फूट-फूटकर रोने ही लगीं। मेरा किशोर-मन बहुत आहात हुआ। मेरी आँखों में भी आँसू भर आये। मुझे विह्वल होता देख उन्होंने अपने आप को संयत किया, मेरी सजल हो आयी आँखों को पोंछा, लेकिन अपने कष्ट के बारे में कुछ भी नहीं बताया।
उस शाम जब घर आया तो मेरा मलिन मुख देखकर माताजी ने कारण पूछा। मुझे कुछ पता तो था नहीं, क्या कहता ? मैं माँ से बोल--'आजकल चाची मेरे साथ खेलती नहीं, कहानियाँ भी नहीं सुनातीं और बहुत उदास रहती हैं। लेकिन आज तो वह रोने ही लगीं ! उन्हें रोता देखकर मैं भी रो पड़ा अम्मा !'
माँ ने मुझे समझाया कि 'हो सकता है, वह बीमार हों, उन्हें कोई तकलीफ हो, जिसे वह तुम्हें बताकर परेशान न करना चाहती हों! तुम दुखी मत हो, मैं पूछूँगी उनसे।'
फिर कुछ महीने बीत गए। एक दिन माँ ने मुझे साथ चलने को कहा। दोपहर का वक़्त था, मैं उनके साथ हो लिया। उन दिनों उनकी दन्त-चिकित्सा चल रही थी, वह प्रायः डॉ. एम.वाई. च्यांग के क्लिनिक जाया करती थीं और ऐसे अवसरों पर मुझे साथ ले जाती थीं। मैं भी उनके साथ जाने को तत्पर रहता, क्योंकि डॉ. च्यांग उन्हें आइसक्रीम खाने की सलाह देते और वहाँ से लौटते हुए माँ के साथ मुझे भी आइसक्रीम का लाभ हो जाता। हम रिक्शे पर बैठे और चल पड़े। ४०-४५ मिनट की यात्रा के बाद रिक्शा जहाँ रुका, वहाँ डॉक्टर का क्लिनिक तो था नहीं, तिमंजिले भवनों की श्रृंखला थी। मैंने माँ से पूछा--'तुम कहाँ जा रही हो अम्मा?' माँ ने इशारे से मुझे चुप रहने को कहा। रिक्शेवाले को उसका मेहनताना देकर माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और एक तिमंजिले मकान के पहले माले पर ले गईं। मैं समझ गया कि आज की मेरी आइसक्रीम पर पानी फिर गया।....
माँ जिस दरवाज़े पर जा रुकीं, वह फ्लैटनुमां घर था। माँ ने कॉल बेल बजायी। क्षण-भर की प्रतीक्षा के बाद एक महिला ने द्वार खोला। माँ बोलीं--"....आपका ही नाम है? गृहस्वामिनी ने स्वीकृति में सिर हिलाया। माँ ने कहा--'मुझे आपसे ही कुछ बात करनी है, बस दो मिनट का वक़्त लूँगी !' वह महिला दृढ़ता से द्वार पर खड़ी रहीं और तत्काल बोलीं--'हाँ, कहिये!'
माँ ने कहा--'यहाँ बात करना ठीक न होगा। हम क्या बैठकर बातें नहीं कर सकते?'
अब उन्हें द्वार का अवरुद्ध मार्ग छोड़ना पड़ा और कहना पड़ा--'जी, आइए न !' हम उनके फ्लैट के ड्राइंग रूम में पहुँचे। माँ सोफ़े पर बैठ गयीं और अपनी बात की भूमिका बनाने लगीं। अभी वह मुद्दे की बात पर आने ही वाली थीं कि एक गौरांग महाप्रभु कक्ष में औचक आ धमके। उनकी गोद में रोता हुआ एक नवजात शिशु था। मैंने खड़े होकर उन्हें प्रणाम करते हुए कहा--'प्रणाम अंकल !' उन्हें पहचानने में मुझे कोई दिक़्कत नहीं हुई--वे तो मेरी चाचीजी के जीवन-सहचर थे ! उन्होंने सफ़ेद धोती तहमद की तरह बाँध रखी थी। उन्हें देखते ही त्वरित गति से मेरी माँ उठ खड़ी हुईं! उन्होंने आग्नेय नेत्रों से चाचाजी की ओर देखा। अग्नि-वर्षा करती माँ की तीक्ष्ण दृष्टि का ताप वह सह न सके, उल्टे पाँव लौटे। माँ ने भी मेरी कलाई पकड़ी तथा मुझे बलात खींच ले चलीं--बाहर!
मेरी बाल-बुद्धि समझ न सकी कि मेरे पड़ोसी चाचाजी वहाँ क्यों, कैसे विराज रहे थे और वह भी घर के वस्त्रों में! माँ के साथ फिर रिक्शे से लौटा। रास्ते-भर मैं माँ से सवाल-पर-सवाल पूछता रहा, लेकिन वह मौन रहीं--गम्भीर मुख-मुद्रा थी उनकी! अपनी जिज्ञासा के अंतहीन प्रश्रों पर अंततः मुझे माँ की डाँट खानी पड़ी और मौन धारण करना पड़ा ! लेकिन यह घटना मेरी स्मृति से कभी मिटी नहीं, धुँधली नहीं हुई...!

