बुधवार, 29 मई 2019

जिजीविषा...

कल की ही तो बात थी--
हवा में झूमता-इठलाता खड़ा था,
मुसाफिरों को छाया देता था,
प्रार्थियों को फल--
आज निष्प्राण हूँ,
नदी के तट पर पड़ा हूँ,
अपार जल है, गीली मिट्टी है,
मेरी कुछ टहनियाँ जिनमें धँसी हैं,
यूँ प्राण-शेष हो गया हूँ
कि जल की एक बूँद भी
ग्रहण कर नहीं सकता,
लेकिन जिजीविषा का क्या ठिकाना
एक युग के बाद, न जाने कब
मेरी शिराएँ मदमत्त हो पीने लगें अमृत,
जड़ जमा लें वहीं
और मैं जाग जाऊं
अलस अंगड़ाइयाँ लेकर,
लूँ फिर करवटें
जिस धरा पर हूँ पड़ा,
वहीं से फूट आयें
कोपलें नयी, नए पात, हरी टहनियाँ--
बिल्कुल नयी, टटकी, सुकोमल... !
कौन जानता है,
सिरजनहार की मर्जी में क्या है...?

--आनन्द.

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (31-05-2019) को "डायरी का दर्पण" (चर्चा अंक- 3352) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Gs Kumar ने कहा…

Nicely written poem. Thanks for Sharing.
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Faizan ALi ने कहा…

Thanks for sharing valuable content

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