इस घटना के बाद के छह महीनों में मैंने चाचीजी को क्रमशः घुटते-घुलते देखा। अब न वह सरस कहानियाँ सुनातीं, न प्रसन्नचित्त होकर हमारे खेलों में सहभागी होतीं! उनकी प्रसन्नता कहीं विलुप्त हो गयी थी, चिंताओं का न जाने कौन-सा विषैला कीड़ा उन्हें अंदर-ही-अंदर खोखला किये जाता था। लेकिन, मैंने प्रतिदिन उनके पास जाना नहीं छोड़ा, विगत वर्षों में उनसे जो प्रेम-स्नेह मिला था, उससे मैं आबद्ध था ! वह एक फीकी मुस्कराहट के साथ मिलतीं, मुझसे पूछतीं--'कुछ खाकर आये हो?' मैं हामी भरता और उन्हें हँसाने, प्रसन्न करने के सौ जतन करता, लेकिन वह सूनी आँखों से जाने कहाँ देखती रहतीं!...
दिन बीतते रहे, लेकिन छह महीने बाद ही मेरे परिवार में बड़ी उथल-पुथल हुई। माँ अपनी नौकरी के सिलसिले में राँची के पास खूँटी में जा बसीं और मैं भी अपने दो छोटे भाई-बहन के साथ वहीं चला गया। उस मुहल्ले में बसा-बसाया नीड़ बिखर गया। और, चाचीजी से प्रतिदिन का सम्पर्क विच्छिन्न हो गया, लेकिन वह मेरी स्मृति में बसी रहीं।
बाल्य-काल से किशोरावस्था की दहलीज़ लाँघते हुए मैं लगातार सोचता ही रहा कि वे कौन-से कारण थे, जिन्होंने चाचीजी को जीवितावस्था में ही निष्प्राण बना था...! लेकिन मेरी अविकसित बुद्धि में इसके कारण-तत्व समाते नहीं थे।
ज़िन्दगी अपनी राह बढ़ चली। कई वर्ष गुज़र गए। जब मैं महाविद्यालय की पढ़ाई की पहली-दूसरी पायदान पर था, वर्षों बाद उस पुराने मुहल्ले में जाने का मौका मिला। सहज जिज्ञासा से चाचीजी के घर के सामने पहुँचकर मैं ठिठक गया और मन्त्र-मुग्ध-सा उसके दरवाज़े की कॉल बेल मैंने बजा दी। एक अपरिचित व्यक्ति ने द्वार खोला। उनसे थोड़ी-सी बात करके जब मैं लौटा तो पूरा आसमान चीलों की तरह मेरे सिर पर मँडरा रहा था। उस अपरिचित से मिली सूचना के अनुसार कई वर्ष पहले ही चाचीजी मौत की डोर पकड़कर इस निगोड़ी दुनिया से चली गयी थीं। मेरी आँखों में आँसू थे और मन में तूफ़ान! मैं पैदल ही दूर तक चलता चला गया।
एक ही ख़याल मन में बार-बार उठ रहा था--क्या चाचीजी को भी दूसरी दुनिया में जाने के लिए काठ का वही जादुई घोड़ा मिला होगा? क्या उस पर सवार होकर वह खोज सकी होंगी अपना सच्चा जीवन-सहचर, अनन्य प्रेमी, निश्छल प्रेम और अपने लिए परम शान्ति का देश ?.... जबकि मैं समझदार हो चुका था। जीवन के उलझे धागों को सुलझाने का हुनर आ गया था मुझे।...

शनिवार, 9 जुलाई 2016

हिन्दी पर सवार अँगरेज़ी...

'हिन्दी पर सवार अँगरेज़ी...' --प्रफुलचन्द्र ओझा 'मुक्त'

[पिताजी की एक अप्रकाशित पुस्तक है--'सिर धुनि गिरा लागि पछितानी'। यह पुस्तक 'साहित्य और समय' विषयक मुक्त-चिन्तनों का संग्रह है। इन दिनों मैं उसका प्रूफ पढ़ रहा हूँ। एक लेख पर ठहर गया हूँ। आनन्ददायी आलेख है, पुराना है-- ११.५.१९७९ का, लेकिन आज की दशा पर करारी चोट करता है। लेख में उठाया गया प्रश्न तब भी प्रासंगिक था, आज कुछ ज्यादा ही हो गया है। नयी दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले दैनिक पत्र 'नवभारत टाइम्स' में छपा था। पठनीय है, इसीलिए आपके सामने भी रखने का मन हो आया है। --आनन्द]

अँगरेज़ी बड़ी अच्छी भाषा है। वह बड़ी समृद्ध है। उसमें बड़ा ऊँचा साहित्य है। वह हमारे पुराने मालिकों की भाषा है। हम कृतघ्न नहीं हैं। अपने गए-गुज़रे मालिकों की भाषा से इसीलिए हम पिछले सत्ताइस वर्षों से चिपके हुए हैं। अँगरेज़ी भले ही हमसे अपना दामन छुड़ाना चाहती हो, हम उसे किसी तरह नहीं छोड़ना चाहते। आखिर दुनिया को पता कैसे चलेगा कि हम दो सौ वर्षों तक अँगरेजों के गुलाम रह चुके हैं? अतीत को भुला देना, अतीत से अपने को काट लेना, क्या अपनी नींव को कमज़ोर बनाना नहीं है ?
अँगरेजों ने हमें सिर्फ गुलामी नहीं दी। उन्होंने वह सारी तड़क-भड़क भी दी, जिसे हम आज अपनी आँखों के सामने देखते हैं। आराम-आसाइश के ये तमाम साधन, यह दोगली सभ्यता, यह नयी संस्कृति--यह सब तो हमें अँगरेजों ने ही दिया है और फिर उन्होंने हमें वह भाषा भी दी है, जो आज दुनिया के कई देशों में बोली-पढ़ी-लिखी जाती है। अगर हमने उस भाषा को तरजीह दी है तो ज़ाहिर है, हम अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की बराबरी में आ खड़े हुए हैं।
मुश्किल यह है कि इसके बावजूद हम अपनी भाषा को भुला नहीं पाते। अगर किसी तरह ऐसा हो सकता कि रातों-रात हिन्दुस्तान की तमाम भाषाएँ ख़त्म हो जातीं और सारा देश अँगरेज़ी में ही हँसता, रोता, गाता, सोचता और लिखता-बोलता तो कितनी अच्छी बात होती ! लेकिन ऐसा शायद होना नहीं है। सत्ताइस वर्षों में नहीं हुआ तो अब क्या उम्मीद की जा सकती है ?
लेकिन कोई बात नहीं। हिन्दी है तो हुआ करे, हमने उसके सीने पर अँगरेज़ी को सवार कर रख है। हम हिन्दी या संस्कृत शब्दों को रोमन अक्षरों में लिखकर पढ़ते हैं। इससे उसका उच्चारण अँगरेज़ी ढंग का बन जाता है। फिलहाल हमें इतने से ही संतोष करना पड़ रहा है।
आजकल 'आर्यभट्ट' की बड़ी शोहरत है। पुराने ज़माने में इस नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ और खगोलशास्त्री हमारे यहां हो गए हैं। भारत ने जब अपना पहला उपग्रह तैयार किया तो स्वभावतः उसका नाम 'आर्यभट्ट' रखा। अब चूँकि सरकारी कामकाज की भाषा अँगरेज़ी है, इसलिए उसे लिखा गया रोमन अक्षरों में 'ARYABHATA' । आज के ज्यादातर लोगों ने तो शायद रोमन लिपि में लिखे इस नाम को पहली बार ही पढ़ा-सुना होगा, इसलिए अखबारों यह नाम 'आर्यभट' या 'आर्यभटा' के रूप में चल निकला। जो लोग अँगरेज़ी अखबार ही पढ़ते हैं, उन्होंने अगर इसे 'अर्यभट' या 'आर्यभाटा' भी पढ़ा हो तो क्या अचरज ?
अभी उस दिन बच्चे कोई रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे। अचानक मेरे कान में एक शब्द पड़ा--'जटाका कथाएं'। मैं चौकन्ना हो गया। लिखते-पढ़ते पचास साल का अरसा गुज़र गया, 'जटाका' शब्द मेरे लिए अनजाना था। वक्ता रेडियो के ही कोई कारीगर थे। जब उन्होंने बार-बार 'जटाका कथाओं' का उल्लेख किया तो मुझे लगा कि हो-न-हो, ये जातक कथाओं की बात कर रहे हैं। बेचारे ने अँगरेज़ी में कहीं 'JATAKA' पढ़ लिया होगा और वे 'जटाका' उच्चारण ले उड़े। उन्हें दोष भी कैसे दिया जा सकता है ? आप खुद चाहें तो रोमन में लिखे इस शब्द को 'जटक', 'जटाका', या 'जाटाका' पढ़ लें, कोई आपका क्या करेगा ?
मुझे एक पुरानी बात याद आ रही है। पटना रेडियो के ग्रामीण प्रोग्राम में एक स्थायी कार्यक्रम का शीर्षक था--'धान से धन'। ज़ाहिर है कि प्रोग्राम रोमन में टाइप होता था; क्योंकि उसे मीटिंग में पढ़कर सुनानेवाले कभी बंगाली होते, कभी दक्षिण भारतीय और कभी पंजाबी। अब वे बेचारे 'DHAN SE DHAN' को 'धन से धन', 'धान से धान', 'धन से धान' और 'धान से धन' पढ़ते थे, तो इसमें उनका क्या कसूर था?

लेकिन 'आर्यभट' या 'जटाका' कोई एकलौते उदाहरण नहीं हैं। हिंदी के बहुसंख्यक पत्रों, पोथियों और बोलचाल में हिन्दी के सीने पर सवार अँगरेज़ी का यह अपरूप आप देख सकते हैं। सारी दुनिया जानती है कि विश्व-कवि रवींद्रनाथ ठाकुर 'टैगोर' हो गए। रोमन लिपि ने जब 'ठाकुर' को चबाकर 'टैगोर' उगला, तो विश्व-कवि स्वयं अपने को 'टैगोर' लिखने लगे थे।
लेकिन यह सब चाहे जो भी हो, अँगरेज़ी बड़ी अच्छी भाषा है, बड़ी समृद्ध है, उसमें ऊँचे दर्ज़े का साहित्य है, उसमें अभिव्यक्ति की जो ताकत है, उसका जवाब नहीं है। अपनी गुलामी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए हमें अँगरेज़ी को हिन्दी के सीने पर सवार रखना ही पड़ेगा। हमारे देश में बड़े-बड़े दिमागवालों का यही ख़याल है। यह ख़याल ग़लत कैसे हो सकता है।
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शुक्रवार, 24 जून 2016

पर्वतीय प्रदेश में ठहरी साँसों का हसीन सफर...(२)

शाम ढलान पर थी और मैं भी अंतिम पहाड़ की ढलान पर। दूर, पहाड़ के नीचे समतल मैदान में बसा गाँव माचिस की डिब्बियों का ज़खीरा-सा दीख रहा था मुझे। मैं उत्साह से आगे बढ़ा। ढलान पर उतरते हुए गति अनचाहे बढ़ गयी थी। जल्दी ही मैं बागोड़गाँव की सीमा-रेखा पर पहुँच गया। गाँव में प्रवेश करते ही सुन्दर पहाड़ी बालाओं का एक दल हाथो में लोटा-बाल्टी लिए जाता दिखा। मैं लपककर उनके सामने जा पहुँचा और जिस घर में मुझे जाना था, उसका पता-ठिकाना पूछने लगा। एक अजनबी को सामने देखते ही वे सभी कन्याएँ ठिठक गयी थीं। लज्जा, संकोच और घबराहट के भाव उन सबों के चेहरे पर विद्यमान थे, जिसे लक्ष्य करते हुए मैंने अपना प्रश्न पुनः दुहराया। मेरे मुँह से बोल फूटने भर की देर थी कि पहाड़ी सुंदरियों के दल में अजीब-सी हलचल हुई और वे ठिठियाती हुई एक दिशा में भाग खड़ी हुईं। बस, दो साहसी बालिकाएँ अपनी जगह पर स्थिर खड़ी रहीं, लेकिन उनकी आंखें जमीन में गड़ी जा रही थीं--गहरे।

वे दोनों बालाएँ अपूर्व सुंदरियाँ थीं। एक बार जो मेरी नज़र उन पर पड़ी, तो कुछ क्षणों तक वहीं ठहरी रह गयी। मुझे दुष्यंत-शकुन्तला की याद आयी। महाकवि कालिदास की कल्पना मूर्त्त रूप धारण कर मेरे सामने खड़ी थी--मैं हतप्रभ था। शिष्टता और भद्रता का ख़याल मुझे ज़रा देर से आया। घबराहट में मेरे मुंह से अटकता हुआ गृहस्वामी का नाम पुनः प्रस्फुटित हुआ। मेरे शब्द सुनते ही वे दोनों भी 'खी-खी' करके हँसने लगीं और एक रूपसि ने ज़मीन में धँसे अपने नयन-बाण उठाये और अपनी कोमल अँगुली से एक दिशा में इंगित किया तथा हिरणी की तरह मचलती हुई क्षिप्र गति से उलटे पाँव लौट गयीं। उसकी वह अदा मारक थी। रूप का ऐसा वैभव-विस्तार मैंने पहले कभी न देखा था, न गौर किया था। वह तो बस, 'तिरछी नज़रिया के बाण'-जैसा कुछ था, जो एक क्षण के लिए चपला-सा चमका था। मुझे प्रकृतिस्थ होने में दो क्षण लगे। बहरहाल, जिस दिशा में सुन्दरी बाला ने इशारा किया था, मैं उसी दिशा में बढ़ा और गाँव में प्रविष्ट हुआ।

दो-तीन लोगों से पूछकर मैं उस पाकशास्त्री के मूल पैतृक निवास पर जा पहुँचा। एक अपरिचित शहरी को अपने बीच आया देखकर वहाँ भी आश्चर्यजनक अफरा-तफरी मची, लेकिन यह जानकर कि मैं हिंदुजाजी का प्रतिनिधि हूँ और हरद्वार से आया हूँ, घर के लोगों को तसल्ली हुई। फिर शुरू हुई मेरी आवभगत। चाय-बिस्कुट घर के अंदर से आया। बातें शुरू हुईं।...

गाँव में पत्थर की छोटी-छोटी कंदराओं-से मकानात थे। नन्हे कमरों में हवा-प्रकाश के लिए एक भी खिड़की नहीं थी, बस एक छोटा-सा दरवाज़ा था। जब तक सूरज का बुझता हुआ मद्धम क्षीण प्रकाश बना रहा, मैं दालान में रखी छोटी-सी बेंच पर बैठा रहा। पाकशास्त्री के पिता और बड़े भाई मुझसे बातें करते रहे और उस पाकशास्त्री की रुग्ण पत्नी से सम्बन्धित मेरे प्रश्नों को जान-बूझकर टालते रहे। अंततः मैं हठ पर उतर आया कि इंग्लैंड में कार्यरत उस युवक की पत्नी से मुझे मिलना ही है और अगर वह बीमार है तो उसके इलाज़ की व्यवस्था करनी है--यही हिन्दुजा साहब का आदेश है। युवक के पिता आर्त्त भाव से बोले--"शाब, अब तो वह पूरी तरह ठीक है। बीच में उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गयी थी। अब चंगी हो गयी है शाब, बिलकुल... ठीक !"
मैंने कहा--"तो ठीक है, उसे बुला दीजिये। वह खुद आकर अपने मुँह से कह दे कि वह स्वस्थ है, तो मेरी तसल्ली हो जाएगी। आखिर मैं इसी काम के लिए इतनी दूर से आया हूँ।"
पिता-पुत्र एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। मैंने पूछा--"क्या कोई दिक़्कत है?"
दीन स्वर में पिता बोले--"शाब, मर्यादा का सवाल है। हमारे यहाँ बहुएं घर से बाहर नहीं निकलतीं।"
मैंने सहजता से कहा--"ठीक है, उन्हें घर की चौखट तक ही ले आयें। मुझे तो उनके मुँह से बस यही सुनना है कि वह पूरी तरह स्वस्थ हैं।"

मेरी इस ज़िद को घरवाले जाने क्या समझ रहे थे, लेकिन मैं तो बस अपना दायित्व निभा रहा था। अमूमन, काम-धंधे के लोभ-लाभ में फँसे जो परिजन विदेशों में जा बसते हैं, उन्हें लम्बी छुट्टियों पर स्वदेश बुलाने की यही तरक़ीब होती है। इसमें अनुचित भी कुछ नहीं होता। जिस्मानी तौर पर बीमार होना ही बीमार होना नहीं होता, इसके इतर भी अस्वस्थता हो सकती है, होती है ! युवा पति बरसों-बरस परदेस में हो, तो नव-परिणीता अपनी ससुराल में वियोग के दिन बिताती हुई भला क्या करेगी, कबीर साहेब का यह पद ही तो उसके अन्तर में उमड़ता-गूँजता रहेगा न--
"बालम आओ हमारे गेह रे,
तुम बिन दुखिया देह रे...!"

बहूजी की अस्वस्थता का सम्भवतः यही कारण था। अब पिताजी के पास कोई उपाय शेष नहीं था। उन्होंने अपने सुपुत्र को इशारा किया और सुपुत्र उठकर घर के अंदर चले गए। गए तो गए, देर तक लौटे ही नहीं। अँधेरा हो चला था और दिन के भीषण ताप ने बर्फीली हवाओं की चादर ओढ़ ली थी। तापमान का इतना अंतर मेरे लिए आश्चर्यजनक था। मुझे लगता है, घर के लोगों ने जान-बूझकर अँधेरा हो जाने दिया था। प्रायः घंटे भर बाद एक वृद्धा बाहर आयीं। उनके हाथ में किरासन तेलवाला एक लैंप था, जिसे उन्होंने घर की ड्योढ़ी पर रख दिया और लौट गयीं। दस-एक मिनट के बाद लम्बे घूँघट और आपादमस्तक चादर में लिपटी एक लज्जाकुल स्त्री के साथ वह लौटीं और घर के नन्हें-से द्वार पर पहुँचकर ठहर गयीं। पिताश्री बोले--"लीजिए शाब, बहू आ गयी है। जो पूछना है, पूछ लीजिए।"
मैंने बहूजी से एकमात्र प्रश्न पूछा--"अब आपकी तबीयत कैसी है?"
कुछ पलों तक मौन छाया रहा। फिर बहूजी की बहुत क्षीण आवाज़ मेरे कान में पड़ी--"हम ठीक हैं शाब !"
मेरी समझ में नहीं आया कि और क्या पूछूँ। कुछ पलों की नीरव शान्ति के बाद वृद्धा बहूजी को साथ लेकर लौट गयीं।
 शाम सात बजे तक मैं वहीं बैठा और बातें करता रहा, लेकिन अब ठंढ लगने लगी थी। मैंने उन बुज़ुर्ग से कहा--"दिन तो इतना गर्म था कि मैं पसीने-पसीने हो रहा था और अब जाड़ा लग रहा है।"
वह बोले--"हाँ शाब, पहाड़ों में धूप हो, तो बहुत गर्मी लगती है, लेकिन रातें हमेशा सर्द हो जाती हैं।"

थोड़ी देर बाद मुझे घर के सामने बनी एक ऐसी कोठरी में पहुंचा दिया गया, जिसमें सिर झुकाकर ही खड़ा हुआ जा सकता था, उसे 'कोलकी' कहूँ तो गलत न होगा। उस कोलकी के बाहर एक बाल्टी पानी लोटे के साथ रख दिया गया। मैंने हाथ-मुँह धोया और उस संकीर्ण कक्ष में प्रविष्ट हुआ। वहाँ एक खाट पड़ी थी, जिसपर गद्दा-चादर-दुलाई-कम्बल रखा था। मुझे वहां ऐसा लग रहा था, जैसे बचपन की पढ़ी हुई किसी रहस्यमयी कथा का मैं सचमुच एक पात्र बन गया हूँ। अद्भुत सिहरन-भरी अनुभूति...!

थोड़ी ही देर बाद घर से मेरा भोजन आया। मोटी-मोटी चार रोटियाँ, गहरे हरे रंग की ढेर-सी सब्ज़ी, अँचार ! रोटियाँ इतनी मुलायम कि उँगली रखते ही टूट जाती थीं, लेकिन पहला ग्रास मुँह में डालते ही मेरा ब्रह्माण्ड प्रकम्पित हो उठा ! सब्ज़ी में अत्यधिक मिर्च थी और हरित क्रान्ति मचाती सब्ज़ी का स्वाद भी रुचिकर नहीं लगा। मैंने पूछा--"यह किस चीज़ की सब्ज़ी है ?" पाकशास्त्री के बड़े भाई बोले--"चेंचड़ की है शाब !" मैंने कहा--"इसमें मिर्च बहुत है, मैं इसे खा न सकूँगा। और भई, ये चेंचड़ क्या है?"
भाईजी चिंतित हो उठे, बोले--"न-न, तब तो सब्ज़ी छोड़ दें शाब ! गलती हमीं से हुई, हमें पूछ लेना चहिये था कि आप मिर्ची खाते हैं या नहीं। कोई नहीं, मैं दूध ले आता हूँ, आप उसीसे रोटी खा लें।... चेंचड़ एक पेड़ का फल है शाब !... मैं अभी आया... ।"

इतना कहकर वह चले गए और मैं अपनी थाली से सब्ज़ी का कटोरा अलग रखकर बैठा रहा। थोड़ी ही देर में भाई साहब एक बड़े कटोरे में गर्मागर्म दूध ले आये। मैं उसमें रोटी डालकर खाने लगा तो ज्ञात हुआ कि दूध बकरी का है और उसमें शक्कर की जगह गुड़ डाला गया है। मैंने उन्हें और परेशानी में डालना उचित न समझा। चार दमदार रोटियों में से एक रोटी मैंने सब्ज़ी के कटोरे पर रख दी और तीनों रोटियाँ बकरी के दूध के साथ खा गया। पहले तो बकरी के दूध की गंध से थोड़ी परेशानी हुई, लेकिन खाते-खाते गंध-स्वाद सह्य हो गया। इतनी मशक्कत के बाद बहुत भूख भी लग आयी थी और सच्ची भूख रुचि-अरुचि का भेद नहीं जानती ! जब तक मैं भोजन करता रहा, बड़े भाई पहाड़ों की परेशानी का उल्लेख करते रहे कि पहाड़ की तराई से पानी भरकर लाना पड़ता है, हाट-बाज़ार लिए लम्बी यात्राएँ करनी पड़ती है, गाँव के आसपास तो कुछ मिलता नहीं, वगैरह...!

दो दुलाइयां ओढ़कर मैं गहरी नींद सोया, लेकिन आधी रात के बाद शीत के प्रकोप से शरीर काँपने लगा और नींद टूट गयी। पायताने पड़े कम्बल को मैंने दुलाइयों पर डाल लिया और सोने का यत्न करने लगा। वह भीषण ठंढ की अकल्पित रात थी, काँपते-सोते बीती। सुबह-सुबह दो-तीन किशोर मेरी सेवा में सन्नद्ध हुए। वे मुझे अपने साथ गाँव के एक छोर पर ले गए, जहाँ से सीधी ढलान पर कई पगडंडियों के धूमिल निशान दीख रहे थे और नीचे तलहटी में बहती नदी एक सफ़ेद डोर-सी दीखती थी। सर्वत्र हरीतिमा, जैसे धरती ने हरी चादर ओढ़ ली हो ! सुबह की सैर से लौटते हुए उन किशोरों ने मेरी जिज्ञासा पर चेंचड़ का एक पेड़ भी मुझे दिखाया था, जिससे लटक रहा था ककड़ीनुमां लंबवत असंख्य चेंचड़ !...

मैं सुबह-सबेरे हरद्वार लौट जाने के लिए 'कोलकी' से तैयार होकर निकला। वृद्ध पिता के पास बैठकर मैंने एक कप चाय पी, थोड़ी बातें कीं, फिर चलने को उठ खड़ा हुआ। वृद्ध पिता और बड़े भाई हाथ जोड़े खड़े थे, उनके नेत्र सजल थे। वृद्ध कहने लगे--"हम आपकी कोई सेवा नहीं कर सके शाब ! यहाँ आपके लायक कुछ है भी तो नहीं।" मैं उन्हें क्या बताता कि यहाँ जो अनुभव अद्वितीय मुझे मिला है, वह भला और कहाँ मिलता मुझे !...

मैंने उनकी सहृदयता, सज्जनता और आत्मीयता के लिए आभार व्यक्त किया और कुछ हजार रुपये उनकी हथेली पर रखे, तो वह विह्वल हो उठे। अपने प्रवासी पुत्र के लिए उनकी आँखें बरसने लगीं। बड़े भाई बोले--"बच्चे आपको उस पहाड़ की चोटी तक छोड़ आयेंगे शाब!"
मैंने कहा--'इसकी क्या आवश्यकता है, मैं रास्ता देख आया हूँ, चला जाऊँगा। बच्चे नाहक परेशान होंगे।"
उन्होंने कहा--"शाब, कोई परेशानी की बात नहीं, ये तो दिन-भर में तीन-तीन चक्कर लगा आते हैं वहाँ के। आपको छोड आयेंगे और आगे का रास्ता भी बता देंगे।"

नमस्कार-प्रणाम के बाद मैं उन किशोरों के साथ चल पड़ा। गाँव छोड़ते हुए उसका सम्मोहन मुझे रोक रहा था। गाँव की सीमा तक और पहले पहाड़ की पाद-भूमि तक पहुंचते हुए मेरी आँखें जाने किसे खोज रही थीं। मन सोच रहा था--काश, एक बार फिर कहीं दीख जाती वह चपला...! लेकिन वह कहीं नहीं दिखी, उसे तो बस एक ही बार मेरे मनोमय जगत को प्रोद्भासित करना था।...

किशोरों का दल पहले पहाड़ के शीर्ष तक मेरे साथ रहा। उस पहाड़ की चढ़ाई चढ़ते हुए वे बच्चे मार्ग के बिलकुल किनारे की ढलान पर अपने संतुलन और अपनी निडरता के करतब दिखाने लगे। मैंने वर्जना दी, तो बोले--"डरनेवाले गिरते हैं। ये पहाड़ तो हमारी माँ-जैसा है, अपनी गोदी से गिरने देगा क्या, शाबजी ?" उसकी बात में वज़न तो था, फिर भी मुझे डर लग रहा था और मुझे भय-भीरु देख बच्चे उन्मुक्त हँसी हँस रहे थे। शीर्ष पर पहुँचकर बच्चों ने मुझे अगला पहाड़ दिखाया और उसका नियत सुरक्षित मार्ग समझाया, सतर्कता से आगे बढ़ने की सलाह दी और लौट जाने को तत्पर हुए, तभी उनमें से एक बालक, जो थोड़ा चंचल-शोख़ था, मुझसे बोला--"फिर कब आओगे शाबजी...?" मैं मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया, लेकिन उसकी आवाज़ देर तक मेरा पीछा करती रही...!
(समाप्त)

गुरुवार, 23 जून 2016

पर्वतीय प्रदेश में ठहरी साँसों का हसीन सफर...

तब हिन्दुजा बंधुओं की सेवा में था। सन १९७९ के अंत में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली के सम्पादकीय विभाग की नौकरी छोड़कर मैं ज्वालापुर (हरद्वार) में अशोका प्लाईवुड ट्रेडिंग कंपनी में एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर बहाल हुआ था। पांच-छह महीने ही हुए थे कि मुंबई के प्रधान कार्यालय से मुझे एक हरकुलियन टास्क मिला। और वह आदेश भी श्रीचंद पी. हिंदुजाजी का था, जिसकी अवमानना नहीं की जा सकती थी।

बात दरअसल यह थी कि इंग्लैंड में हिंदुजाजी का एक गढ़वाली पाकशास्त्री था। वह कई वर्षों से विदेश में, उन्हीं की सेवा में, तत्पर था और गाँव पर उसकी पत्नी बहुत बीमार थी। इसीसे वह बार-बार छुट्टी की अर्ज़ी दे रहा था और स्वदेश आकर रुग्ण पत्नी की चिकित्सा करवाना चाहता था। हिंदुजाजी के लिए यह असुविधाजनक था। उनका मुझे स्पष्ट आदेश था कि मैं स्वयं उस कुक के गांव-घर चला जाऊँ। उसकी सहधर्मिणी अगर बहुत बीमार हो तो किसी परिजन के साथ उसे हरद्वार ले आऊं और किसी अस्पताल में उसके इलाज़ की व्यवस्था करवा दूँ। पाकशास्त्री के गाँव-घर का पता-ठिकाना उन्होंने मुझे भेज दिया था। अविलम्ब कार्रवाई वांछित थी। लेकिन जो पता मुझे मिला था, उसे आसानी से समझ पाना कठिन था। बहुत अनुसंधान से ज्ञात हुआ कि हरद्वार से कोटद्वार, कोटद्वार से दुगड्डा, दुगड्डा से भिर्गुखालपाथीमाला और भिर्गुखालपाथीमाला से पहाड़ों की लम्बी पदयात्रा करके बागोड़गाँव पहुँचना था मुझे। इस अनुसंधान के बाद यात्रा-पथ निश्चित हुआ।

दूसरे ही दिन, रात की गाड़ी (ट्रेन) से मैंने कोटद्वार के लिए प्रस्थान किया। सुबह-सबेरे कोटद्वार पहुँचा। वहाँ से बस लेकर दुगड्डा पहुँचा। दुगड्डा पहुंचकर गाड़ी बदलनी थी। पहाड़ों पर जानेवाली गाड़ियां अपेक्षाकृत छोटे आकार-प्रकार की और कम सवारियाँ ढोनेवाली होती हैं। ऐसे ही एक छोटे वाहन पर मैं सवार हुआ और चल पडा भिर्गुखालपाथीमाला की ओर ! पहाड़ों की यात्रा का वह मेरा पहला और रोमांचक अनुभव था। हमारी छोटी-सी लॉरी उत्तुंग शिखरों को अपने सर्पिल पाश में बाँधती ऊँचाइयाँ चढ़ती जा रही थी और मैं भय-जड़ित पखेरू-सा यात्रा कर रहा था। पतली सड़क के एक ओर ऊँचे पहाड़ों और दूसरी ओर गहरी खाइयों पर दृष्टिपात करते हुए भी भय होता था। लेकिन प्रकृति की उद्दाम सुंदरता को निहारने का लोभ भी प्रबल था--मैं अधखुली आँखों से कभी दायीं ओर देखता, तो कभी बायीं ओर। प्रकृति-नटी रूपसि-सी नज़र आती थी सर्वत्र, और मैं मन्त्रमुग्ध हुआ जाता था। मन में एक कविता उपजने लगी, लेकिन उछलती-मचलती लॉरी में उसे लिख पाना आसान नहीं था। कविता की पंक्तियाँ मन में सँजोता मैं आगे बढ़ता रहा।

दोपहर दो बजे भिर्गुखालपाथीमाला पहुँचा। अगला चरण पद-यात्रा का था। भिर्गुखालपाथीमाला में उल्लेखनीय कुछ भी नहीं था। बस, सड़क के दोनों किनारों पर बहुत छोटी-छोटी पत्थरों से बनी दुकानें थीं, जिनमें प्रवेश करते हुए नत-मस्तक होना पड़ता था। दिन चढ़ आया था, भूख लग रही थी, सोचा कुछ खा लूँ, फिर पद-यात्रा शुरू करूँ। मैं अपने झोले में ब्रेड-बटर और बिस्कुट घर से लेकर चला था। सामने की लघ्वाकार एक दूकान में सिर झुकाकर प्रविष्ट हुआ। दुकानदार भाई सेवा को तत्पर मिले...! पूछने लगे--"क्या चाहिए शाब? कहाँ जाना है...?"

मैंने उन्हें बताया कि ब्रेड मेरे पास है, खा लूँगा तो एक कप चाय चाहिए होगी। लेकिन दुकानदार भाई तो मुझ ग्राहक की आवभगत 'अतिथि देवो भव' की भावना से कर रहे थे, बोले--"हाँ शाब, आप ब्रेड खा लो, मैं चाय बनाता हूँ !" मैंने अपने बुद्धिजीवी झोले से ब्रेड निकली, तो पाया कि उससे दुर्गन्ध आ रही है। मैंने दुकानदार भाई से कहा--"भाई, ब्रेड तो खराब हो गयी है! मैं दो-चार बिस्कुट ही खा लेता हूँ, आप चाय बना दें !"
दुकानदारजी तो व्यग्र हो उठे। कहने लगे--"ऐशा कैशे चलेगा शाब? नहीं-नहीं, खड़ी चढ़ाई है, मिहनत का लम्बा राश्ता है, पेट भरे बिना कटेगा नई ! मेरी रसोई तैयार है, आज आपके लिए ही शायद कुछ ज़्यादा बन गयी लगती है।" मेरी लाख मनाही के बाद भी उन्होंने एक थाली में कोदो का हलुवेनुमा भात और पीली कढ़ी-सा कोई तरल पदार्थ परस दिया। उसे प्रेम का प्रसाद समझ मैंने खाना शुरू किया तो पांच-सात मिनट में थाली साफ़ कर दी, जबकि वह खाद्य पदार्थ अप्रिय-दर्शन लगा था मुझे..! वह इसरार करके थोड़ा और लेने की ज़िद पर उतरे तो मैंने मना कर दिया। तृप्त हो चुका था मैं...! मैं अपनी थाली धोने चला, तो उन्होंने झपटकर थाली मुझसे ले ली और कहा--"इतनी सेवा का मौका हमें भी दो शाब !"

पाँच मिनट में ही भाई ने भर-गिलास चाय मेरे सामने रख दी। चाय अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि दुकानदार भाई झपटते हुए अपनी दूकान से बाहर निकले और अपनी पहाड़ी भाषा में चिल्लाकर किसी खच्चरवाले से बातें करने लगे। मैं भी चाय का गिलास लिए उनके पीछे गया ! दूर, पहाड़ की पथरीली राह पर एक खच्चरवाला ठहरा हुआ था और दुकानदार भाई के प्रश्नों के उत्तर उच्च स्वर में दे रहा था। मैंने अनुमानतः जान लिया कि दुकानदार भाई मेरी ही हितचिन्ता में लगे हुए हैं। अपनी वार्ता समाप्त करके दुकानदार भाई मुझसे मुख़ातिब हुए, कहने लगे--"शाब, इसके साथ चले जाओ। यह बागोड़गाँव के आधे रास्ते तक आपके साथ जाएगा, फिर किसी और के साथ आपको लगा देगा, मैंने कह दिया है।"
मैंने अपना झोला उठाया, भोजन और चाय का पैसा देने लगा तो दुकानदार भाई हाय-तौबा करने लगे ! बहुत आरज़ू-मिन्नत के बाद उन्होंने चाय की अठन्नी लेना स्वीकार किया ! भोजन के नाम पर एक पैसा भी पकड़ना उन्हें अपमानजनक लग रहा था। मैंने बहुत-बहुत आभार व्यक्त किया और नमस्कारोपरांत विदा हुआ।

अब खच्चरवाले भाई का साथ था और लम्बा पथरीला, खड़ी चढ़ाई का रास्ता ! पहाड़ों की धूप बहुत प्रखर होती है, शरीर को दग्ध करती लगती है। बहरहाल, मैं खच्चरवाले बन्धु के साथ चल पड़ा। अभी दो फर्लांग ही बढ़ा था कि पसीने-पसीने हो गया और मेरी श्वास-गति भी तेज हो गयी। खच्चरवाले के हाथ में एक छाता था, उसे मुझे देते हुए वह बोला--"छाता ले लो शाब, आपको दूर तक जाना है !"
मैंने संकोच करते हुए कहा--"लेकिन आप...?
उसने कहा--'हमें तो रोज़ की आदत है, हम छाते के बिना भी चल लेंगे।"

अपना छाता उसने बलात मुझे पकड़ा दिया। छाते की छाया में दुश्वारियाँ कम हो गयीं। हम दोनों थोड़ी-थोड़ी बातें करते आगे बढ़े। लम्बी दूरी तय करके हम एक पहाड़ के शीर्ष पर पहुँचे, जहाँ थोड़ी समतल भूमि थी, शिवजी का छोटा-सा मंदिर था और एक बड़े घड़े में शीतल पेय-जल रखा था। उस सुस्वादु-मीठे जल को पीकर सूखे कंठ को बड़ी राहत, बहुत तृप्ति मिली। मंदिर में मत्था टेककर हम फिर आगे बढ़े। हम एक पहाड़ लाँघ चुके थे, अब दूसरे पहाड़ की चढ़ाई पर थे। दूसरे पहाड़ के शीर्ष पर पहुंचने के थोड़ा पहले ही एक दोराहे पर पहुँचकर खच्चरवाला ठहर गया। नीचे जाते एक रास्ते ही ओर इशारा करते हुए मुझसे बोला--"शाब, मुझे वहाँ, उस गाँव जाना है। कोई संगी-साथी तो दिखता नईं, आप ये रास्ता पकड़ लो शाब ! बीच-बीच में आपको खच्चरवाला रास्ता भी मिलेगा, उस पर मत मुड़ जाना ! यही चौड़ा रास्ता पकड़कर चलते चले जाना। वो जो अगला पहाड़ दिखता न, उसके परली पार जब आप उतरोगे तो दूर से ही दिखने लगेगा बागोड़गाँव। बस, रास्ता भटकना मत शाब, उसमें खतरा है।"

मैंने खच्चरवाले भाई को उसकी छतरी लौटा दी, आभार व्यक्त किया और उसकी बताई राह पर चल पड़ा--तनहा...! धूप की तीक्ष्णता कम हो गयी थी, रास्ता तय करना सहल था। देखने से भी लगता था कि अगला पहाड़ तो बस बगल में खड़ा है, शीघ्र उसके पार पहुँच जाऊँगा। लेकिन जितना नज़दीक वह दीखता था, उतना समीप वह था नहीं। लम्बी मशक़्क़त की दूरी थी वह। मैं खच्चरों की राह से बचता हुआ आदमी की राह पर चलता रहा ! अब मैं था, मेरा झोला था, मेरी सिगरेट थी और जनशून्य मार्ग था। पथरीली पगडण्डी पर धुआँ उड़ाता और मुकेशजी का एक गीत 'सुहाना सफर और ये मौसम हँसी' गाता, मैं चल पड़ा।...

अपनी ही धुन और मस्ती में जाने कब मुझे विभ्रम हुआ और मैं मार्ग से भटक गया। मनुष्य-मार्ग मुझसे पीछे कहीं छूट गया था और मैं खच्चरों की राह पर, पता ही नहीं कब, आगे बढ़ आया था ! पीछे लौटना भी मुहाल था। समझ में आने लगा कि खच्चरों की राह अधिक ऊबड़-खाबड़ है, लेकिन अब कोई उपाय नहीं था। मैं सावधानी से आगे बढ़ता रहा। राह कठिन थी। पगडण्डी के दोनों ओर जंगल-झाड़ थे, सनसनाती हवाएँ थीं, मनोरम दृश्य था, लेकिन मन के किसी कोने में दुबका हुआ भय भी बैठा था कि कहीं कोई हिंस पशु अचानक सामने आ खड़ा हुआ तो ? क्या करूँगा मैं? माचिस की तीलियों के सिवा मेरे पास कुछ नहीं था।

सूर्य निष्प्रभ हो चला था। वह अस्त हो और अंधकार छाने लगे, इसके पहले गंतव्य पर पहुँचना जरूरी था। मैंने क्षिप्रता से चलना शुरू किया ही था कि एक तीखे मोड़ पर पाँव में ठोकर लगी और मैं संतुलित न रह सका। रामधड़ाका गिरा और ढालुवीं पथरीली ज़मीन पर फिसलने लगा। फिसलने की गति प्रतिक्षण बढ़ रही थी और मन-प्राण आतंकित हो उठा था। तभी प्रभु-कृपा हुई--तेजी से फिसलते हुए मेरे हाथों ने एक मुट्ठी जङ्गली घास को कसकर थाम लिया। गति को विराम लगा, लेकिन जंगली घास को पकड़कर अधर में झूलते हुए मैंने सिर घुमाकर जैसे ही नीचे देखा, प्राण कंठ में आ फँसे। नीचे कई सौ फ़ीट की गहरी खाई थी और मैं घास पकड़े दोलक-सा झूल रहा था। एक क्षण का और विलम्ब हुआ होता, तो मैं न जाने कहाँ होता ! बाबूजी, बहन-भाई याद आये, मायके गयी हुई पत्नी याद आईं, जो उम्मीद से थीं--ओह, आनेवाली प्रथम संतान जान भी न सकेगी कि मेरे पिता किन परिस्थितियों में काल का ग्रास बन गए...! पिता-भाई मुझे खोजते-तलाशते इन पहाड़ों की ख़ाक छानते फिरेंगे... उफ़, यह सब क्षण-भर में चक्रवात-सा मस्तिष्क में घूम गया। धमनियों का रक्त-प्रवाह रुकता और साँस ठहरी-ठहरी-सी लगने लगी। दुश्चिंताओं का अंत नहीं था, तभी लगा, किसी ने ललकारा मुझे--'अनित्य चिंतन छोड़, हिम्मत कर, ऊपर आ !'
घास की जड़ें मज़बूत थीं। उन्हें पोर-पोर पकड़कर मैं ऊपर आया, स्थिर हुआ। मैंने देखा जंगली-कटीली घास ने मेरी हथेलियों पर खरोंच के कई लंबवत रक्ताभ निशान छोड़ दिए हैं। मैंने अपनी हथेलियाँ मिट्टी में रगडीं और तब खच्चर के रास्ते पर उल्टा लौटा। दोमुँहे पर आकर मैंने दुबारा मनुष्य की राह ली। मनुष्य हूँ, तो मनुष्यता की राह चलना ही मैंने श्रेयस्कर जाना।...

(अगली कड़ी में समापन)